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'भारत की फ़िल्म इंडस्ट्री भी चीन की इंडस्ट्री जैसी हो गई', एफसीएटी ख़त्म करने पर बोले फ़िल्मकार
- Author, मधु पाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, मुंबई से
फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) को समाप्त करने के सरकार के निर्णय से फ़िल्म इंडस्ट्री के कई निर्माता, निर्देशक और लेखक बेहद नाराज़ हैं. उनका मानना है ऐसा करना उनकी रचनात्मकता को समाप्त करना है.
फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपनी फ़िल्मों में केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड की कांट-छांट या उन दृश्यों को हटाने की मांग के विरोध में अब तक क़ानून द्वारा स्थापित एफसीएटी का दरवाज़ा खटखटा सकते थे लेकिन इसे समाप्त करने के निर्णय के बाद ऐसा करना मुमकिन नहीं हो पाएगा. फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) की शुरुआत 1952 में हुई थी.
दरअसल क़ानून मंत्रालय ने निर्माताओं-निर्देशकों की अपील सुनने के लिए गठित इस सांविधिक निकाय फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है. अब केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड से नाख़ुश निर्माता-निर्देशकों को हाईकोर्ट का रुख़ करना होगा.
"बेहद ग़लत हो रहा है..."
जाने माने निर्माता मुकेश भट्ट बीबीसी हिंदी से ख़ास बातचीत में कहते हैं, "ये बेहद ग़लत हो रहा है. किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए बगैर अपनी बात कहना ग़लत नहीं हैं लेकिन अब ऐसा कैसे होगा? सेंसर बोर्ड के फ़ैसले से हम जब भी नाखुश होते थे तब हम एफसीएटी के पास जाते थे. वो हमारी बातें सुनता था. कभी फ़ैसला हक में आता तो कभी हक़ में नहीं होता था, पर वो सही था लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा. अब सीबीएफसी ही सर्वेसर्वा रहेगी और अब वो अपनी मनमानी करेंगे और मैं इसके सख्त ख़िलाफ़ हूँ."
मुकेश भट्ट कहते हैं, "जिस किसी ने भी ये फ़ैसला लिया है उसने फ़िल्ममेकर्स को बर्बाद कर दिया क्योंकि जब सीबीएफसी के ख़िलाफ़ उसे अपनी बात रखनी होगी तो उसे हाई कोर्ट जाना पड़ेगा. जज के पास पहले से कई अहम लंबित मामले होंगे. ऐसे में फ़िल्म के लिए कोर्ट में लड़ाई लंबी चलेगी. अब इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री भी चाइनीज़ फ़िल्म इंडस्ट्री की तरह हो गई हैं. दोनों में अब कोई फ़र्क़ नहीं है. अब निर्देशक और पटकथा लेखक को लिखने से पहले ये सोचना होगा कि जो मैं लिखने जा रहा हूँ सेंसर बोर्ड इसकी मंज़ूरी देगा या नहीं. यहीं से उनकी क्रिएटिविटी ख़त्म हो जाएगी."
सेंसर बोर्ड में सरकारी तरीके से काम
फ़िल्म अनारकली ऑफ़ आरा के गीत, सरकार 3 के डायलॉग और ज़ेड प्लस का स्क्रीन प्ले लिखने वाले रामकुमार सिंह कहते हैं, "ऐसा नहीं होना चाहिए था, मैंने देखा है सेंसर बोर्ड में कई लोग संवेदनशील नहीं होते, हालाँकि कई लोग बहुत समझदार भी हैं वहाँ. लेकिन मैं इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता कि सेंसर बोर्ड में लोग सरकारी नीति से चलते हैं. वहाँ सरकारी तरीके से काम होता है, वो कहते हैं ये लाइन मत लिखो ये मत कहो. ये क्रिएटिविटी हैं, जिसे फ़िल्म में डालने से क्या बदलाव होगा ये निर्देशक और लेखक बहुत अच्छी तरह से समझते हैं. वो इस बात को समझाने की कोशिश भी करते हैं. कई बार सेंसर बोर्ड समझता भी है."
"मुझसे 'प्रधानमंत्री' शब्द हटाने के लिए कहा गया"
अपनी फ़िल्म ज़ेड प्लस का ज़िक्र करते हुए रामकुमार कहते हैं, "मुझसे कहा गया था कि मैं अपनी इस फ़िल्म से प्रधानमंत्री शब्द हटा दूँ .प्रधानमंत्री ऐसी ग़लती नहीं कर सकते कि उनको अंग्रेज़ी या हिंदी नहीं आती हो. हमने उन्हें समझाया कि ये तो एक ड्रामा है, कहानी है. इसमें कैसे तय कर लेंगे कि पीएम को क्या आता है और क्या नहीं. अगर प्रधानमंत्री ही फ़िल्म से हटा दिया तो पूरी फ़िल्म ही ख़त्म हो जाएगी. ये कहानी प्रधानमंत्री और एक आम आदमी के बीच की दोस्ती की है. ये हमारा एक छोटा सा तर्क था. लेकिन जब वे नहीं माने तो हम एफसीएटी में गए और वहाँ फ़ैसला हमारे हक़ में आया."
रामकुमार साथ ही कहते हैं कि "वहाँ आपको कई ऐसे अनुभवी लोग भी मिल जाएंगे जिन्होंने पूरी दुनिया की कई फ़िल्में देखी हैं. ये फ़िल्म गुरु हैं जिन्हें सिनेमा की अच्छी समझ होती है."
"सेंसर बोर्ड में मनमानी करने वालों की कमी नहीं"
रामकुमार का यह भी कहना है कि सेंसर बोर्ड में कई लोग अपनी मनमानी भी करते नज़र आते हैं.
सेंसर बोर्ड के उन सदस्यों के बारे में रामकुमार कहते हैं, "वो कहते हैं कि ऐसा करना पड़ेगा नहीं तो हम आपको सर्टिफिकेट नहीं देंगे."
रामकुमार भारतीय शादी की मिसाल देते हुए कहते हैं कि, "जैसे शादी में दुल्हे की बुआ रूठ जाती है और पूछने पर अपनी मंजूरी नहीं देने की बात कहती है, यहाँ का हिसाब किताब भी ठीक उसी तरह नज़र आता है."
"मुझे और मेरे कई परिजन निर्देशकों और लेखकों के साथ ऐसा हुआ है. मेरे कई निर्देशक मित्र बताते हैं कि किस तरह उन्हें किसी सीन या शब्द को लेकर यहाँ परेशानी झेलनी पड़ी. फिर जब अपील करने एफसीएटी गए तो उनके पक्ष में फ़ैसला आया. लेकिन अब जब एफसीएटी को भंग करने से फ़िल्मों की यह प्रक्रिया जटिल कर दी गई है. सेंसर बोर्ड को सभी अधिकार देकर उन्हें और मजबूत कर दिया गया है."
"कोर्ट के चक्कर लगाने में फ़िल्म बनाने का मक़सद ख़त्म हो जाता है"
रामकुमार सिंह कहते हैं, "सरकार को कला के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें सोचना चाहिए कि कला एक अलग चीज़ है. मनोरंजन को मनोरंजन की तरह देखना चाहिए. अब जब निर्माता-निर्देशक सेंसर बोर्ड से सहमत नहीं होंगे तो उन्हें कोर्ट जाना पड़ेगा."
साथ ही रामकुमार यह भी कहते हैं कि, जब मामला कोर्ट में जाएगा तब क़ानून की गूढ़ जानकारी रखने वाले जज क्रिएटिविटी को भी उनती ही गूढ़ता से समझेंगे यह ज़रूरी नहीं है. वे क्रिएटिविटी की विवेचना भी कर लें यह भी ज़रूरी नहीं है."
फ़िल्मकारों के सामने आने वाली परेशानी को लेकर रामकुमार उन फ़िल्मों को याद करते हैं जिन्हें कोर्ट से मंज़ूरी लेनी पड़ी थी. वे कहते हैं, "जब शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन को सेंसर बोर्ड ने रोक दिया था तब सुप्रीम कोर्ट में यह लड़ाई गई और वहाँ उसे मंज़ूरी मिली थी. उसी तरह मोहल्ला अस्सी का मामला भी कोर्ट की दहलीज़ तक पहुँचा था. फिर जाकर कोर्ट ने कहा कि इसे नहीं रोक सकते तब यह रिलीज़ हुई. लेकिन फ़ैसला आते आते इसे बनाने का मक़सद ही ख़त्म हो गया."
रामकुमार उड़ता पंजाब की याद दिलाते हैं, "इस फ़िल्म को तो सेंसर बोर्ड ने सर्टिफिकेट देने से ही इनकार कर दिया था. इसे कोर्ट से मंज़ूरी मिली थी. इसलिए इस फ़िल्म की सेंसर सर्टिफिकेट पर लिखा है 'कोर्ट से अनुमति प्राप्त'. आने वाले वक़्त में शायद कई फ़िल्मों में ऐसा ही लिखा देखने को मिले."
हंसल मेहता, विशाल भारद्वाज का ट्विटर पर फूटा गुस्सा
मशहूर निर्माता-निर्देशक हंसल मेहता ने मंत्रालय के इस फ़ैसले पर अपने ट्विटर हैंडल से प्रतिक्रिया दी. उन्होंने लिखा, "क्या फ़िल्म प्रमाणन की शिकायतों के समाधान के लिए होई कोर्ट के पास इतना समय होता है? कितने फ़िल्म निर्माताओं के पास अदालतों का रुख़ करने का साधन होगा? एफसीएटी को भंग करना निश्चित तौर पर मनचाहा काम करने से रोकने वाला फ़ैसला है. यह इस समय क्यों किया गया? यह फ़ैसला लिया ही क्यों गया?"
फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने भी ट्विटर पर इस फ़ैसले की निंदा की और लिखा, "एफसीएटी को ख़त्म करना सिनेमा के लिए 'दुखद दिन' है."
विशाल भारद्वाज के ट्वीट पर फ़िल्म निर्माता गुनीत मोंगा ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा, "ऐसा कैसे होता है? कौन तय करता है?"
फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) अतीत में कई फ़िल्म निर्माताओं के लिए बहुत मददतगार साबित हुई है.
सेंसर बोर्ड ने जब लिपस्टिक अंडर माय बुर्क़ा, कुषाण नंदी की बाबूमोशाय बंदूकबाज, श्लोक शर्मा निर्देशितहरामख़ोर जैसी फ़िल्मों को सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया तो एफसीएटी का दरवाज़ा खटखटाया गया था और तब उसके सुझावों के बाद इन फ़िल्मों को 'ए' सर्टिफिकेट मिला था.
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