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सुशांत सिंह राजपूत और उनके सपनों के मायने
- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर
किसी साए की तरह.. मैँ हूँ भी और नहीं भी- रूमी
सुशांत सिंह राजपूत की ट्विटर वॉल पर लिखी उनकी ये पोस्ट सुशांत के होने और न होने दोनों का अजीब सा एहसास दिलाते हैं.
"वो जिसके पास जीने के लिए 'क्यों' है, वो'कैसे' को पार कर ही लेगा"- नीत्ज़े
"जब तक तुम ख़ुद में यक़ीन नहीं करोगे, तुम ईश्वर में भी यक़ीन नहीं कर पाओगे"-विवेकानंद
सोचती हूँ वो शख़्स कैसा होगा जो रूमी की शायरी से लेकर नित्ज़े, विवेकानंद के दर्शन को समझने-समझाने की ललक रखता हो. ये सारी पोस्ट्स उनके ट्विटर पर कई बार खोज खोज कर पढ़ी हैं.
सुशांत सिंह को गुज़रे एक साल हो गया, साल के इन 365 दिनों के तमाम लम्हों में सुशांत के बारे में ऐसा क्या ही है जो न कहा गया हो या न लिखा गया हो.
न जाने कितने फ़साने गली चौराहों और सोशल मीडिया पर उनके बारे में गढ़े और बोले जा चुके है.
फिर भी अनसुलझी पहेली की तरह है वो- चाँद तारों की सैर करता, दुनिया से बाहर एलियंस को समझने की कोशिश करता, दोनों हाथों से तीरंदाज़ी कर सकने की ख़्वाहिश रखता, डांस की कम से कम 10 विधाएँ सीखने की तमन्ना रखने वाला शख़्स, एंटार्कटिका घूमने का इरादा रखने वाला- ऐसा था सुशांत सिंह राजपूत.
सोचने समझने का दायरा
लगता है किसी कलाकार को रचते-रचते किसी दार्शनिक, किसी वैज्ञानिक, किसी मुसाफ़िर का भी अंश डाल दिया हो उसमें.
ख़्वाब हम सब देखते हैं, सुशांत ने भी देखे. शाहरुख़ की तरह बड़ा स्टार बनना था उसे. पर उनके सपने फ़िल्मी पर्दे के दायरे से कहीं बड़े थे. कम से कम उनकी बातों, उनकी पोस्ट से तो यही एहसास होता है. अब उन्हें जानने समझने का यही एक ज़रिया रह गया है.
अपने 50 सपनों की सुशांत की वो फ़ेहरिस्त मैंने कितनी बार उलट-पलट करके देखी है पिछले एक साल में. उसे साफ़-साफ़ पता था कि वो क्या हासिल कर लेना चाहता था.
कितनी करीने से सपनों की लिस्ट बनाई थी सुशांत ने. और जब कोई सपना पूरा हो जाता तो सपना नंबर 1 टिक , सपना नंबर 14 टिक- कैटालॉग की तरह सब कुछ दर्ज करता था.
जब बारिश के बावजूद डिज़नीलैंड जाने की ख़्वाहिश पूरी हुई तो उस दिन सुशांत ने लिखा था- "चाहे बारिश आए या बर्फ़ आपके सपने आपको जहाँ ले जाते हैं वहाँ तो जाना हो होगा."डिज़नीलैंड जाकर बच्चों सा चहकने वाला सुशांत.
एक एक्टर जो सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था उसे डांस सीखना था, बॉडी बनानी थी ये समझ में आता है पर ये कभी समझ में नहीं आया कि उसे लेफ़्ट हैंड से क्रिकेट खेलना क्यों सीखना था. उसे दोनों हाथों से तीरंदाज़ी करनी क्यों सीखनी थी.
मानो बहुत कुछ, सब कुछ कर हासिल कर लेना था उसे - दिल बेचारे के मैनी की तरह.
रूमी और अहमद फ़राज़ के साथ-साथ कुछ ऐसा भी पोस्ट किया करता था सुशांत- नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते मृगैः । विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेंद्रता..
यानी न किसी तरह का कोई अभिषेक किया जाता हैं, ना ही कोई अलग या विशेष संस्कार उसे दिये जाते हैं फिर भी सिंह को जंगल का राजा किसने बनाया ?
शहर छोटे होते हैं लोग नहीं
इस दुनिया की ही नहीं उसे एलियंस की दुनिया को भी समझना था. मुझे तो मिल्की वे गैलेक्सी ही पता था, उसे अपने टेलिस्कोप से , एंड्रोमेडा गैलेक्सी और न जाने क्या क्या देखना था.
उसे विमान उड़ाना सीखना था, उसे दुनिया की अजीबो-ग़रीब जगहों पर तैरना था. बहुत दूर तक जाना था उसे. ज़िंदगी के हर रंग को करीब से महसूस करना था.
काई पो चे के ईशान की तरह ....जो खुली हवा में साँस ले सकने को पैसों की खनक से ज़्यादा अहमियत देता था. "तेरे पैसों की छन छन से मेरी हवाओं की क़ीमत कम हो रही है- कुछ ऐसा ही बोला था ईशान ने अपने दोस्त से."
कहने को तो ये फ़िल्म (धोनी ) का डायलॉग भर था लेकिन सुशांत जब भी कहीं दिखता था तो ऐसे ही आत्मविश्वास से भरा नज़र आता था- "मुझे यक़ीन है कि सिर्फ़ शहर छोटे होते हैं वहाँ के लोग और ख़्वाब नहीं. मुझे यक़ीन है कि आदमी का कद उसके इरादों से नापा जाता है, मुझे यक़ीन है कि नसीब की बात सिर्फ़ वो करते हैं जो कभी मैदान में उतरे ही नहीं. मुझे यक़ीन है कि थकान और प्रेशर सिर्फ़ एक भ्रम है. मुझे यक़ीन है कि हार और जीत के बीच का फ़ासला बड़ा है पर नामुमकिन नहीं."
पर पता नहीं असल ज़िंदगी में हार और जीत का या फ़ासला सुशांत के लिए इतना बड़ा कैसे हो गया. यहाँ मक़सद सुशांत ख़ूबियाँ गिनाने का नहीं है, उसमें कई ख़ामियाँ रही होंगी. जैसे हम सबमें हैं.
थिएटर में लौटने की बात करते थे सुशांत
इस एक साल में सुशांत की निजी ज़िंदगी की चीर फाड़ में ड्र्ग्स , मेंटल इलनेस से लेकर परिवार की टूटन तक बहुत तरह की सच्ची-झूठी बातें निकल कर आईँ.
इन सच्ची -झूठी बातों में, आरोप-प्रत्यारोपों में सुशांत तो मानो खो सा ही गया था.
वो सुशांत जिसने पदमावत के समय करनी सेना के ख़िलाफ़ अपना नाम बदलकर सुशांत सिंह राजपूत से सुशांत कर लिया था.
वो सुशांत जो ये कहने की हौसला रखता था कि अगर मुझे फ़िल्में नहीं मिलेंगी तो मैं टीवी करना शुरू कर दूंगा और अगर टीवी नहीं मिलेगा तो थिएटर की तरफ़ लौट जाऊँगा. थिएटर में मैं 250 रुपए में शो करता था. मैं तब भी ख़ुश था क्योंकि मुझे अभिनय करना पसंद है. ऐसे में असफल होने का मुझे डर नहीं है."
ये शायद अबूझ पहेली ही रहेगी कि ज़िंदगी के किस दर्द, किस तकलीफ़ या किस ख़ौफ़ की ज़द में आकर सुशांत ने अलविदा कहने का फ़ैसला लिया होगा.
'अपने आप से कैसे भागूंगा'
बिहार से निकला लड़का जो मुंबई के ग्लैमर वर्ल्ड में दिन में सितारा बन ख़ूब चमकता था और रात को ख़ुद तारों की तलाश में आसमान को तकता रहता था.
कैसा इत्तेफ़ाक़ है कि अपनी पहली ही फ़िल्म में सुशांत यानी ईशान को पर्दे पर ज़िंदा रहना नसीब नहीं हुआ था. और ऐसा कई बार हुआ. फ़िल्म केदारनाथ का मंसूर भी तो सब छोड़ मौत के साए में चला गया था.
सोनचिड़िया का लाखन भी तो ख़ुद से भागते भागते मौत की ही आगोश में जाकर समाता है और पूछता है- "गैंग से तो भाग लूँगा, अपने आप से कैसे भागूँगा"
जब मनोज बाजपेयी सुशांत से पूछते हैं क्या उन्हें मरने से डर लगा रहा है तो सुशांत यानी लाखन कहता है, "एक जन्म निकल गया इन बीहड़ों में दद्दा, अब मरने से काहे डरेंगे."
और जब आख़िरी फ़िल्म आई तो भी दिल बेचारा का मैनी सबको जीना सिखा अलविदा कहा गया था.
सुशांत कई बार लेखक मुराकामी की इस पंक्ति का ज़िक्र करते थे-"If you remember me, then I don't care if everyone else forgets यानिअगर तुम मुझे याद रखोगे तो मुझे परवाह नहीं कि बाकी सब लोग मुझे भूल जाएँ.
अपने छोटे से करियर में सुशांत ने इतना नाम तो ज़रूर कमाया है कि उनके चाहनेवाले उन्हें याद रखेगें- फिर वो धोनी वाले सुशांत हो या इन सबसे इतर असल ज़िंदगी में चाँद सितारों वाले सुशांत.
वैसे अब तक तो उनके सपनों की फ़ेहरिस्त में कुछ टिक शायद और लग गए होंगे- कैलाश में जाकर ध्यान लगाने का सपना, सिक्स पैक का सपना, नासा की वर्कशॉप का सपना, एक हफ़्ता जंगल में बिताने का सपना, वेदिक ऐस्ट्रॉलिजी सीखने का सपना, अपने 50 पसंदीदा गानों पर गिटार बजाने का सपना...
सुशांत ने एक बार लिखा था-" मैने अपनी ज़िंदगी में 'शायद' के कई पुलिंदों को समेटा, उन्हें अपने सपनों में लपेटा, उन्हें जुनून से उल्टा पलटा और मानो सब हिल गया." मुझे ठीक से पता नहीं इसके क्या मायने हैं..उनकी कई पोस्ट अबूझ सी लगती थी.
ख़ैर सुशांत तो अब इस सबसे कहीं आगे निकल गए हैं पर पीछे छूट गए हैं तो बस उनके कुछ सपने, कुछ अनसुलझे सवाल और उनकी बातें जो आधी हक़ीकत आधे फ़साने की तरह समझ में आती भी हैं और नहीं भी.
वैसे कहते हैं कि सुशांत ने चाँद पर ज़मीन का टुकड़ा ख़रीद रखा था. शायद कुछ वैसी ही जैसी तस्वीरें वो अकसर ट्विटर पर डाला करते थे.
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