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पंडित शिवकुमार शर्माः जिन्होंने घाटी के वाद्य को घर-घर पहुँचाया
- Author, अंजुम शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
करीब 12 साल पुरानी बात है. पंडित शिवकुमार शर्मा का दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम था. अच्छी तादाद में छात्र उन्हें सुनने आए थे.
कई उनकी विरासत को महसूस करना चाहते थे तो कई उस अखरोट की लकड़ी की छड़ों को देखने आए थे जिसे संतूर के तारों पर रखते ही वातावरण में नया आवर्तन भर जाता है.
चूंकि उनका वास्ता जम्मू और कश्मीर से रहा, इसलिए उन्हें डोगरी में बात करना पसंद था.
कार्यक्रम से पहले जब पंडित शिवकुमार शर्मा संतूर के बारे में बता रहे थे तो जम्मू की एक छात्रा ने डोगरी में पूछा कि इस लकड़ी को क्या कहते हैं?
पंडित शिवकुमार शर्मा हल्का सा मुस्कुराए और उन छोटी-छोटी लकड़ियों को उठाते हुए पहले डोगरी में बोले फिर हिंदी में समझाया कि इसे 'कलम' कहते हैं जिसे अखरोट की लकड़ी से बनाया जाता है.
उन्होंने बताया कि संतूर दुनिया का एकमात्र ऐसा तारवाला साज़ है जिसे इस कलम से ही बजाया जा सकता है. हॉल में तालियां गूंजी और संयोजक ने मेरे कान में कहा, "और पंडित जी एकमात्र कलमधारी."
ऐसे साज़ को जम्मू और कश्मीर की वादियों से निकाल कर दुनिया भर में शोहरत दिलाने वाले पंडित शिवकुमार शर्मा अब हमारे बीच नहीं रहे.
84 वर्षीय संगीतकार पिछले कुछ महीनों से डायलिसिस पर थे. मंगलवार सुबह उन्हें मुंबई में दिल का दौरा पड़ा जिससे उनका निधन हो गया.
प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित मधुप मुद्गल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि जैसा पंडित शिवकुमार शर्मा का संगीत था वैसा ही उनका स्वभाव था.
उन्हें याद करते हुए उन्होंने कहा, "एक बार उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने उनसे कहा था लय और ताल पर जैसी अतुलनीय पकड़ शिवकुमार शर्मा की है, वैसा उदाहरण दूसरा देखने को नहीं मिलता."
संतूर का सफ़र
पंडित शिवकुमार शर्मा ने 5 साल की उम्र में पहले गायन सीखा फिर तबला. अपने पिता के कहने पर उन्होंने संतूर की तरफ रुख़ किया. उनके पिता पंडित उमादत्त शर्मा बनारस घराने के बड़े गायक थे.
चूंकि शिवकुमार शर्मा गाना जानते थे, तबला जानते थे इसलिए उनके लिए संतूर सीखना ज्यादा मुश्किल नहीं था.
मुश्किल था, जम्मू और कश्मीर की संस्कृति में बसे इस प्राचीन शततंत्री वाद्य (सौ तार वाले वाद्य) की तरंग को दुनिया भर के लोगों के दिलों तक पहुंचाना.
अपनी युवावस्था में जब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संतूर वादन की प्रस्तुति दी तो उनके सामने बड़े ग़ुलाम अली खान, अमीर ख़ान, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी, अली अकबर खां, विलायत ख़ां, पंडित किशन महाराज जैसे कलाकार बैठे थे.
पंडित शिवकुमार शर्मा ये बात कई जगह कह चुके हैं कि उन्हें घबराहट नहीं हुई क्योंकि उनका लक्ष्य साफ़ था.
प्रस्तुति के बाद उनकी तारीफ हुई मगर साज़ को लेकर कुछ सवाल उठाए गए. लेकिन शिवकुमार शर्मा को साज़ और सुरों की शुद्धता पर भरोसा था.
धीरे-धीरे उनका समर्पण और संतूर की कोमलता लोगों तक पहुंचने लगी और पंडित शिवकुमार शर्मा और संतूर एक दूसरे के पर्याय बन गए.
पंडित शर्मा मानते थे कि संगीत केवल मनोरंजन भर नहीं है बल्कि ईश्वर से जुड़ने का एक साधन है क्योंकि संगीत रूह को ताज़गी देता है. इसलिए उनके फिल्म संगीत में भी वह ताज़गी महसूस होती है.
फ़िल्म संगीत
1950 के दशक में उन्होंने 'झनक झनक पायल बाजे' फिल्म में पहली बार इस साज़ का इस्तेमाल किया.
पंडित शिवकुमार शर्मा को नौकरी पसंद नहीं थी और पिताजी को उनका नौकरीपसंद ना होना पसंद नहीं था. इसलिए पंडित शिव कुमार शर्मा मुंबई चले गए.
प्रसिद्ध बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया के साथ उनके सफल फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत हुई और शिव-हरि नाम की एक जोड़ी बनी जिसने सिलसिला, चांदनी, लम्हे, डर जैसी सुपरहिट फिल्मों का संगीत दिया.
हरिप्रसाद चौरसिया और शिवकुमार शर्मा पर जब 'सिलसिला' फिल्म के संगीत के लिए यश चोपड़ा दांव आज़मा रहे थे तो ये कसौटी केवल यश चोपड़ा के लिए नहीं थी बल्कि शिव-हरि के लिए भी थी कि वह शास्त्रीय संगीत की परंपरा को छोड़े बिना फ़िल्म संगीत को कैसे समृद्ध करें. उनका संगीत बहुत पसंद किया गया.
संगीत इतिहासकार यतींद्र मिश्र पंडित शिव कुमार शर्मा के योगदान के बारे में अपने एक लेख में लिखते हैं: "शिव-हरि की सांगीतिक देन सिनेमा की दुनिया में बाक़ी शास्त्रीय कलाकारों से अधिक रहा है. साथ ही, अपनी तर्ज़ों की रंजकता बरक़रार रखते हुए इस संगीतकार जोड़ी ने लोकप्रियता और व्यावसायिक सफलता का भी काफ़ी हद तक सफलतापूर्वक निर्वाह किया हुआ है. जहां शिवकुमार शर्मा ने संतूर जैसे वाद्य को लोक-संगीत के वाद्य की छवि से निकालकर शास्त्रीय संगीत के वाद्य के रूप में मान्यता दिलवाई, वहीं सिनेमा की दुनिया में इस साज़ के सहारे मींड़ का असरकारी काम गायिकी के माध्यम से आविष्कृत किया. उनके संगीत में अतिरिक्त मिठास इस कारण भी दिखाई पड़ती है कि उन्होंने बनारस घराने से संगीत की शिक्षा पाई थी, जो हमेशा से संगीत का गढ़ तो था ही, रस परंपरा के निर्वाह का भी अनूठा केंद्र माना जाता रहा है."
सृजनशीलता के लिए विख्यात
अपनी सृजनशीलता के लिए विख्यात शिवकुमार शर्मा हमेशा नया करने के हामी रहे. उनका ज़ोर यही रहा कि साज़ बजाने का तरीका कभी नकल न लगे इसलिए वो मंच पर भी प्रयोग करते थे.
प्रख्यात मोहनवीणा वादक विश्वमोहन भट्ट शिव कुमार शर्मा के निधन पर उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि मात्राओं का कैसे बंटवारा होना चाहिए, यह वह बखूबी जानते थे. वह रागदारी के लिए हमेशा जाने जाएंगे. "तीन ताल में झाप ताल, तीन ताल में रूपक, तीन ताल में एकताल, इतनी मुश्किल लयकारी शायद ही कोई कलाकार सोच सकता था."
घाटी से उठती तरंगों को घर-घर तक पहुंचाने का जो काम शिव कुमार शर्मा ने किया उसका दूसरा पर्याय नहीं मिलता.
उनके लहराते घुंघराले बाल भी उंगलियों के साथ थिरकते थे. उन्हें सुनने-देखने वाला सोचता रह जाता था कि उन्हें देख या सुने.
वाद्य संगीत के क्षेत्र में उन्होंने वास्तव में शास्त्रीय और लोक संगीत को एक धरातल पर लाने का ऐसा काम किया जिसपर बैठकर पहाड़ों से दूर कोई भी पहाड़ों को महसूस कर सकता है.
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