रामसे ब्रदर्स: हॉरर फ़िल्म बनाने वाला 7 भाइयों का कुनबा

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- Author, इक़बाल परवेज़
- पदनाम, फ़िल्म पत्रकार, मुंबई से बीबीसी हिंदी के लिए
चूंकि रामसे ब्रदर्स के पिता फ़तेहचंद रामसिंघानी का नाम लेने में अंग्रेज़ों को दिक़्क़त होती थी इसलिए उन्होंने रामसे नाम दे दिया. फ़तेहचंद के सात बेटों ने मिलकर रामसे को हॉरर का ब्रैंड बनाया.
रामसे ब्रदर्स ने रुपहले परदे पर ऐसा ख़ौफ़ बिखेरा कि वो इस जॉनर के मास्टर बन गए. 70 और 80 के दशक में रामसे ब्रदर्स ने क़रीब 45 फ़िल्में बनाईं. मनोरंजन की दुनिया में हॉरर है तो रामसे ब्रदर्स हैं और रामसे ब्रदर्स हैं तो हॉरर है.
आज की युवा पीढ़ी को लक्ष्मी, स्त्री, भूल भुलैया जैसी फ़िल्में पसंद हैं जिन्हें हॉरर कॉमेडी जॉनर के नाम से जाना जाता है.
आज के कुछ युवा दर्शक रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्मों को अटपटा भी मानते हैं मगर ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि हर दौर में दर्शकों की पसंद बदलती है. उस ज़माने में रामसे बंधुओं ने हॉरर जॉनर को अलग मुक़ाम तक पहुंचाया और अपना एक ऐसा ब्रैंड बनाया जो हमेशा ज़िंदा रहेगा.
श्याम रामसे की बेटी साशा श्याम रामसे ने आज और गुज़रे हुए दौर की हॉरर फ़िल्मों की तुलना और पसंद के बारे में बात करते हुए कहा, "आजकल जागरूकता बढ़ गई है. बहुत सारे माध्यम हो गए हैं जहां अलग-अलग फ़िल्में लोग देखते हैं. आजकल 10 साल का बच्चा भी बोल देता है कि ये ठीक नहीं लग रहा मगर वो दौर अलग था. उस दौर में हमारी फ़िल्मों को बड़ी सफलता मिली और आज भी दर्शक उन्हें देखते हैं. हाउस पार्टी में कई जगह मैं गई हूं जहां लोग पुरानी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फ़िल्में लगा कर देखते हैं. हमने अभी हाल में एक पार्टी में दोस्त के यहां 'वीराना' देखी."

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हॉरर फ़िल्मों में मुक़ाम
रामसे बंधुओं के साथ पुराना मंदिर सहित तीन फ़िल्में कर चुकी अभिनेत्री आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ कहती हैं, "पुराना मंदिर के लिए आज भी लोग पागल हैं. मधुर भंडारकर, अनुराग कश्यप जैसे लोग उस फ़िल्म के फै़न हैं. अनुराग कश्यप तो पुराना मंदिर की टी शर्ट बनवा कर पहनते हैं."

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वहीं रामसे बंधुओं के साथ तीन हॉरर फ़िल्में करने वालीं अभिनेत्री कुनिका लाल का मानना है, "उस समय तकनीक की कमी थी. उस समय इतना एक्सपोज़र नहीं था सोशल और डिज़िटल मीडिया का. हॉलीवुड सहित अब पूरी दुनिया की फ़िल्में या कंटेंट लोग देखते हैं और उससे तुलना होने लगती है. आज की तकनीक और टेस्ट भी बदला है और यही वजह है कि उन फ़िल्मों के दृश्य बचकाने लगते हैं. मगर उस समय की तकनीक और टेस्ट के हिसाब से वो बेहतरीन फ़िल्में थीं और अच्छी लगती थीं. उस समय सचमुच में रामसे ब्रदर्स की फ़िल्मों से दर्शक डरते थे."
रामसे ब्रदर्स ने हॉरर जॉनर में ऐसा मुक़ाम बनाया कि अब उनके जीवन पर फ़िल्म बनाने के लिए अजय देवगन जैसे अभिनेता और फ़िल्मकार ने राइट्स लिए हैं. रामसे बंधुओं पर बनने वाली फ़िल्म से आज के वो युवा भी उनके जीवन और उनके हॉरर ब्रांड के बारे में जानेंगे जिन्होंने उनकी फ़िल्में नहीं देखी हैं.
तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने बताया कि "रामसे ब्रदर्स पर अजय देवगन बड़ी फ़िल्म या वेब सिरीज़ बना रहे हैं. अजय देवगन को निर्णय लेना है कि वो फ़िल्म या वेब सिरीज़ में क्या बना रहे हैं. इसे 2021 में रिलीज़ करने की योजना है. इसके बनने के बाद वो युवा भी रामसे ब्रदर्स को जानेंगे जिन्होंने रामसे की फ़िल्में नहीं देखी हैं."
इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए रामसे ब्रदर्स के पिता फ़तेहचंद रामसे ने बुनियाद रखी. पाकिस्तान के लाहौर और कराची में फ़तेहचंद रामसे का रेडियो का कारोबार था. बंटवारे के समय वो अपने परिवार को लेकर मुंबई आ गए.
मुंबई में उन्होंने रेडियो की दुकान की. फ़तेहचंद रामसे के सात बेटे थे जिनमें कुछ रेडियो अच्छे से बनाना जानते थे. उनकी एक टेलरिंग और गारमेंट की दुकान भी थी. घर की रोज़ी रोटी चलाने के लिए या ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उनके पास सब कुछ था मगर फ़तेहचंद नहीं चाहते थे कि उनके बेटे इन दुकानों को चलाएं या ये काम करें. उन्हें फ़िल्म इंडस्ट्री में आना था. फ़तेहचंद को फ़िल्मों का शौक़ था.
1954 में रिलीज़ हुई फ़िल्म "शहीद-ए आज़म भगत सिंह" सहित कुछ फ़िल्मों को शुरुआत में फ़ाइनेंस किया और फिर 1964 में फ़िल्म "रुस्तम सोहराब" का निर्माण किया.
दीपक रामसे कहते हैं, "इस ऐतिहासिक फ़िल्म को बनाने में समय लगा और पैसे भी ज़्यादा लगे इसलिए कुछ ख़ास मुनाफ़ा नहीं हुआ. उस समय दादा को तकलीफ़ इस बात की होती थी कि निर्देशक और टेक्नीशियन अपने तरीके़ से काम करते थे और परेशान करते थे. तभी दादाजी को लगा कि उनका अपना कोई होता जो उनके साथ होता, और तभी उन्होंने अपने बेटों को ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी."

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फ़िल्मों की ट्रेनिंग
उस समय फ़तेहचंद रामसे अपने पूरे परिवार को लेकर कश्मीर गए और दो महीने के लिए हाउस बोट बुक किया. वहां एक किताब थी "5 सीज़ ऑफ सिनेमेटोग्राफी."
अपने बेटों को उस किताब को पढ़ाया. उसके बाद फ़िल्म मेकिंग के हर पहलू की ट्रेनिंग दी जिसमें संगीत भी शामिल था. मुंबई वापस आने के बाद फ़तेहचंद रामसे ने अपने बेटों को फ़िल्म मेकिंग सिखाने के लिए एक फ़िल्म शुरू की मगर निर्देशक और टेक्नीशियन ने उनके बेटों के साथ सिर्फ़ जूनियर की तरह व्यवहार किया और ठीक से नहीं सिखाया.
अपने बेटों को सिखाने के जुनून को फ़तेहचंद रामसे ने चुनौती की तरह लिया और पहली फ़िल्म सिंधी भाषा में बनाई जिसका नाम "नकली शान" था. इस फ़िल्म में सातों भाइयों ने साथ काम किया. कैमरामैन थे गंगू रामसे. तुलसी रामसे और श्याम रामसे ने निर्देशन की कमान संभाली. लेखक बने कुमार रामसे. साउंड इंजीनियर थे किरण रामसे. एडिटिंग की अर्जुन रामसे ने. और इस तरह रामसे ब्रदर्स ने अपने-अपने काम और ज़िम्मेदारियों को बांटा और शुरू हुआ रामसे बंधुओं के साम्राज्य को बनाने का.
साशा रामसे कहती हैं, "दादाजी की सोच अलग थी जिन्होंने सोचा कि हमारे बेटे हैं और इन्हें हम क्रिकेट टीम की तरह फ़िल्म मेकिंग के हर क्षेत्र में तैयार करेंगे. दादाजी ने ट्रेनिंग के बाद बाहर के किसी टेक्नीशियन को नहीं बुलाया क्योंकि उन्होंने अपनी टीम बना ली थी. पिता के नाते उन्होंने अपने सभी बेटों की काबिलियत को पहचाना और उस हिसाब से तराशा."
रामसे बंधुओं ने एकजुट होकर काम शुरू किया और फ़िल्म बनाई "नन्हीं मुन्नी लड़की". ये फ़िल्म सफल नहीं हुई मगर इस फ़िल्म के एक दृश्य ने, जहां पृथ्वी राज कपूर एक भूत का मास्क पहन कर लड़की को डराते हैं, ख़ूब वाहवाही बटोरी. इस एक सीन ने रामसे बंधुओं को प्रेरणा दी भुतही और डरावनी फ़िल्म बनाने के लिए. उसके बाद हॉरर फ़िल्म बनाई "दो ग़ज़ ज़मीन के नीचे".
साढ़े तीन लाख रुपये के छोटे से बजट में बनी इस फ़िल्म की शूटिंग 40 दिनों में मुकम्मल हुई. इस फ़िल्म ने रिलीज़ होने के बाद तहलका मचा दिया और 45 लाख रुपये का कारोबार किया. फ़िल्म "दो ग़ज़ ज़मीन के नीचे" के बाद रामसे ब्रदर्स ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हॉरर फ़िल्मों का सफ़र शुरू हुआ.
दीपक रामसे कहते हैं कि "उस समय 'दो ग़ज़ ज़मीन के नीचे' सबसे कामयाब फ़िल्मों में से एक थी जो रामसे बंधुओं के लिए गेम चेंजर थी. इस फ़िल्म के बाद तय किया गया था कि अब कोई और जॉनर की फ़िल्म नही बनाएंगे. सिर्फ़ और सिर्फ़ डरावनी फ़िल्म ही बनाएंगे और इस जॉनर को बेहतर बनाएंगे."

हॉरर फ़िल्मों की शुरुआत
फ़िल्म "दो ग़ज़ ज़मीन के नीचे" की अपार सफलता के बाद रामसे बंधुओं ने एक के बाद एक हॉरर फ़िल्मों की झड़ी लगा दी. दरवाज़ा, गेस्ट हाउस, पुराना मंदिर, पुरानी हवेली, बंद दरवाज़ा और वीराना जैसी कई कामयाब हॉरर फ़िल्में बनाईं. 70 और 80 के दशक में रामसे बंधुओं का डरावना मनोरंजन खू़ब कामयाब हुआ.
साशा रामसे कहती हैं कि "भारतीय दर्शकों की जो मांग थी उसे हमारे पापा ने पहचाना. आज के बहुत सारे फ़िल्मकार अपने दर्शक को नहीं पहचान पाते हैं कि वो मास के लिए फ़िल्म बना रहे हैं या क्लास के लिए, मगर रामसे ब्रदर्स ने अपने दर्शक को पहचाना. हमने अपने दर्शकों के लिए हॉरर के साथ म्यूज़िक, बैकग्राउंड, ह्यूमर, रोमांस का अच्छे से मिश्रण किया. यही वजह है कि रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्मों ने अलग ब्रांड बनाया."
कुनिका लाल ने कहा कि "रामसे ब्रदर्स भारत के अल्फ्रेड हिचकॉक थे. वे जो फ़िल्में बनाते थे उससे डिस्ट्रीब्यूटर ख़ूब पैसे कमाते थे. इसलिए डिस्ट्रीब्यूटर, रामसे की फ़िल्म ख़रीदने के लिए दौड़ कर आते थे क्योंकि वो जानते थे कि उन्हें नुक़सान नहीं होगा. हर सेंटर में फ़िल्म चलती थी. आज भी छोटे शहर में मैंने 'बंद दरवाज़ा' लगते हुए देखी है."
रामसे ब्रदर्स ने अंधेरे से भरे थिएटर में डराकर दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए हॉलीवुड फ़िल्मों से खू़ब प्रेरणा ली. वो अंग्रेज़ी फ़िल्मों और इटालियन फ़िल्मकारों से प्रेरणा लेकर भारतीय दर्शकों को ध्यान में रख कर कहानी गढ़ते और फ़िल्म बनाते थे.
दीपक रामसे कहते हैं, "रामसे ब्रदर्स उस समय युवा थे. सभी भाई हॉलीवुड की हॉरर फ़िल्मों से प्रभावित थे. 'हैमर हाउस ऑफ़ हॉरर' और कुछ इटालियन फ़िल्मकारों से प्रेरित थे. उन फ़िल्मों से प्रेरित होकर भारतीय दर्शकों को ध्यान में रख कर उसमें हिंदी फ़िल्मों के मसाले डालते थे. इसी वजह से रामसे एक ब्रांड बना. यही वजह है कि औरों ने भी अच्छी फ़िल्में बनाईं मगर रामसे भाइयों ने अलग छाप छोड़ी और इस जॉनर को अलग मुक़ाम तक पहुंचाया."
आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ 'पुराना मंदिर' के एक गाने की शूटिंग याद करते हुए कहती हैं कि "मैं उस समय कैलाश के साथ डेटिंग कर रही थी. तभी कैलाश ने क़ब्रिस्तान में एक गाना करने का सुझाव दिया. क़ब्रिस्तान में गाना करना मुश्किल था. तभी कैलाश ने फ़रहा खान से मिलाया. फ़रहा उनकी दोस्त थी और उस समय कुछ करना चाह रही थीं. उस गाने में क़ब्रिस्तान से साजिद ख़ान भूत बनकर निकलते हुए नज़र आएंगे. इतने अच्छे लोग हैं रामसे ब्रदर्स कि वो कहते थे कि ये गाना कैलाश सुरेन्द्रनाथ का है."

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तकनीक का अभाव
90 के दशक से टेक्नोलॉजी पैर पसारने लगी. आज तकनीक ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसी फ़िल्मों के लिए एक से बढ़कर एक भूत, चुड़ैल और डराने वाले अक्स स्पेशल इफ़ेक्ट और ग्राफ़िक से तैयार हो जाते हैं.
रामसे बंधुओं के दौर में टेक्नोलॉजी का सहारा नहीं था. रामसे बंधुओं ने फिज़िकल मेकअप और बैकग्राउंड म्यूज़िक को डराने का हथियार बनाया. मनोरंजन के लिए कॉमेडी, म्यूज़िक और बोल्ड सीन का तड़का लगाया.
अनिरुद्ध अग्रवाल ख़ासतौर से भूत बनते थे जो मेकअप करने के बाद परदे पर बेहद डरावने लगते थे.

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दीपक रामसे कहते हैं कि "उस समय तकनीक नहीं थी. बैकग्राउंड म्यूज़िक का बड़ा असर था. हमारे पास अच्छे कंपोज़र थे. 'पुराना मंदिर' में कंपोज़र उत्तम सिंह थे जिनके म्यूज़िक ने भूत से पहले ही दर्शकों को डराया था. स्पेशल इफ़ेक्ट बिल्कुल भी नहीं था. मेकअप का बड़ा रोल था जिसमें 6-6 घंटे का समय लगता था. एक्टर को 9 बजे की शिफ़्ट में सुबह 6 बजे बुलाते थे. 12 बजे तक मेकअप होता था. 1 बजे खाना खाते थे और 2 बजे से शूटिंग शुरू होती थी."
दीपक रामसे ने बोल्ड सीन के बारे में बात करते हुए कहा, "हिंसा की वजह से हमारी फ़िल्मों को सेंसर से ए सर्टिफ़िकेट मिलता था. इसलिए उस समय तय किया गया कि अगर फ़िल्म में अच्छे ढंग से थोड़ा बोल्ड सीन डाले जाएं तो ये फ़िल्म के लिए अच्छा होगा. तीन घंटे की फ़िल्म को संतुलित करके बनाना पड़ता था जिसमें कहानी के साथ कॉमेडी, संगीत का तड़का डालना ज़रूरी था. पूरे तीन घंटे सिर्फ़ भूत प्रेत नहीं दिखा सकते. दर्शकों के सिर में दर्द हो जाएगा. हमारी फ़िल्मों में कॉमेडी का ट्रैक भी मज़बूत होता था. फ़िल्म 'पुराना मंदिर' में शोले के ट्रैक पर जगदीप और गब्बर सिंह का ट्रैक बहुत लोकप्रिय हुआ था."
बड़ी स्टार कास्ट नहीं
रामसे बंधुओं की फ़िल्मों का बजट कम होता था. कोई बड़ा स्टार नहीं होता था. ए सर्टिफिकेट की वजह से बच्चे और परिवार फ़िल्म देखने सिनेमा घरों में नहीं आते थे. फिर भी भूत के दम पर रामसे बंधुओं ने फ़िल्मों को हिट कराया. बड़ी से बड़ी बजट और बड़े से बड़े सितारों की फ़िल्मों को बॉक्स ऑफ़िस पर टक्कर भी दी. दौर कोई भी हो, युवा, शादीशुदा जोड़े और डरावनी फ़िल्मों के शौकीन ही हॉरर फ़िल्में देखते हैं.
दीपक रामसे ने बताया, "कई बार डिस्ट्रीब्यूटर स्टार कास्ट पूछते थे तो तुलसी रामसे और श्याम रामसे नए कलाकारों के नाम बताते थे. डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि बिना बड़े स्टार के आप इतने पैसे क्यों मांग रहे हैं तो रामसे ब्रदर्स कहते थे कि हमारी फ़िल्म का स्टार भूत है. आप एक रील देखने के बाद फै़सला कीजिए. एक रील देख कर डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि कितने पैसे लेंगे? रामसे की फ़िल्मों को बड़ी फ़िल्मों के साथ रिलीज़ होने में कोई डर नहीं लगता था. रामसे बंधुओं की फ़िल्में बड़े सितारों की फ़िल्मों के साथ भी प्रदर्शित होती थीं."
कुनिका कहती हैं कि उन्हें आज भी सोशल मीडिया पर बंद दरवाज़ा के लिए संदेश भेजे जाते हैं. दुनिया के हर कोने में उस फ़िल्म को लोगों ने देखा है.
"लिमिटेड ऑडियंस के लिए फ़िल्म होती थी इसलिए बजट भी कम होता था जिसकी वजह से हमें भी कम पैसे मिलते थे मगर इज़्ज़त मिलती थी. रामसे ब्रदर्स बहुत इज़्ज़त देते थे. हम जल्दी-जल्दी शूटिंग करते थे. मुझे याद है कि बंद दरवाज़े का पूरा गाना एक रात में शूट कर लिया था."
वहीं आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ कहती हैं कि "जब 'पुराना मंदिर' बन रही थी तब मैं थोड़ी शर्मिंदा होने लगी थी क्योंकि मेरे दोस्त कहते थे कि बड़ी फ़िल्मों के ऑफ़र को छोड़कर ये फ़िल्म कर रही है. जब फ़िल्म 'पुराना मंदिर' 1984 में रिलीज़ हुई थी, उस साल कई स्टार्स की बड़ी फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं. मगर 'पुराना मंदिर' बहुत बड़ी हिट हुई. आज भी अनुराग कश्यप और मधुर भंडारकर जैसे उस फ़िल्म के फै़न हैं."

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रामसे ब्रदर्स का टीम वर्क
सातों भाई एक टीम बनाकर काम करते थे. अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियां बांट रखी थीं. कहानी पर काम करने के बाद शूटिंग के लिए फ़िल्म की पूरी यूनिट के साथ पूरा परिवार एक बस में सवार होकर महाबलेश्वर पहुंच जाता था. इनकी ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग महाबलेश्वर में होती थी. वहां अनारकली नाम के होटल में बुकिंग होती थी. जब तक शूटिंग होती तब तक किसी और मेहमान को उस होटल में जगह नहीं मिलती थी. इस होटल में रामसे बैनर को कंसेशन भी मिलता था.
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए दीपक कहते हैं कि "हमने बचपन से देखा है कि किस तरह स्टोरी सिटिंग हुआ करती थी. सातों भाई एक साथ बैठते थे और कहानी पर चर्चा होती थी. हमारे एक जूनियर राइटर होते थे जेके आहूजा साहब जिनका कहानी सुनाने का अंदाज़ बहुत अच्छा होता था. वो अलग-अलग तरह की आवाज़ें निकालकर कहानी सुनाते थे. हम उस समय बच्चे होते थे. उन पलों को मज़े से गुज़ारते थे. इस तरह कहानी बनती थी. उसके बाद हम विचार करते थे कि किस तरह फ़िल्म बनेगी और किस तरह शूटिंग होगी."
साशा ने भी उन दिनों को याद किया और कहा कि "उस ज़माने के कलाकार आज भी मिलते हैं तो कहते हैं कि रामसे बैनर एक परिवार था. बहुत ही प्यार से काम होता था. फ़िल्म की यूनिट के साथ सभी चाचियां और मेरी मां भी शूटिंग पर साथ होती थीं."
कुनिका लाल ने बताया, "जब मैंने रामसे ब्रदर्स की फ़िल्म साइन की तब मैं इंडस्ट्री में नई थी. किसी को नहीं जानती थी. हमें मालूम नहीं था कि हॉरर फ़िल्म का अलग ग्रेड होता है. हमारे लिए ये बड़ी बात थी कि हमें काम मिल रहा है. रामसे ब्रदर्स के साथ काम करना मतलब परिवार में रहना. पूरा परिवार साथ होता था. महाबलेश्वर में शूटिंग करते थे. सेट पर भाभियां होती थीं, बच्चे भी खेलते थे. हम सबको खू़ब इज़्ज़त और प्यार मिलता था."
आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ ने बताया, "मैं 16 साल की थी जब मॉडलिंग शुरू की. कई फ़िल्मकारों के ऑफ़र को ठुकराया मगर रामसे की फ़िल्म कर ली क्योंकि ये 'बीते दिन' गाने की रिकॉर्डिंग के साथ आए थे और बहुत अच्छे से बात की. उन्होंने कहा कि हम स्टाइलिश और अच्छी फ़िल्म बनाएंगे. मैं मना नहीं कर पाई. कई लोग नाराज़ भी हुए थे. ये फ़िल्म थी 'पुराना मंदिर'. फिर मोहनीश बहल भी तैयार हो गए. मुझे बच्चे की तरह प्यार दिया. हमसे खाना तक पूछ कर खिलाते थे."

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छोटे पर्दे का रुख़
70 और 80 के दशक में कई कल्ट फ़िल्में देने के बाद 90 के दशक में रुपहले परदे पर हॉरर फ़िल्मों का आना बंद होने लगा क्योंकि रामसे बंधुओं ने छोटे परदे की तरफ़ रुख़ कर लिया था.
90 के दशक में दूरदर्शन के बाद पहला चैनल लॉन्च हुआ था ज़ीटीवी. रामसे की फ़िल्में दूरदर्शन पर ए सर्टिफिकेट होने की वजह से रिलीज़ नहीं होती थीं. इसलिए रामसे अपनी फ़िल्मों के सैटेलाइट राइट बेचने के लिए ज़ीटीवी के दरवाज़े पर पहुंचे. तभी ज़ी के मालिक सुभाष चंद्रा ने रामसे बंधुओं को ज़ी हॉरर शो बनाने का निमंत्रण दिया.
1989-90 में जो भी फ़िल्म बना रहे थे उसे पूरा किया और ज़ी हॉरर शो का सफ़र शुरू हुआ. सभी भाइयों का पूरा ध्यान ज़ी हॉरर शो में लग गया. क़रीब साढ़े सात साल तक ज़ी हॉरर शो चला जिसमें 365 एपिसोड बनाए गए. रामसे की अगली पीढ़ी ने इस शो को बनाते समय अपने पिता और चाचाओं से हॉरर बनाने और दर्शकों को डराने के गुण सीखे.
तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने 200 एपिसोड का निर्देशन किया और धीरे-धीरे रामसे ब्रदर्स के भूत सिनेमा घरों से ग़ायब हो गए और छोटे परदे पर पहुंच कर डराना शुरू कर दिया.
साशा का मानना है कि "ज़ी हॉरर शो का फ़ॉर्मेट भी फ़िल्म का ही फ़ॉर्मेट था जिसमें एक कहानी पांच एपिसोड में ख़त्म होती थी. यानी हर कहानी ढाई घंटे की फ़िल्म थी."
वहीं दीपक कहते हैं कि "मुझे लगता है कि सही समय पर सही फै़सला लिया गया क्योंकि हमने अपने ब्रांड को लोगों के घरों में मुफ़्त में पहुंचाना शुरू कर दिया था. शुक्रवार को नौ बजे रात में ज़ी हॉरर शो का थीम म्यूज़िक बजता था और बच्चे चादर और तकिये में छुप जाते थे मगर शो देखते थे जो रामसे ब्रांड की जीत थी. हमने ज़रूरत के हिसाब से बदलाव किए. बोल्ड सीन निकल दिए. हालांकि ज़ी हॉरर शो ने बड़े परदे से छोटे पर्दे पर पहुंचा दिया मगर मेरे हिसाब से टीवी की तरफ़ ये एक अच्छा क़दम था जो रामसे बंधुओं के लिए महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया."
बड़े परदे से छोटे परदे पर आने पर साशा आगे कहती हैं कि "मेरे पिता की सोच प्रगतिशील थी. वो घर-घर तक अपने ब्रांड को पहुंचाना चाहते थे इसलिए टीवी पर आना एक सोचा समझा फै़सला था. जब ज़ी हॉरर शो आता था तब रात के नौ बजे पूरी बिल्डिंग में शो के थीम म्यूज़िक की आवाज़ गूंजती थी क्योंकि सभी 70-80 घरों में एक साथ शो देखा जाता था जो बड़ी बात थी."

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फ़िल्मों के प्रचार का अनोखा तरीक़ा
फ़िल्म मेकिंग के साथ साथ इन्होंने अपनी फ़िल्मों के प्रचार में भी ध्यान लगाया. आज के दौर में कई बार फ़िल्मों की पब्लिसिटी के लिए फ़िल्म के किरदार मैदान में उतरते हैं.
रामसे ने उस दौर में बॉम्बे के एक सिनेमा हॉल में गिम्मिक किया था. जब टिकट लेकर लोग अंदर जाते थे तब भूत टिकट देखने आ जाता था जिससे ख़ूब पब्लिसिटी मिली थी. फ़िल्म "दो ग़ज़ ज़मीन के नीचे" के प्रचार के लिए रेडियो पर आधे घंटे का स्लॉट चला था और फ़िल्म को हाउसफुल की ओपनिंग मिली थी.
गहरा प्यार और तालमेल
रामसे ब्रदर्स के बीच न सिर्फ़ काम के मामले में अच्छा तालमेल था, इनके बीच गहरा प्यार और रिश्तों को निभाने का बेहतरीन जज़्बा था. काम के वक़्त एक दूसरे की मज़बूत कड़ी को पहचानते थे और एक दूसरे के इशारों को समझ जाते थे.
कहा जाता है कि पैसा कई बार रिश्तों में दरार डालता है मगर इन भाइयों के बीच पैसों पर इनका रिश्ता भारी था. जब तक रामसे ब्रदर्स के पिता जीवित थे तब तक पैसों के मालिक वही थे और सभी भाइयों को वही पैसे देते थे. उनके बाद ये ज़िम्मेदारी बड़े भाई ने ईमानदारी से निभाई.
दीपक कहते हैं कि "पैसा बहुत कुछ होता है मगर इनके लिए जुनून उससे ऊपर था अच्छा करने के लिए. मेरे दादाजी के पास पैसे थे, कई कारोबार थे. वो पैसों के लिए नहीं, फ़िल्मों के प्रति अपने लगाव और जुनून की वजह से आए थे."
वहीं साशा कहती हैं कि "सारे भाई एक दूसरे के लिए जीते थे. आजकल आपने इस तरह के रिश्ते नहीं देखे होंगे. सभी भाइयों में बहुत ज़बरदस्त बंधन था."
कुनिका लाल कहती हैं कि "इन सातों भाइयों के रिश्ते बहुत गहरे थे. तुलसी जी और श्याम जी निर्देशन करते थे. दोनों के बीच बेहतरीन तालमेल था. बहुत अच्छे से चर्चा करते थे और एक दूसरे को समझते थे."
आरती सुरेन्द्रनाथ कहती हैं कि "आज भी मैं उनके परिवार के संपर्क में हूं. उन्होंने रिश्तों को बहुत अच्छे से निभाया.
तीसरी पीढ़ी भी हॉरर फ़िल्मों में
एक बार फिर रामसे बंधुओं के बैनर को खड़ा करने का प्रयास इनकी तीसरी पीढ़ी कर रही है.
फिर से टीम तैयार है रामसे ब्रदर्स की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए. कुमार रामसे के बेटे गोपाल रामसे और श्याम रामसे की बेटी नम्रता रामसे लेखक हैं.
तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे निर्देशन पर काम कर रहे हैं. श्याम रामसे की एक और बेटी साशा रामसे क्रिएटिव राइटिंग और डायरेक्शन में हैं. सब मिलकर रामसे की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए और 2021 में, 70 के दशक की तरह साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं.

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दीपक रामसे ने "वो कौन थी" नाम की हॉरर फ़िल्म बना ली है.
दीपक ने कहा कि "मैंने एक पूरी तरह से हॉरर फ़िल्म "वो कौन थी" बनाई है. नए कलाकारों को लेकर अच्छे संगीत के साथ ये फ़िल्म बनाई गई है. नए दौर में हमने अच्छे स्पेशल इफे़क्ट्स और ग्राफ़िक्स का उपयोग किया है. अच्छे स्पेशल इफ़ेक्ट्स और ग्राफ़िक्स की वजह से अब हॉरर फ़िल्म बनाना थोड़ा आसान हो गया है."
वहीं साशा ने कहा कि "मैंने हमेशा अपने पापा को क्रिएटिव फ़ील्ड में असिस्ट किया है. मैंने जो अपने पिता से सीखा है उसको लेकर हॉरर की इस विरासत को ज़रूर आगे बढ़ाऊंगी. मैंने पापा के साथ फ़िल्म 'वीराना' पर काम किया है और 'वीराना' की अहम किरदार जैस्मिन को दोबारा परदे पर नए अंदाज़ में लाऊंगी."
एक-एक करके पांच भाई दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं. कुमार रामसे और गंगू रामसे जीवित हैं जो काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं. रामसे बंधुओं की कामयाबी के उन दिनों को उनके बच्चों के साथ-साथ उनकी फ़िल्म के कलाकार भी याद करते हैं.

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दीपक कहते हैं कि "बचपन में हमें डर लगता था जब शूटिंग देखते थे. मेरे पापा और चाचा हमें मेकअप करते हुए आर्टिस्ट को नहीं देखने देते थे. मेकअप के बाद हाथ पकड़ कर ले जाते थे और उस भूत के सामने अचानक खड़ा कर देते थे. हमारे चेहरे पर खौफ़ का मंजर देख कर अंदाज़ा लगाते थे डर का. उस टाइम पर सात फ़ीट का लंबा भूत अनिरुद्ध अग्रवाल बनते थे जो डरावने होते थे."
साशा उन दिनों को याद कर कहती हैं कि "मैं अपनी फ़िल्मों के ट्रायल शो देखती थी. मैं अपने पापा श्याम रामसे के साथ एडिट पर जाती थी. भूत की डबिंग के लिए जब आर्टिस्ट आकर डरावनी आवाज़ बनाते थे तो बहुत मज़ा आता था."
दीपक रामसे की हॉरर फ़िल्म "वो कौन थी" की रिलीज़ के बाद पता चलेगा कि नई पीढ़ी के ये फ़िल्मकार रामसे ब्रदर्स की विरासत को किस मुक़ाम तक ले कर जाएंगे.
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