कैसी रही थ्री डी में 'शोले'

- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
हिंदी सिनेमा की सबसे कामयाब फ़िल्मों में से एक 'शोले' के निर्देशक रमेश सिप्पी ने बहुत कोशिश की कि वो इसकी थ्रीडी वर्ज़न न बनने दें.
और फिर उन्होंने इसकी रिलीज़ पर भी रोक लगानी चाही लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को ख़ारिज कर 'शोले थ्रीडी' को रिलीज़ होने दिया.
बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले से नाख़ुश रमेश सिप्पी ने इसके बाद मीडिया से कहा कि उनका शोले की थ्रीडी वर्जन से कोई लेना देना नहीं है और ज़ाहिर तौर पर यह कहने से पहले रमेश सिप्पी ने यह फ़िल्म देखी भी नही होगी.
मीडिया में ऐसा कहने से पहले अगर उन्होंने फ़िल्म देख भी ली होती तो भी उन्हें इसका अफ़सोस नहीं होता.
हालांकि फ़िल्म को बहुत ही अच्छे तरीक़े से थ्रीडी में बदला गया है लेकिन पूरी फ़िल्म में कुछ ही दृश्य ऐसे हैं जहाँ इस थ्रीडी तकनीक का मज़ा आता है.
बेजान प्रचार

उदाहरण के तौर पर दर्शक को इस तकनीक का मज़ा सबसे ज़्यादा तब आता है जब फ़िल्म में एक्शन हो रहा हो या कोई चीज़ सीधे उड़ती हुई उसके मुँह के सामने आ जाती हो.
कई दृश्यों में दर्शक अपने थ्रीडी चश्मे उतार कर भी इस फ़िल्म का आनंद उठा सकते हैं क्योंकि कई दृश्य अब भी 2D में ही हैं.
इस फ़िल्म के प्रचार में इसके निर्माताओं ने कुछ ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसके चलते इस फ़िल्म का ठीक ढंग से प्रचार नहीं हो पाया.
फ़िल्म के कलाकार अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र को थ्रीडी चश्मे पहनाकर अखबारों में विज्ञापन देने के बावजूद 'शोले थ्रीडी' दर्शकों को सिनेमा घरों तक लाने में नाकाम रही.
वैसे कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने फ़िल्म 'शोले' 2D में देखी है और वो भी एक नहीं कई बार.
80 और 90 का दशक

उनमें से कितने लोग इस फ़िल्म को दोबारा देखना पसंद करेंगे और वो भी तब जब इस फ़िल्म का प्रचार इतना बेजान हो?
अब जिन लोगों ने इस कमाल की फ़िल्म को अब तक नहीं देखा होगा उन्हें शायद इस फ़िल्म के थोड़े बहुत प्रचार से इसे देखने का मन करे.
लेकिन ऐसा नहीं है और शायद इसीलिए इस फ़िल्म को उतनी अच्छी शुरुआत भी नहीं मिलेगी जितनी इसे 15 अगस्त 1975 को मिली थी जब ये रिलीज़ हुई थी.
और ऐसा होना लाज़िमी भी है क्योंकि आजकल की युवा पीढ़ी के लिए इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, अमजद ख़ान और संजीव कुमार उनके 'हीरो' की जगह नहीं ले सकते.
ये बात और है कि 80 और 90 के दशक में इस फ़िल्म को जब भी और जहाँ भी लगाया गया, इसने बहुत ही कमाल का काम किया.
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