'...तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है'
बीबीसी के पाठकों के लिए खास पेशकश. हिंदी सिनेमा के 100 यादगार डायलॉग आपके लिए हम लेकर आए हैं. ये संकलन किया है वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने. पहले दो हिस्सों में हम पचास डायलॉग पेश कर चुके हैं. पेश है तीसरा हिस्सा.
51. अमर प्रेम (1972): निर्देशक- शक्ति सामंत
राजेश खन्ना: रो मत पुष्पा. आई हेट टियर्स.
52. रोटी कपड़ा और मकान (1974) : निर्देशक- मनोज कुमार
मनोज कुमार: तुम्हारी रामायण में राम नहीं मेरी रामायण में सीता नहीं.
53. रोटी कपड़ा और मकान (1974) : निर्देशक- मनोज कुमार
मनोज कुमार: ये मत सोचो कि देश ने तुमको क्या दिया. ये सोचो कि तुमने देश को क्या दिया.
54. शोले (1975): निर्देशक- रमेश सिप्पी, लेखक- सलीम जावेद
गब्बर सिंह: जो डर गया समझो मर गया.
55. अमर अकबर एंथनी (1977): निर्देशक-मनमोहन देसाई
अमिताभ बच्चन- ऐसा तो आदमी दोइच्च टाइम भागता है. ओलंपिक की रेस हो या पुलिस का केस. तुम काए को भागता है भाई.
56. विश्वनाथ (1978): निर्देशक- सुभाष घई

शत्रुघ्न सिन्हा: जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं और जिस राख में बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं.
57. फिल्म त्रिशूल (1978): निर्देशक- यश चोपड़ा
पिता पुत्र के संघर्ष की कहानी में पुत्र (अमिताभ बच्चन) पिता (संजीव कुमार) से कहता है.
अमिताभ बच्चन- आज आपके पास आपकी सारी दौलत सही लेकिन आपसे बड़ा ग़रीब मैने ज़िंदगी में नहीं देखा.
58. फिल्म: कालिया (1981), निर्देशक- टीनू आनंद
अमिताभ बच्चन: हम जहाँ खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरु होती है.
59. फिल्म: जाने भी दो यारो (1983), निर्देशक- कुंदन शाह
स्टेज पर महाभारत नाटक में कुछ पात्र अनचाहे ही पहुँच जाते हैं. वे नाटक का हिस्सा नहीं है.
बिल्डर- द्रोपदी तेरे अकेले की नहीं है हम सब शेयरहोल्डर हैं.
60. शराबी (1984) : निर्देशक- प्रकाश मेहरा
अमिताभ बच्चन: भई, मूंछे हों तो नत्थूलाल जी जैसी हों, वर्ना ना हों.
61. शराबी (1984): निर्देशक- प्रकाश मेहरा
अमिताभ बच्चन: आज इतनी भी मय नहीं मयख़ाने में जितनी पीकर छोड़ दिया करते थे हम पैमाने में.
62. इंसानियत के दुश्मन (1987)
धर्मेंद्र: इलाके कुत्ते और बिल्लियों के होते हैं. शेरों के नहीं. शेर जहां जाते हैं, वहीं उनकी दहशत होती है.
63. तेज़ाब (1988): निर्देशक- एन चंद्रा
अनिल कपूर: प्यार तो रहेगा. उसके दिल में नफरत की तरह, मेरे दिल में नासूर की तरह.
64. दामिनी (1993): निर्देशक- राजकुमार संतोषी
गोविंद (सनी देओल) नायिका (मीनाक्षी शेषाद्रि) का वकील है जिसे अपराधियों का वकील (अमरीश पुरी) कुछ गुंडे लाकर डराना चाहता है. गुंडे गोविंद (सनी देओल) को हथियार दिखाते हैं जिस पर सनी देओल: चड्ढा समझाओ इसे. ऐसे खिलौने बाज़ार में बहुत मिलते हैं. लेकिन इसे खेलने के लिए जो जिगर चाहिए ना, वो दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं मिलता. मर्द उसे लेकर पैदा होता है. और जब ये ढाई किलो का हाथ किसी पर पड़ता है तो आदमी उठता नहीं उठ जाता है.
65. दामिनी (1993): निर्देशक- राजकुमार संतोषी
सनी देओल: ये अदालत इंसाफ नहीं देती जज साहब. देती है तो बस तारीख पर तारीख
66. तिरंगा (1993): निर्देशक- मेहुल कुमार
नाना पाटेकर: अपना तो उसूल है, पहले लात, फिर बात उसके बाद मुलाकात
67. तिरंगा (1993):निर्देशक- मेहुल कुमार
नाना पाटेकर: 1500 की छोटी नौकरी करने वाला ही तुझे 150 रुपए का कफन देगा.
68. करण अर्जुन (1995): निर्देशक- राकेश रोशन
राखी: मेरे करण अर्जुन आएंगे. धरती का सीना फाड़कर खाएंगे. आकाश चीर कर आएंगे. मेरे करण अर्जुन आएंगे.
69. रिहाई (1997): निर्देशक- अरुणा राजे
जब गांव की पंचायत हेमा मालिनी को गांव छोड़ने का आदेश देती है तो एक बूढ़ी औरत: औरतों से सीता बनने की आशा करने वाले पुरुष क्या खुद राम की तरह काम करते हैं.
70. लगान (2001): निर्देशक- आशुतोष गोवरिकर
नायक भुवन गांव के लोगों में एकता लाना चाहता है. इस पर भुवन का दोस्त: तू गीली चुटकी से नमक पकड़ रहा है भुवन.
71. लगान (2001): निर्देशक- आशुतोष गोवरिकर
आमिर खान: चूल्हे से रोटी निकालने के लिए चिमटे का मुंह तो जलाना ही पड़ता है.
72. लगान (2001): निर्देशक- आशुतोष गोवरिकर
यशपाल: कटती हुई मुर्गी का दर्द तो मुर्गी ही जाने. खाने वाला क्या जाने.
73. देवदास (2002): निर्देशक- संजय लीला भंसाली
देवदास की माँ उससे घर छोड़ने के लिए कहती है. पारो की शादी हो चुकी है.
देवदास(शाहरुख़ खान): बाबूजी ने कहा पारो को छोड़ दो, पारो ने कहा शराब छोड़ दो, माँ ने कहा घर छोड़ दो, किसी दिन कोई कहेगा ये दुनिया छोड़ दो.
74. वांटेड (2009)
सलमान खान: एक बार मैने कमिटमेंट कर दी तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता.
75. बॉडीगार्ड (2011)
सलमान खान: मुझ पर एक एहसान करना कि मुझ पर कभी कोई एहसान मत करना.












