लता मंगेशकर पर भारी आशा भोसले?

अगर आपको किसी क्षेत्र में अपना मुकाम बनाना है, लेकिन उसका सबसे बड़ा फ़नकार आपके घर में मौजूद हो. तब आप क्या करेंगे?
आपने ये भी तो सुना ही होगा कि बरगद का पेड़ अपने नीचे किसी और पेड़ को उगने नहीं देता है. इससे आप क्या चिंतित हो जाएंगे?
आप कहीं काम मांगने जाते हैं और काम देने वाला कहता है काम तो है लेकिन आपके घर में मौजूद परफ़ेक्ट आदमी को ही देगा. तब आप क्या करेंगे?
ऐसे सवाल आपको बिलकुल परेशान नहीं करेंगे. अगर <link type="page"><caption> आपको आशा भोसले का ध्यान आ जाए</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/09/120910_asha_acting_dk.shtml" platform="highweb"/></link>.
क्योंकि कोई भी चुनौती लता मंगेशकर के साये में रहते हुए बतौर सिंगर स्थापित होने की चुनौती से बड़ी नहीं होगी.
'लता से बेहतर आशा'
लेकिन आशा भोसले ने केवल ऐसा कर दिखाया बल्कि कई विश्लेषकों की राय में वे लता मंगेशकर से भी बेहतर आवाज़ की मलिका थीं.
लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई फिल्मों में बतौर संगीतकार काम कर चुके समीर टंडन ने बीबीसी के रेडियो 4 से दोनों बहनों की तुलना करते हुए कहा, “आवाज़ के नज़रिए से देखें तो आशा भोसले तीन ऑक्टेव तक गाती रहीं जबकि लता जी की आवाज़ ज़्यादा से ज़्यादा दो-ढाई ऑक्टेव तक पहुंच पाती थी. वर्सेटेलिटी के नजरिए से भी देखें तो आशा भोसले कहीं ज़्यादा बेहतर नज़र आती हैं. सेक्सी गाने हों या फिर रॉक एंड रोल्स के गाने लता जी ने कभी नहीं गाए.”
इतना ही नहीं समीर टंडन के मुताबिक एक और पहलू ऐसा था जिसमें <link type="page"><caption> आशा भोसले लता जी </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/09/110908_asha_bhosle2011_ar.shtml" platform="highweb"/></link>के मुक़ाबले बीस साबित होती हैं. समीर आर डी बर्मन की बतौर म्यूज़िक डायरेक्टर पहली फिल्म तीसरी मंजिल का गीत आ जा आ जा दे दूं प्यार तेरा का जिक्र करते हुए कहते हैं, “इस गाने के दौरान आशा जी के सांसों का उतार चढ़ाव देखिए. ब्रीथिंग तकनीक में वे बेहतर दिखाई देती हैं.”
आशा ज़्यादा वर्सेटाइल

आशा भोसले की आवाज़ में कहीं ज्यादा विविधता थी. यही वजह है कि वे जिस सहजता से फ़िल्मी गीत गा लेती थीं उसी तन्मयता से पॉप, कैबरे, गजल और भजन भी गाती रहीं.
चाहे वह भारतीय शास्त्रीय संगीत की धुनें रही हों या फिर लोक संगीत, कव्वाली या फिर रबींद्र संगीत. आशा को जो भी मौके मिले उन्होंने उसे अपने अंदाज में रंग दिया.
फ़िल्म पत्रकार शशि बलिगा कहती हैं, “आशा ने अपना रास्ता ख़ुद बनाया. लता मंगेशकर ने कभी ये नहीं कहा कि आशा ये मेरा गीत है लेकिन तुम्हारे लिए इसे मैं छोड़ रही हूं. या दूसरे से कहा कि ये गीत आशा को दे दो.”
आशा की आवाज़ में जिस तरह का चुहलपन और खिलंदड़ापन दिखता है, वो उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों से सीखा है.
अनुभव के रंग
महज 16 साल की उम्र में उन्होंने अपने परिवार वालों के विरोध के बावजूद लता जी के सचिव गणपत राव भोसले से शादी करने के लिए घर छोड़ दिया.
लेकिन गणपत राव भोसले के साथ उनकी शादी कामयाब नहीं हुई. आशा जी फिर से अपने परिवार में लौटीं और संगीत की दुनिया में जगह बनाने के लिए कोशिशों में जुट गईं. तब तक आशा भोसले तीन बच्चों की मां बन चुकी थी.
शशि बलिगा कहती हैं, “लता जी को ये एकदम पसंद नहीं था कि आशा उनके सचिव से शादी करें. वे नाराज़ भी हो गई थीं लेकिन बाद में उन्होंने अपनी बहन का साथ दिया.”
लता जी ने मानसिक तौर पर आशा जी को संबल जरूर दिया लेकिन पेशेवर दुनिया में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी. क्योंकि 50-60 के दशक में गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर के रहते हुए किसी का जगह बनाना मुश्किल भरा था.
ऐसे में आशा जी ने सेकेंड और थर्ड ग्रेड की फिल्मों के लिए गाने गाए. अपने बच्चों को पालने के लिए वे हर तरह के गाने गाने को तैयार थीं. ऐसे में वैंप और कैबरे की गीतों में गुंजाइश बनी तो वो वहीं काबिज़ हो गईं.
1957 में बीआर चोपड़ा की फ़िल्म नया दौर में उनके गाए गीत मांग के साथ तुम्हारा और उड़े जब जब जुल्फें तेरी, कंवारियों का दिल मचले के बाद आशा भोसले अव्वल दर्जे की गायिका में शामिल हो गईं.

इसी दौरान उनका साथ संगीतकार आरडी बर्मन से बना और इन दोनों ने मिलकर पिया तू अब तो आ जा, चुरा लिया है तुमने जो दिल को और भली भली सी एक सूरत से लेकर मेरा कुछ समान तुम्हारे पास पड़ा है और खाली हाथ शाम आई है जैसे बेमिसाल गीत भारतीय फिल्म जगत को दिए.
दोनों ने बाद में 1980 में शादी कर ली.
लता- आशा एकसाथ
लेकिन साठ के दशक के बाद से लता मंगेशकर और आशा भोसले भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया पर काबिज हो गईं और करीब चार-पांच दशक के बाद भी<link type="page"><caption> दोनों शीर्ष पर काबिज हैं.</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/04/110425_asha_bhosle_acting_ar.shtml" platform="highweb"/></link>
प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख़्तर ने बीबीसी के रेडियो 4 से कहा, “दोनों बहने बेमिसाल प्रतिभा की धनी हैं, इन दोनों के रहते हुए किसी के लिए कोई जगह ही नहीं बची.”
एक ओर जहां लता मंगेशकर की आवाज में एक सुरीलापन और रुमानियत का अहसास था तो आशा भोसले की आवाज़ में अपनी तरह का बिंदासपन मौजूद था. इन दोनों के बीच खटपट की ख़बरें भी आती रहीं.
ऐसे भी मौके आए जब इन दोनों ने एक साथ मिलकर गाना गाया. जब ये दोनों बहनें एक साथ हुईं तो बॉलीवुड को मेरे महबूब में क्या नहीं, क्या नहीं और मैं चली, मैं चली जैसे गाने मिले. इतना ही नहीं दोनों के गानों की फेहरिस्त उत्सव फ़िल्म के गीत मन क्यों बहका रे बहका आधी रात के जिक्र के बिना अधूरी रहेगी.
गिनीज़ बुक में आशा
दोनों एक साथ टॉप पर दशकों तक बनी रही. यूनिवर्सल म्यूज़िक के मैनेजिंग डायरेक्टर देवराज सान्याल ने बीबीसी रेडियो 4 को बताया, “हम कई कलाकारों के रिकॉर्ड बेचते हैं लेकिन लता मंगेशकर और आशा भोसले के रिकॉर्ड सबसे ज़्यादा बिकते हैं. बीते 70 दशकों से कोई भी उनके आसपास नहीं पहुंचा है.”

वर्ल्ड रिकॉर्ड अकादमी के मुताबिक आशा भोसले दुनिया भर में <link type="page"><caption> सबसे ज़्यादा रिकॉर्ड की जाने वाली गायिका</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2010/11/101119_asha_album_ar.shtml" platform="highweb"/></link> थीं. इसके चलते संगीत के इतिहास में सबसे ज़्यादा रिकॉर्ड होने वाली गायिका के तौर पर उनका नाम 2011 में गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हुआ.
लता मंगेशकर भले आज गाना बंद कर चुकी हैं लेकिन आशा भोसले अभी भी अपनी आवाज़ के जादू से लोगों को चौंकाती रहती हैं.
80 साल की उम्र में भी उनकी सक्रियता बनी हुई है. वे इंडियन ऑयडल के कार्यक्रम की जज भी रह चुकी हैं.
आशा का ब्रांड
इतना ही नहीं युवाओं की दुनिया से रिश्ता कायम रखने के लिए वे ट्विटर से भी जुड़ी हैं.
आशा भोसले ने ना केवल गीत गाने के लिए वक्त निकालती हैं बल्कि अपने शौकिया कारोबार को भी विस्तार दे रही हैं. उन्हें खाना बनाने का जबर्दस्त शौक है और दुबई में उन्होंने तीन साल पहले अपना रेस्टोरेंट भी खोला है.
दरअसल कई विश्लेषक तो आशा भोसले को लता मंगेशकर के मुकाबले दमदार ब्रांड मानते हैं.
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