दबंग में तो मुन्नी चाहिए, ग़ज़ल का क्या काम: अनूप जलोटा

    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भजन गायकी हो या ग़ज़ल, गायक अनूप जलोटा ने ख़ासा नाम कमाया है. हालांकि आजकल ग़ज़लों में ढली मखमली आवाज़ें फ़िल्मों में कम ही सुनने को मिलती हैं.

अनूप जलोटा कहते हैं कि जब आजकल फिल्में दबंग जैसी बन रही हैं तो उनमें मुन्नी ही फिट बैठती है, ग़ज़लें नहीं. ग़ज़ल को वो मुकुट में जड़ा हीरा बताते हैं जिसकी जगह सिर पर है पैरों में नहीं. बीबीसी ने अनूप जलोटा से विशेष बातचीत की. पढ़िए मुख्य अंश.

आपको भजनों को लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है. ऐसी लागी लगन जैसे आपके कई भजन लोकप्रिय हैं. आपने कब और क्यों सोचा कि गायकी की इस विधा को आगे बढ़ाया जाए, या फिर यह एक संयोग था?

मैं सात-आठ सालों से गा रहा हूं. मुझे महसूस हुआ कि इससे बेहतर कोई और क्षेत्र नहीं है, लोग आपको प्यार भी करते हैं, आपकी बहुत इज़्ज़त भी करते है. कई लोग भजन सुनकर पैर भी छूते हैं, आपको संत-महात्मा समझते हैं साथ ही आपको भजन गाने के पैसे भी देते हैं. मैं समझता हूं कि इससे बेहतर कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है.

यदि भजन को शास्त्रीय ढंग से गाया जाए तो बेहद आदर प्राप्त किया जा सकता है. मुझे भजन गाकर ही पद्मश्री पुरस्कार मिला और डॉक्टरेट की उपाधि मिली. मुझे हाउस ऑफ़ कॉमंस इंगलैंड ने ग्लोब अवॉर्ड दिया. मुझे भजन गाकर ही सब कुछ हासिल हुआ है. भजन से श्रेष्ठ गायन दूसरा नहीं है.

आपने फ़िल्मों में भी गाया है. आप अपने फ़िल्मी सफ़र के बारे में बताइए कि यह कैसे शुरू हुआ और किन लोगों से आप जुड़े?

अभिनेता मनोज कुमार फ़िल्म ‘शिरडी के साईं बाबा’ बना रहे थे तो उसमें मैंने गाना गाया. मैंने रफ़ी साहब के साथ भी गाना गाया. उसके बाद हमें कल्याण जी ने, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी, आर डी बर्मन साहब ने अलग-अलग फ़िल्मों में गाने का मौका दिया.

हमने कुछ फ़िल्में बनाई हैं. हम साल में तीन फ़िल्में बनाते हैं. हालांकि हम यह कोशिश नहीं करते हैं कि हम जबरदस्ती अपनी फ़िल्मों में गाएं.

आपने कई ग़ज़लें भी गाईं हैं जिन्हें लोगों ने पसंद भी किया है. लेकिन आजकल फ़िल्मों से ग़ज़लें जैसे ग़ायब सी हो गई हैं.

जब फ़िल्म बनी थी ‘मेरे हुज़ूर’ तो उसमें सारी ग़ज़लें थीं. ‘मेरे महबूब’, ‘पाक़ीज़ा’ में ग़ज़लें थीं. फ़िल्म के हिसाब से ही संगीत बनता है. अब फ़िल्म बनती है ‘दबंग’ तो उसमें ‘मुन्नी’ चाहिए.

अगर आप ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ या ‘अल्लाह तेरो नाम’ जैसे गाने का दबंग में इस्तेमाल करती हैं जो ज़रा सोचिए इसका क्या हश्र होगा.

हीरे का अपना एक स्थान होता है. हीरे को मुकुट में पहनिए, हार में लगाइए या अंगूठी में लगाइए, हीरे को पैरों में रख देंगे तो उसका मज़ा नहीं आएगा. इसलिए आजकल फ़िल्मों में ग़ज़लों का कोई स्थान नहीं है. लेकिन कोई बात नहीं है ग़ज़ल अपने आप में सशक्त है. ग़ज़लों के कार्यक्रम होते हैं. हम लोग सारी दुनिया में ग़ज़लों की परफॉर्मेंस देते हैं.

आवाज़ क़ुदरत की देन मानी जाती है लेकिन इसके अलावा ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो एक गायक को महान गायक बनाती हैं?

एक कच्चा हीरा जो खदान में मिलता है उसमें चमक नहीं होती है. उसे चमकाना पड़ता है. वही संगीत में है कि आवाज़ भगवान ने दे दी है लेकिन सिर्फ़ उससे काम नहीं चलता है. हम राग, शास्त्रीय संगीत, अदब और संस्कृति जैसी कई चीजें सीखते हैं. यह सब सीखकर हम आवाज़ रूपी हीरे को चमकाते हैं जिससे उसका मूल्य बढ़ जाता है.

अगर हम ऐसा न करें तो वही कच्ची आवाज़ रह जाएगी जैसी और लोगों की होती है. हम कई दफ़ा लोगों की आवाज़ सुनकर यह कहते हैं कि आप तो बहुत अच्छा गाते हैं, आपको सीखना चाहिए था लेकिन भगवान ने उन्हें ऐसी सदबुद्धि नहीं दी कि वे इसे महत्व दे सकें.

विदेशों की बात करें तो वहां स्वतंत्र संगीत की अपनी एक ख़ास जगह होती है लेकिन भारत में फ़िल्म संगीत ही छाया रहता है. संगीत की बाक़ी विधाएं सुर्ख़ियों में नहीं रहती हैं?

इसकी वजह यह है कि किसी ख़ास चीज़ को ख़ास लोग ही पसंद करते हैं. जैसे डिज़ाइनर परिधान को वही ख़रीदते हैं जो उसे समझ पाते है. इसमें कोई अचंभे वाली बात नहीं है.

पंडित रविशंकर को वही सुन पाएगा जिसमें उसके लिए योग्यता होगी. मीका और दलेर मेहंदी को सब सुनेंगे लेकिन ऐसे कलाकारों को वही लोग सुन पाएंगे जिनमें थोड़ी योग्यता होगी.

यदि आप वैसी योग्यता चाहते हैं तो थोड़ा गीत-संगीत सीखिए, आप अच्छे श्रोता भी बन जाएंगे. हमारे देश में भारत रत्न जैसा सम्मान पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर, भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को दिया जाता है. यह सम्मान यहां कभी भी किसी पॉप गायक को नहीं दिया जाएगा.

इसलिए हम बेहद संतुष्ट हैं कि हमारे तरह के संगीत को काफ़ी आदर मिलता है, उसका एक अलग स्थान है और यह काफी सुरक्षित है. जब तक भारत है तब तक यह संगीत बना रहेगा.

आप कई फ़िल्में बना चुके हैं और आपकी कई फ़िल्में बन भी रही हैं तो फ़िल्मों की ओर आपका रुझान कैसे हुआ?

हर इंसान के अंदर प्रोडक्शन का कीड़ा होता है. जैसे आप रेडियो अनाउंसर हैं तो आपके मन में होगा कि आपका अपना रेडियो होना चाहिए. जो साबुन बेचता है उसका मन होता है कि उसकी साबुन की फ़ैक्ट्री होनी चाहिए. ऐसे ही हम फ़िल्मों में गाते हैं और संगीत देते हैं तो मन होता है कि अपनी फ़िल्म बनाई जाए.

यह कीड़ा मेरे मन में भी है और आपके मन में भी है. जो लोग सक्षम होते हैं वे इसे पूरा करने में कामयाब होते हैं.

गायकी के क्षेत्र में ऐसी कौन सी हस्तियां हैं जिन्हें आप अपना आदर्श मानते हैं?

मैं आपको और गुरुओं के नाम गिनाऊं जिनको सुन सुनकर सीखा है उनमें बेग़म अख़्तर, मेहंदी हसन, ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह, पंडित जसराज, भीमसेन जोशी, हरि प्रसाद चौरसिया, पंडित रविशंकर, शिवकुमार शर्मा जी, पंडित रामनारायण के नाम शामिल हैं. लेकिन विधिवत गुरू पिताजी हैं जिनसे हमने संगीत सीखा है.

आपका जन्म नैतीताल में हुआ. लेकिन अब पहाड़ी इलाक़े काफ़ी बदल गए हैं. आज का नैनीताल तब से लेकर अब कितना बदल गया है?

उन दिनों पहाड़ थे, अब इमारतों के बीच में पहाड़ ढूंढने पड़ते हैं. पहाड़ों में काफी इमारतें, होटल और गेस्टहाउस बना दिए गए हैं कि पहाड़ नज़र नहीं आते. यही वजह है कि पहाड़ उन्हें झेल नहीं पाते और टूटने लगते हैं.

हाल में उत्तराखंड में जो हुआ इसकी वजह यह भी थी कि वहां अत्यधिक निर्माण कार्य हुआ, वह जगह बेहद कमज़ोर हो गई और इतने लोगों को जान गंवानी पड़ी.

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