भारत के पास क्यों नहीं है अपना 'जेम्स बॉन्ड'

वर्ष 1962 में जेम्स बॉन्ड सिरीज़ की पहली फिल्म रिलीज़ हुई थी डॉक्टर नो. और ये है साल 2012. जब बॉन्ड सीरीज़ की 23वीं फिल्म रिलीज़ हुई है 'स्काईफॉल'.
यानी 50 साल का हो चुका है 'जेम्स बॉन्ड'. लेकिन इस खुफिया 'ब्रिटिश एजेंट' की लोकप्रियता में ज़रा भी कमी नहीं आई है.
सवाल ये उठता है कि भारतीय सिनेमा अब तक इस तरह का कोई किरदार क्यों नहीं गढ़ पाया है जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना लोकप्रिय हो.
बीच-बीच में भारतीय फिल्मकारों ने प्रयास ज़रूर किए हैं, लेकिन वो किरदार पहली फिल्मों से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.
फराह ख़ान ने बड़े अरमानों से अक्षय कुमार को लेकर फिल्म 'तीसमार खां' बनाई थी और ऐलान किया था कि वो इसे एक फ्रेंचाइज के तौर पर आगे बढ़ाएंगी. लेकिन फिल्म पिट गई और फराह के अरमान धरे के धरे रह गए.
शाहरुख ख़ान ने अपनी अतिमहत्वकांक्षी फिल्म 'रा.वन' बनाई. फिल्म के प्रमोशन पर शाहरुख ने कहा भी था कि वो इसके सीक्वेल जैसे 'रा.टू' और 'रा.थ्री' बना सकते हैं. लेकिन फिल्म को दर्शकों ने हाथों-हाथ नहीं लिया और फिलहाल शाहरुख इस फ्रेंचाइज़ को आगे बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पाए हैं.

सैफ अली ख़ान ने भी 'जेम्स बॉन्ड' की तर्ज पर किरदार गढ़ा 'एजेंट विनोद'. फिल्म के हश्र से शायद सभी वाकिफ हैं.
रा.वन के निर्देशक अनुभव सिन्हा कहते हैं, "भारत में फिल्मों की फ्रेंचाइज का कॉन्सेप्ट नया है. पहले ऐसी कोशिशों की लोगों ने ज़रूरत नहीं समझी, इसलिए अब तक हम जेम्स बॉन्ड जैसी फ्रेंचाइज नहीं बन पाए. लेकिन पिछले कुछ अरसे से ये कोशिश की गयी और फिल्मकार काफी हद तक उसमें कामयाब भी हुए."
ज़रूरत नहीं 'जेम्स बॉन्ड' सरीखे किरदार की ?
हॉलीवुड की मशहूर फ्रेंडाइज़ स्पाइडरमैन और अब रिलीज़ होने वाली फिल्म लाइफ ऑफ पाई में अभिनय करने वाले भारतीय अभिनेता इरफान मानते हैं कि हिंदी सिनेमा को 'जेम्स बॉन्ड' सरीखे किसी किरदार की ज़रूरत नहीं है.
वो कहते हैं, "हमारे पास खुद के इतने पौराणिक और ऐतिहासिक किरदार है. उन्हें ज़रूर फ्रेंचाइज़ के तौर पर विकसित किया जा सकता है. हमें पश्चिम की कोरी नकल करके जेम्स बॉन्ड सरीखा किरदार रचने की ज़रूरत क्या है."
अभिनेत्री तब्बू मानती हैं कि दरअसल बॉन्ड सरीखे किरदार फिल्मों में लंबे समय तक तभी चल सकते हैं जब कई लोग एक टीम के तौर पर मिलकर पूरी लगन और फोकस के साथ काम करें. शायद यही वजह है कि हम अब तक ऐसा किरदार नहीं बना पाए हैं.
तब्बू कहती हैं, "वैसे ये आयडिया अच्छा है और हमें भी इस दिशा की तरफ सोचना चाहिए."

हे बेबी और हाउसफुल सीरीज़ की फिल्मों के निर्देशक साजिद खान कहते हैं, "हमारे यहां जेम्स बॉन्ड सरीखे किरदार इसलिए नहीं हो सकते क्योंकि हमारे यहां सुपरहीरो का कॉन्सेप्ट ही नहीं है. हमारे यहां कहानी में ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है, बजाय किसी चरित्र विशेष के."
लेकिन साजिद ये कहना भी नहीं भूले कि क्रिश और धूम जैसी फिल्में हैं जिनमें एक खास चरित्र पर ज़ोर दिया जाता है. जैसे धूम सीरीज़ की फिल्मों में किरदार चोर का ही है लेकिन धूम-1 में वो जॉन अब्राहम ने निभाया था, धूम-2 में ऋतिक रोशन और अब धूम-3 में इसे आमिर ख़ान निभा रहे हैं.
नकल की जरूरत नहीं
फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी कहती हैं, "देखिए, अगर पश्चिम जेम्स बॉन्ड सरीखा किरदार बनाता है तो हमें भी उसी तर्ज पर किसी किरदार की क्या ज़रूरत है. भारतीय फिल्में जिस तरह से बनती चली आ रही हैं. अलग-अलग कहानियों के साथ. गानों के साथ, वैसी ही बनती रहनी चाहिए. अगर हम बिना कोई किरदार गढ़े भी सफलता पा रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि हमें इसकी ज़रूरत है."
नम्रता के मुताबिक हॉलीवुड स्टाइल की कोई फिल्म बनाकर, हॉलीवुड की तर्ज पर किरदार गढ़कर हम अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परोसें तो इसका क्या फायदा. हम उन्हें उन्हीं की चीज़ बेचें ये तो कोई समझदारी ना हुई.












