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सौमित्र चटर्जी: बंगाली सिनेमा के जाने-माने अभिनेता का निधन
बंगाली सिनेमा जगत के जाने-माने अभिनेता सौमित्र चटर्जी की रविवार को मौत हो गई है. वह 85 साल के थे.
कोलकाता में मौजूद बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने बताया है कि कोलकाता के बेले व्यू क्लिनिक में रविवार दोपहर 12.15 बजे उनकी मौत हुई.
उनका कोरोना टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद 6 अक्टूबर को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनकी सेहत में पहले कुछ सुधार दिखा और उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव भी आई. लेकिन बाद में उनकी शारीरिक जटिलताएँ बढ़ने के कारण उन्हें अक्तूबर के अख़िरी सप्ताह में वेंटिलेटर पर रखा गया. रविवार को उनकी मौत हो गई.
सौमित्र चटर्जी ने 200 से अधिक फ़िल्मों में काम किया.
उन्होंने जाने-माने निर्देशक सत्यजीत रे की फ़िल्म 'अपूर संसार' से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने 'जॉय बाबा फेलूनाथ' में फेलूदा का किरदार निभाया.
कई बार अपने अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड पा चुके सौमित्र चटर्जी को साल 2012 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया था.
साल 2004 में उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. उन्हें फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान लीज़न द'ऑनर से भी सम्मानित किया गया था.
नाटक के मंच से रहा विशेष स्नेह
सौमित्र चटर्जी का जन्म 19 जनवरी 1935 को पश्चिम बंगाल में नादिया ज़िले के कृष्णानगर में हुआ था.
उनकी प्राथमिक शिक्षा कृष्णानगर में ही हुई थी. स्कूल में पढ़ने की उम्र से ही सौमित्र ने एक्टिंग शुरू कर दी थी.
बीबीसी बांग्ला को दिए एक साक्षात्कार में सौमित्र चटर्जी ने कहा था कि कृष्णानगर में बचपन में ही उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था.
सौमित्र चटर्जी ने कहा था, "बचपन में हम घर में तख्तों से मंच बनाते थे और बेड शीट से पर्दे बनाते थे. हम भाई-बहनों और दोस्तों के साथ मिलकर नाटक करते थे. इसके लिए घर के बुज़ुर्गों ने भी हमें बहुत हौसला दिया."
नाटकों का उनका शौक बाद में भी उनके साथ रहा और वो फ़िल्मों के साथ-साथ मंच पर नज़र आते.
बाद में उनके पिता काम के लिए कलकत्ता चले गए, फिर कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए सौमित्र भी कलकत्ता चले आए.
कॉलेज के अपने दिनों के दौरान उनके एक मित्र ने उनका परिचय सत्यजीत रे से करवाया. उस वक़्त हुई ये छोटी मुलाक़ात बाद में दोनों के बीच गहरी दोस्ती में बदल गई. सत्यजीत रे की फ़िल्म के साथ शुरुआत करने के बाद उन्होंने उनके साथ कई और फ़िल्मों में काम किया.
फ़िल्म आलोचक जीवनी लेखिका मैसी सेटॉन को एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "जब सत्यजीत रे ने मुझसे पूछा कि मैं क्या करना चाहता हूं तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं था. मुझे उस वक़्त स्टेज पर और फ़िल्मों में ऐक्टिंग के फ़र्क़ के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. मुझे डर था कि मैं ओवरऐक्ट न करूं."
उन्होंने फ़िल्मों में कई तरह के किरदार निभाए. 'शोनार किल्ला' में वो शरलॉक होम्स की तरह के एक जासूस के किरदार में नज़र आए, 'देवी' में वो नियमों का पालन करने वाला दूल्हा बने, 'अभिजान' में ग़ुस्से में रहने वाला उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवर बने तो 'अशनि संकट' में एक शांत रहने वाले पुजारी के किरदार में दिखे.
नोबल सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'चारूलता' पर बनी सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
'सत्यजीत रे मेरे लिए प्रेरणा रहे'
सौमित्र चटर्जी, सत्यजीत रे के पसंदीदा एक्टर थे और सत्यजीत उन्हें सिनेमा पर लिखी किताबें पढ़ने के लिए देते थे. रविवार को दोनों साथ मिलकर हॉलीवुड की फ़िल्में देखते थे और चर्चा करते थे.
चटर्जी ने एक बार कहा था, "वो जो भी करते थे वो बिना कारण नहीं था, ऐसे नहीं था कि रविवार को मुझे एंटरटेंमेन्ट के लिए साथ में लेकर जाते थे."
सत्यजीत रे का कहना था कि सौमित्र बेहतरीन एक्टर हैं लेकिन अगर उन्हें "बुरी कहानी दी जाएगी तो उनका अभिनय भी वैसा ही होगा."
साल 1992 में सत्यजीत रे की मौत हो गई. उस दौरान सौमित्र ने एक इंटरव्यू में कहा था, "एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने सत्यजीत रे को याद न किया हो या उनके बारे में बात न की हो. प्रेरणा के तौर पर मेरी ज़िंदगी में वो हमेशा ही मौजूद रहे हैं. मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं मुझे प्रेरणा मिलती है."
सत्यजीत रे के अलावा सौमित्र चटर्जी ने तपन सिन्हा, मृणाल सेन, असित सेन, अजॉय कर, रितुपर्णो घोष और अपर्णा सेन के साथ भी काम किया. साल 1988 में उन्होंने हॉलीवुड की फ़िल्म 'द बंगाली नाइट' में हू ग्रांट और जॉन हर्ट के साथ काम किया.
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