फ़िल्म रिव्यू: 'बॉस'
- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक

रेटिंग: ***
वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स, केप ऑफ़ गुड फ़िल्म्स और अश्विन वर्दे की 'बॉस' एक एक्शन फ़िल्म है जो पिता-पुत्र रिश्ते पर आधारित है.
फ़िल्म की कहानी है एक ईमानदार स्कूल प्रिसिंपल सत्यकांत शास्त्री (मिथुन चक्रवर्ती) और उसके दो बेटों सूर्या (अक्षय कुमार) और शिव (शिव पंडित) की.
सूर्या, बचपन से ही बेहद गुस्सैल स्वभाव का है और अपने पिता या परिवार के ख़िलाफ़ कुछ भी सुनना बर्दाश्त नहीं कर पाता.

जब वो छोटा था तभी अपने एक साथी की हत्या इसलिए कर देता है क्योंकि वो उसके पिता का मज़ाक उड़ाता है.
सूर्यकांत, इसी वजह से सूर्या को अपने घर से बेदखल कर देता है.
फ़िल्म की कहानी सूर्या के बड़े होने, और एक दरियादिल कॉन्ट्रेक्ट किलर बनने की घटनाओं के बीच आगे बढ़ती है.
कैसे उसके पिता (जिन्होंने उसे बचपन में बेदखल कर दिया था) उसकी मदद लेने को मजबूर हो जाते हैं और कैसे वो अपने छोटे भाई को बचाने और मारने की कशमकश में पड़ जाता है. यही आगे दिखाया गया है.
स्क्रीनप्ले
फ़िल्म, मलयालम फ़िल्म 'पोकरी राजा' का रीमेक है. फ़रहाद-साजिद की लिखी कहानी में कई जगह दोहराव नज़र आता है लेकिन एक्शन और फ़ैमिली ड्रामा को बखूबी दिखाया गया है.

पिता-पुत्र के रिश्तों को अच्छी तरह से दिखाया गया है जो दर्शकों को अपील करेगा. स्क्रीनप्ले (फ़रहाद-साजिद) में कई दिलचस्प मोड़ हैं जिसकी वजह से दर्शक फ़िल्म से बंधे रहेंगे.
कहीं कहीं पर फ़िल्म बोझिल लगने लगती है लेकिन ये बोरियत ज़्यादा समय तक के लिए नहीं है. फ़िल्म का ड्रामा हर तरह के दर्शक वर्ग को कहीं ना कहीं ज़रूर पसंद आएगा.
फ़िल्म की कॉमेडी माहौल को हल्का बनाए रखती है और दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देती है.
फ़िल्म के भावनात्मक दृश्य दर्शकों की आंखों से आंसू निकालने में भले ही कामयाब ना हो पाए लेकिन उनके दिलों को ज़रूर छू लेते हैं.
फ़िल्म के क्लाइमेक्स से पहले जब एक ख़ास सस्पेंस खुलता है तो दर्शकों को हैरान कर देता है. इस हिस्से को फ़िल्म की हाइलाइट कहना ग़लत नहीं होगा.
कमियां
ऐसा नहीं है कि स्क्रीनप्ले में कोई ख़ामी ही ना हो. कहानी की सहूलियत के हिसाब से कई सीन रच दिए गए हैं जिन पर सहज ही विश्वास करना मुमकिन नहीं होता.

फ़िल्म के पहले आधे घंटे सूर्या (अक्षय कुमार) के बचपन दिखाने में ही खर्च कर दिए गए हैं. यानी अक्षय की एंट्री फ़िल्म में देर से होती है. ये फ़िल्म की एक बड़ी कमी है.
अक्षय कुमार का फ़िल्म में कोई रोमांटिक ट्रैक नहीं है. शिव पंडित और अदिति राव हैदरी की जगह थोड़े ज़्यादा लोकप्रिय चेहरों को इन रोल्स के लिए लेना बेहतर होता.
फ़रहाद-साजिद के लिखे संवादों में दम है. ये कहना ग़लत नहीं होगा कि संवाद, फ़िल्म की मुख्य ताकत हैं.
अभिनय
अक्षय कुमार ने सूर्या उर्फ़ बॉस के रोल में ज़बरदस्त काम किया है. वो हास्य दृश्यों में शानदार रहे हैं, एक्शन दृश्यों में कमाल लगे हैं, बेहतरीन डांस किया है और भावनात्मक दृश्यों में भी अपनी छाप छोड़ दी है.
मिथुन चक्रवर्ती ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है. 'बिग बॉस' के रोल में डैनी डेंग्ज़ोंपा बेहद प्रभावी रहे हैं.

पुलिस अफ़सर के रोल में रोनित रॉय भी शानदार रहे हैं. उनके किरदार को देखकर उनसे चिढ़ होने लगती है और यही उनकी कामयाबी है.
दो गानों में सोनाक्षी सिन्हा की मौजूदगी फ़िल्म को ग्लैमर प्रदान करती है. अमिताभ बच्चन की कमेंट्री फ़िल्म की वैल्यू और बढ़ा देती है.
एंथनी डीसूज़ा का निर्देशन अच्छा है. उनका कहानी कहने का अंदाज़ हर दर्शक वर्ग को छू लेता है. 'पार्टी ऑल नाइट' और 'हम ना तोड़े', गाने लोगों को बहुत पसंद आएंगे.
कुल मिलाकर 'बॉस' एक मनोरंजक फ़िल्म है और दर्शकों को पसंद आएगी.
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