सरोज ख़ान का न होना डांस की जान निकल जाना है

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- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी संपादक
एक ऐसी इंडस्ट्री जहाँ हर हफ़्ते नए सितारे बनते हैं और उन सितारों का बनना बिगड़ना न सिर्फ़ उनकी एक्टिंग की क़ाबिलियत पर निर्भर करता है बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि उस पर कितने गाने फ़िल्माए गए और वो कितना बेहतर नाचते हैं.
ऐसी फ़िल्म इंडस्ट्री की मास्टरजी थीं सरोज ख़ान. सरोज ख़ान का तीन जुलाई को मुंबई में निधन हो गया.
सरोज ख़ान वो डांस मास्टर थीं जिन्होंने साधना से लेकर आलिया भट्ट को अपने इशारों पर नचवाया है.
फ़िल्मों में उनके योगदान को इसी से आंका जा सकता है कि 70 के दशक से लेकर अब तक सरोज ख़ान ने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर गाने दिए.
फ़िल्म का नाम आपने शायद ही सुना हो- फ़्लैट नंबर 9 और गाना था हेलन का. -आँखों से मैंने पी है, चोरी तो नहीं की है. तब सरोज सिर्फ़ 12 साल की थीं.
सरोज के गुरु सोहनलाल ने इस गाने पर उन्हें डांस करने के लिए कहा और इतने प्रभावित हुए कि उन्हें असिस्टेंट बना लिया और 12 साल की उम्र से सरोज ख़ान डांस सिखाने लगीं.
अतीत की बात करें तो बँटवारे की त्रासदी के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आया और 1948 में उनका जन्म मुंबई में हुआ.
बचपन से ही डांस का शौक था तो सलाह मशविरे के बाद उन्हें बतौर बाल कलाकार फ़िल्मों में भेजा गया.
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1961 में फ़िल्म नज़राना में सरोज ख़ान ने चाइल्ड आर्टिस्सट काम किया.
सरोज क़रीब 10 साल की थीं जब उनके पिता की मौत हो गई और 10 साल की उम्र में उनके कंधों पर परिवार का बोझ आ गया और वो बतौर ग्रुप डांसर काम करने लगीं.उनके जीवन में अहम मोड़ आया जब डांस गुरु सोहनलाल ने उन्हें देखा और अपना असिस्टेंट बना लिया.
70 के दशक में अभिनेत्री साधना ने गीता मेरा नाम में उन्हें बतौर नृत्य निर्देशक ब्रेक दिया.
साधना ने ख़ुद फ़िल्म बनाई पर पहचान मिली उन्हें सुभाष घई की फ़िल्मों विधाता और हीरो में जब मीनाक्षी शेषाद्री जब गाना आया तू मेरा हीरो है...
हालांकि सरोज ख़ान वाक़ई बड़ी लीग में शामिल हुई जब उन्होंने श्रीदेवी और माधुरी दीक्षित के साथ मिलकर ज़बरदस्त गाने दिए.
नगीना में मैं तेरी दुश्मन , तेज़ाब में एक दो तीन, या चांदनी में मेरे हाथो में नौ नौ चूडियाँ हैं - इन गानों में वाहवाही भले ही माधुरी या श्रीदेवी को मिली लेकिन पर्दे के पीछे की मेहनत थी सरोज खान की.
सरोज खान की ख़ासियत ये थी कि उन्होंने क्लासिकल से लेकर वेस्टर्न से लेकर गरबा, लावणी, भांगडा सबके रंग अपने कोरियोग्राफ़ किए गानों में डाले. वो भारत के अलग-अलग नृत्यों को अपनी प्रेरणा मानती थीं.

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90 के दशक बात करें तो एक से बढकर हीरो-हीरोइनों ने उनके नृत्य निर्देशन में काम किया- बेटा, डर, बाज़ीगर, मोहरा, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे - इन सब फ़िल्मों में जो गाने हिट हुए उनमें डांस के जादू के पीछे सरोज का हाथ था.
जैसे हर गुरु का एक शिष्य फेवरेट होता है, सरोज ख़ान की ओर से ये सम्मान माधुरी दीक्षित को मिला है.
माधुरी के साथ उन्होंने एक दो तीन गाने में काम किया और फिर धक धक करने लगा, मेरे पिया घर आए, दीदी तेरा देवर दीवाना जैसे गाने किए.
आप तेज़ाब में माधुरी को एक दो तीन पर थिरकते हुए देखते हैं तो तालियाँ भले ही माधुरी के हिस्से गई हों लेकिन ये कमाल जितना माधुरी का था उतना ही सरोज खाना का भी.तेज़ाब की चंचल मोहिनी को देवदास में सरोज खान ने चंद्रमुखी बना दिया .
माधुरी के साथ देवदास के लिए सरोज खान को नेशनल अवॉर्ड भी मिला.
इस तरह श्रीदेवी भी उनकी बहुत पसंदीदा थी जिन्हें सरोज खान ने हिम्मतवाला में देखा और चाहती थीं कि ऐसी ही किसी डांसर के साथ वो फ़िल्म करें.
तब सरोज ख़ान का उतना नाम नहीं था.1986 में फिल्म कर्मा के लिए सुभाष घई ने उन्हें श्रीदेवी के साथ करने का मौका दिया.

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श्रीदेवी के गाने हवा हवाई की कोरियोग्राफी सरोज ख़ान ने इतनी कमाल की थी कि निर्देशक शेखर कपूर कहते थे कि वो गाने में श्रीदेवी के क्लोज़अप दिखाना चाहते थे लेकिन जब श्रीदेवी का डांस देखते थे तो लॉग शॉट लेने पर मजबूर हो जाते थे.
सरोज ख़ान अपने नृत्य के लिए तो जानी ही जाती थीं सेट पर वो कड़क अंदाज़ और अनुशासन के लिए भी मशहूर थीं.
एक बार इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि सेट पर रवीना टंडन ने एक डांस से पहले गुरु को नमस्कार नहीं किया था जिसके बाद उन्होंने फ़िल्म ही छोड़ दी. हालांकि रवीना से उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे.
बदलते वक़्त के साथ सरोज ख़ान ने अपनी रफ़्तार कुछ धीमी की या कहें कि नए-नए कोरियोग्राफ़र भी फ़िल्मों में आने लगे.
पिछले 10 साल में बहुत कम फ़िल्में सरोज ने कीं लेकिन कलंक, तनु वेड्स मनु, लव आजकल, राऊडी राठौर उनकी लिस्ट में शामिल रहीं.सरोज ख़ान कहा करती थीं कि बेहतरीन डांस करने वालों के साथ काम करना उन्हें पसंद है लेकिन उससे कहीं ज़्यादा संतुष्टि उन्हें मिलती है ऐसे किसी को पर्दे पर नचवाकर जिससे आप थिरकने की उम्मीद नहीं रखते.

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इसलिए उन्हें गोविंदा के साथ काम करना अच्छा लगता था क्योंकि अच्छे डांसर थे लेकिन सनी देओल को नचाकर वो अलग ही ख़ुशी महसूस करती थीं.
वे मुश्किल डांस स्टेप्स को भी आसान बना देती थीं मानो हर कोई डांस कर सकता है.- अक्षय कुमार का ये ट्वीट शायद सरोज ख़ान की हस्ती को एक वाक्य में समेट देता है.
2019 में आई फ़िल्म कलंक उनकी आख़िरी फ़िल्मों में से थी.
किस्मत की बात है कि आख़िरी में उन्हें अपनी फेवरट शिष्या माधुरी के साथ कलंक में काम करने का मौक़ा मिला था- गाना था तबाह हो गए.
वैसे जिसे लोग आज सरोज ख़ान के नाम से जानते हैं उनका असली नाम था निर्मला नागपाल. नाम कुछ भी हो लोग उन्हें उस्तादों की उस्ताद' मास्टरजी 'के नाम से ही याद रखेंगे.
50 के दशक में बनी फ़िल्म मधुमती में वो बैकग्राउंड डांसर थीं, ख़ैर बैकग्राउंड में रहना तो एक डांस डाइरेक्टर की नियति होती है.
लेकिन पार्श्व में रहते हुए भी लोग उन्हें उन बेशुमार गानों में याद रखेगें जिन पर आज भी शादियों और पार्टियों में महफ़िलें जमती हैं.
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