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विजय देवरकोंडा: बचपन से 'बायकॉट लाइगर' तक की कहानी
- Author, स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'मैं अपने संघर्ष के दिनों के बारे में सोचना ही नहीं चाहता, मुझे डर लगने लगता है. मेरी ज़िंदगी फ़िल्म की तरह है. मेरे सामने बहुत सारी दिक्कतें थीं. कभी-कभी मैं सोचता था कि मेरे पिताजी बड़े एक्टर या प्रोड्यूसर होते. ''
कुछ साल पहले विजय देवरकोंडा ने एक इंटरव्यू में यह बात कही थी. उनकी फ़िल्म लाइगर रिलीज़ होने वाली है और वह इसके प्रचार में व्यस्त हैं.
हालांकि, इन दिनों वह विवाद में भी आ गए हैं. 'बायकॉट ट्रेंड' को लेकर उनके बयान के बाद ट्विटर पर 'बायकॉट लाइगर' ट्रेंड करने लगा.
इससे इतर, सोशल मीडिया ख़ास तौर पर इंस्टाग्राम पर विजय देवरकोंडा के सादे कपड़े और स्लिपर पर काफी रील्स बन रही हैं, जिसमें लोग उन्हें 'ग्राउंड टू अर्थ' बताते हैं.
जानते हैं उनके करियर, ज़िंदगी और 'बायकॉट' विवाद के बारे में
विजय देवरकोंडा के करियर पर एक नज़र
शाहिद कपूर की फ़िल्म कबीर सिंह 'अर्जुन रेड्डी' की रीमेक थी. बॉक्स ऑफिस पर दोनों ही फ़िल्में कमाई के लिहाज़ से अच्छी चली. हालांकि, दोनों ही फ़िल्मों को आलोचकों ने 'औरत को अपनी जागीर मानने वाला' और 'वो मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं होगी' वाली मानसिकता वाला भी बताया.
विजय देवरकोंडा के करियर में अर्जुन रेड्डी ऐसी फ़िल्म साबित हुई, जिससे वह बड़े दर्शक वर्ग तक अपनी पहुंच बनाने में सफल रहे. तेलुगू फ़िल्म उद्योग के बारे में ऐसा कहा जाता है कि अगर आपको इस उद्योग को समझना है तो आपको कुछ परिवारों के बारे में सबसे पहले जानना होगा और उसमें बड़ा नाम है 'चिरंजीवी परिवार' और ' अल्लू परिवार'. इस लिहाज़ से विजय को ऐसे कलाकारों की सूची में शामिल किया जाता है, जिन्होंने अपनी यात्रा खुद तय की.
अर्जुन रेड्डी के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (तेलुगू) का अवॉर्ड भी मिला.
विजय देवरकोंडा का जन्म हैदराबाद में हुआ है और वह 33 साल के हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई पुट्टपर्थी के बोर्डिंग स्कूल में हुई. अभिनय के अलावा उनकी दिलचस्पी निर्देशन में भी है.
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत तेलुगू फ़िल्म नुव्वीला से की. 2015 में उनकी फ़िल्म आई 'यवडे सुब्रह्मण्यम'. लेकिन अब भी मुख्य किरदार के रूप में वह पर्दे से गायब थे. और उन्हें इंतज़ार था उसी एक ब्रेक का था.
'पिंकविला' के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, '' मैं अपने संघर्ष के बारे में सोचना नहीं चाहता क्योंकि मुझे डर लगने लगता है. मेरी ज़िंदगी फ़िल्म की तरह है. मैंने कभी इसे (एक्टिंग) छोड़ने के बारे में नहीं सोचा क्योंकि मेरे पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था. मैंने सिर्फ़ खुद को एक ही ऑप्शन दिया था कि 25 साल तक में मुझे यह करना है. मैं ऐसा नहीं बनना चाहता था कि 35 साल का हो के भी मैं एक्टिंग के लिए काम खोजूं. मुझे यह पता था.''
इसके बाद 'पेली चोपुलू' आई और इस फ़िल्म में वह मुख्य भूमिका में थे. फ़िल्म को न केवल दर्शकों ने सराहा बल्कि कमाई के लिहाज़ से भी यह अच्छी चली. यह दो राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीतने में भी सफल रही.
इसी इंटरव्यू में अपनी फ़िल्मी यात्रा के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह कहा कि कभी वह यह सोचते थे कि उनके पिताजी बड़े एक्टर या प्रोड्यूसर होते. हालांकि, उनके घर में इस बात की आज़ादी थी कि वह अपने करियर चुनें और यही बात उनकी ताकत रही.
तेलुगू फ़िल्म समीक्षक भारद्वाज कहते हैं, '' तेलुगू फ़िल्म उद्योग में एनटी रामा राव जूनियर, अल्लू अर्जून, महेश बाबू बड़े स्टार्स हैं. विजय उभरते हुए कलाकार हैं. लोग उन्हें पसंद कर रहे हैं. पेली चोपुलू एक अच्छी फ़िल्म थी. बाहुबली ने प्रभास को देश के बड़े स्टार में शामिल कर दिया था. लाइगर के साथ विजय भी देश के बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच रहे हैं. आगे दर्शक विजय को कितना प्यार करते हैं और विजय खुद कैसी पटकथा चुनते हैं, इस पर उनका करियर काफी निर्भर करेगा.''
लाइगर का फ़िल्म प्रचार सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन 'बायकॉट लाल सिंह चड्ढा' पर एक बयान के बाद कुछ लोग ट्विटर पर उनकी फ़िल्म का बहिष्कार करने लगे.
क्या है पूरा मामला
लाइगर हिंदी-तेलुगु फ़िल्म है. इस फ़िल्म का निर्देशन पुरी जगन्नाध और प्रोड्यूस करण जौहर ने किया है.
हाल ही में इंडिया टुडे के साथ इंटरव्यू में उन्होंने 'बायकॉट ट्रेंड' पर बात की. उनका कहना था कि जब एक फ़िल्म का बहिष्कार किया जाता है तो उससे सिर्फ़ मुख्य कलाकार प्रभावित नहीं होते बल्कि फ़िल्म से जुड़े कई लोग प्रभावित होते हैं.
उन्होंने कहा, ''फ़िल्म सेट पर अभिनेता, अभिनेत्री और निर्देशक के अलावा और भी लोग होते हैं. एक फ़िल्म में हज़ार-हज़ार लोग काम करते हैं. अगर आमिर एक फ़िल्म बनाते हैं. उसमें सिर्फ़ वही नहीं हैं. दो-तीन हज़ार परिवार का घर उसी से चल रहा है. जब आप फ़िल्म के बहिष्कार करने का फै़सला करते हैं तो आप न सिर्फ़ आमिर खान को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, आप हज़ारों लोगों को प्रभावित करते हैं. मुझे नहीं पता कि बायकॉट के पीछे की वजह क्या है. मुझे यह पता है कि ऐसा चल रहा है. आप इकोनॉमी को प्रभावित कर रहे हैं.''
उनके इस बयान के बाद न केवल 'बायकॉट लाइगर' ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा बल्कि करण जौहर और अनन्या पांडे को भी लोगों ने निशाने पर लिया.
उनसे विजयवाड़ा में फ़िल्म प्रमोशन के दौरान जब इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था, ''तीन साल पहले जब इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू की तो 'बायकॉट बॉलीवुड' का ट्रेंड नहीं था. यह सब लॉकडाउन में शुरू हुआ और हम तब शूटिंग में लग गए थे. उस समय हमें लगा था कि फ़िल्म को पूरे भारत तक पहुंचाने के लिए करण जौहर से बेहतर कोई और नहीं हो सकता. ''
वहीं, 'पॉप डायरीज़' को दिए एक इंटरव्यू में जब उनसे ट्रोलिंग के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, '' तो करने दो बायकॉट, क्या करेंगे हम. हम तो पिक्चर बनाएंगे, जिन्हें पिक्चर देखनी है वो देखेंगे, जिन्हें नहीं देखनी वो टीवी पर या फोन पर देखेंगे.''
फ़िल्म, प्रचार और ट्रोल के बीच वह अपनी चप्पल के लिए चर्चा में हैं. उनसे पिंकविला पर एक दर्शक ने इसके पीछे की वजह पूछी तो उनका कहना था कि यह उसी तरह है जैसे आप इडली खाना चाहते हैं. चाय पीना चाहते हैं. बस अच्छा लग रहा है इसलिए.
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