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सारा आकाश, रजनीगंधा और खट्टा मीठा जैसी फ़िल्में देने वाले बासु चटर्जी नहीं रहे
- Author, अजय ब्रह्मात्मज
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी के लिए
फणीश्वरनाथ रेणु ने 'धर्मयुग' में 'तीसरी क़सम' की शूटिंग रिपोर्ट लिखी थी- 'तीसरी क़सम के सेट पर तीन दिन'.
इस रिपोर्ट में एक जगह वह लिखते हैं, 'इसी बीच असिस्टेंट डायरेक्टर बासु चटर्जी ने मेरे पास आकर धीरे से कहा, सर, चलिए ज़रा कैमरे के व्यू फाइंडर से आँख सटा कर देखिए, तब पता चलेगा कि गाड़ी में कैसा 'चंदा का फूल'..!
बासु चटर्जी असिस्टेंट डायरेक्टर के अलावा मुंबई के मशहूर कार्टूनिस्ट है, जो हर सप्ताह अपनी बांकी निगाह से दुनिया को देखता और दिखाता है. इसलिए उसकी किसी बात पर पहली बार गंभीरतापूर्वक मैं कभी ध्यान नहीं देता.
मैंने कहा, 'नहीं चटर्जी मोशाय.. मैंने जिस चश्मे से हीराबाई को देखा है, देख रहा हूं.'
तब चटर्जी मोशाय को यह कहना पड़ता है, चलून ना, एक बार देखून तो?'
रेणु की इन चंद पंक्तियों से ही बासु चटर्जी की शख्सियत की तस्वीर उभरती है, जो उनकी बातचीत, समझदारी और फ़िल्मों में बाद में दिखती है.
यही 'बांकी निगाह' अपनी मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के साथ फ़िल्मों में आती है और हमें हिंदी सिनेमा का वह चितेरा फ़िल्मकार मिलता है, जो मध्यवर्गीय परिवार और परिजनों से घिरा रहा.
बासु चटर्जी ने अपने समय के लोकप्रिय सितारे अमिताभ बच्चन और जितेंद्र को भी पर्दे पर 'लार्जर दैन लाइफ़' नहीं होने दिया. अमिताभ बच्चन की 'मंज़िल' और जितेन्द्र की 'प्रियतमा' उदहारण हैं.
अजमेर में जन्म
बासु चटर्जी की पैदाइश राजस्थान के अजमेर शहर में हुई थी. पिता रेलवे में मुलाज़िम थे.
उनके साथ फिर मथुरा जाना हुआ. मथुरा और आगरा में बासु चटर्जी की पढ़ाई-लिखाई हुई. यहीं लेखक राजेंद्र यादव और कवी शैलेन्द्र से दोस्ती हुई.
दोनों फ़िल्मकार बासु चटर्जी के फ़िल्मी सफ़र के आरंभिक साथी बने. फ़िल्में देखने का शौक़ मथुरा में ही जागा था. शायद ही कोई फ़िल्म छूटती थी.
बड़े होने पर मन के किसी कोने पर फ़िल्म के बीज पड़ गए थे, जिसे अंकुरित होने में 15 सालों का समय लगा.
मुंबई में लाइब्रेरियन से शुरुआत
मथुरा में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद बासु आजीविका की तलाश में मुंबई आए. यहाँ एक मिलिट्री स्कूल में लाइब्रेरियन की नौकरी मिली.
पैर टिकाने की जगह मिलने के बाद अरमानों के पंख निकलने शुरु हुए.
बासु चटर्जी का संपर्क 'ब्लिट्ज़' के संपादक से हुआ और वे वहाँ पर पॉलिटिकल कार्टूनिस्ट हो गए. रेणु ने इसी कार्टूनिस्ट की 'बांकी निगाह' का उल्लेख अपनी शूटिंग रिपोर्ट में किया था.
1948 में मुंबई आ चुके बासु चटर्जी ने थोड़े समय तक ही लाइब्रेरियन का काम किया.
'ब्लिट्ज़' से जूडने के बाद उन्होंने वह ऊबाऊ नौकरी छोड़ दी.
'ब्लिट्ज़' में कार्टून बनाने का सिलसिला 15 सालों तक चला. आगरा के साथी शैलेन्द्र से मुंबई में संपर्क बना हुआ था.
तीसरी क़सम से फ़िल्मों का सफ़र
शैलेन्द्र ने 1963 में जब रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी क़सम' पर फ़िल्म का निर्माण शुरु किया तो बासु ने फ़िल्म से जुड़ने की इच्छा जताई.
सोचा कि दोस्त की फ़िल्म के सेट पर फ़िल्म मेकिंग के गुर सीखने का मौक़ा मिलेगा.
दोस्ती और निर्माता होने के बावजूद शैलेंद्र ने कहा कि निर्देशक बासु भट्टाचार्य से मिल लो.
उनकी हां के बाद आ सकते हो. मुलाक़ात हुई तो कार्टूनिस्ट की समझदार और जागरुक पृष्ठभूमि की वजह से बासु भट्टाचार्य सहज ही तैयार हो गए.
'तीसरी क़सम' के बाद बासु चटर्जी ने गोविंद सरैया के साथ 'सरस्वतीचंद्र' में भी असिस्टेंट का काम किया.
दूसरी फ़िल्म व्यवसायिक दृष्टि से सफल रही और पहली फ़िल्म सुधी दर्शकों और आलोचकों के बीच सराही गई. दो फ़िल्मों में सहायक रहने के बाद बासु चटर्जी ने तय कर लिया कि अब वह ख़ुद निर्देशन करेंगे.
'जहाँ चाह, वहाँ राह'...
उन दिनों एफ़एफ़सी(आज की एनएफ़डीसी) ने युवा, नए और प्रयोगशील फ़िल्मकरों को फ़ाइनेंस करने का निर्णय लिया था.
'सारा आकाश' से ख़ुद बने निर्देशक
बासु चटर्जी ने मथुरा के दोस्त राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' को चुना.
स्क्रिप्ट लिखी और जमा कर दी. मंज़ूरी भी मिल गई. राकेश पांडे, मधु चक्रवर्ती और एके हंगल मुख्य भूमिकाओं के लिए चुने गए.
'सारा आकाश' ढाई लाख रुपयों में बनी और रिलीज़ हुई.
साहित्य पर आधारित इस फ़िल्म को उस साल प्रदर्शित, चर्चित और कामयाब 'आराधना', 'दो रास्ते', 'एक फूल दो माली' और 'प्यार का मौसम' जैसी लोकप्रियता नहीं मिली, लेकिन उसी साल प्रदर्शित 'सात हिंदुस्तानी' की तरह 'सारा आकाश' का हिंदी फ़िल्म के इतिहास में दूरगामी असर रहा.
पहली ने हिंदी फ़िल्मों की मुख्यधारा के सितारे अमिताभ बच्चन को जन्म दिया तो दूसरी 'न्यू वेभ की नींव बनी. न्यू वेभ, पैरेलेल सिनेमा, आर्ट सिनेमा जिस तिपाये पर टिकी और आगे बढ़ी, उनमें मृणाल सेन की 'भुवन शोम; और मणि कौल की 'उसकी रोटी' के साथ बासु चटर्जी की 'सारा आकाश' शामिल है.
'सारा आकाश' ने मुख्यधारा की चालू, लार्जर दैन लाइफ़ और घिसी-पिटी फ़ॉर्मुलों की फ़िल्मों से अलग राह दिखाई.
इस लिहाज़ से बासु चटर्जी पायनियर निर्देशक हैं. आगे चलकर उन्होंने 'रजनीगंधा', 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'बातों बातों में', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फ़िल्मों से मिडिल सिनेमा की राह प्रशस्त की.
बासु चटर्जी की फ़िल्मों में मृणाल सेन और मणि कौल की आगामी फ़िल्मों का 'कला' आग्रह नहीं है.
मध्यवर्गीय सपनों को फ़िल्मी पर्दों पर दी जगह
वह मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, दुविधाओं और सपनों की कहानियां लेकर फ़िल्मों में आये.
मध्यवर्गीय परवरिश, सोच और विश्वदृष्टि ही बासु चटर्जी को परिचालित करती रही.
अपनी फ़िल्मों के बारे में बातें करते हुए वे हमेशा यही कहते थे कि मैं निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आता हूं.
उन परिवारों के चरित्रों की आशा-निराशा को अच्छी तरह जानता हूं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर मेरी फ़िल्मों में मध्यवर्गीय चरित्र ही होते हैं.
हिंदी फ़िल्मों के प्रचलित हीरो की अविश्वसनीय मर्दानगी मेरी समझ में नहीं आती.
बासु चटर्जी की फ़िल्मों के नायक और नायिका मध्यवर्गीय समाज और परिवार में आज भी दिखाई देंगे.
यूँ लगता है कि सीधे जीवन से वे पर्दे पर आ गए हैं.
'सारा आकाश' के नायक समर(राकेश पांडे) और नायिका प्रभा (मधु चक्रवर्ती) के बीच लंबे समय तक अबोला रहता है.
समर को लगता है कि उसे पारिवारिक ज़रूरतों की वजह से एक अनचाहे रिश्ते में बांध दिया गया है, जो उसकी ज़िंदगी की बाड़ बन गई है.
वह अपने दोस्तों से कहता भी है कि 'इन्हीं बाड़ों को कुचल कर हमें आगे बढ़ना होगा'.
'पिया का घर' में छोटे घर की ज़िंदगी में कसमसाते राम शर्मा(अनिल धवन) और मालती शंकर(जाया भादुड़ी) के दांपत्य की अड़चनों और अंतरंगता को बख़ूबी दिखाया गया है.
'पिया का घर' राजा ठाकुर जी मराठी फ़िल्म 'मुंबईचा जंवाई' की रीमेक थी.
मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' प्रेमत्रिकोण का मध्यवर्गीय संदर्भ लेकर आती है.
फ़िल्म में नायिका दीपा की भूमिका में विद्या सिन्हा ने प्रचलित हिंदी फ़िल्मों की नायिका से एक अलग छवि पेश की थी.
प्रेमत्रिकोण भी नया था. दीपा(विद्या सिन्हा),नवीन(दिनेश ठाकुर) और संजय(अमोल पालेकर) के बीच का प्रेमत्रिकोण मध्यवर्गीय रोमांस, उम्मीद, स्मृतिदंश को बारीकी से पेश करता है.
इस फ़िल्म में योगेश के गीतों ने मध्यवर्गीय यथार्थ को भावभीनी तरलता और गहराई दी थी.
उनकी 'चितचोर', 'छोटी सी बात', 'खट्टा मीठा' और 'स्वामी' जैसी फ़िल्मों के विषय और चरित्रों की विस्तार में चर्चा की जा सकती है.
इन सभी फ़िल्मों में बासु चटर्जी की कोशिश रही है कि वह हिंदी फ़िल्म के 'बालकोनी (शिक्षित और मध्यवर्गीय) दर्शकों को क़रीबी अनुभव और मनोरंजन दे सकें.
बासु चटर्जी, हृषीकेश मुखर्जी और गुलज़ार
बासु चटर्जी, हृषीकेश मुखर्जी और गुलज़ार हिंदी फ़िल्मों के 'मिडिल सिनेमा' के दर्शकों को अपनी फ़िल्मों से लुभाते रहे, उन्होंने कमर्शियल मेनस्ट्रीम सिनेमा और आर्टसिनेमा के बीच दर्शकों को रोचक मनोरंजन की ज़मीन दी.
प्रलोभनों और अवसरों के बावजूद वे तीनों इसी ज़मीन पर नई नई फ़िल्में रचते रहे.
उन्होंने पॉपुलर सितारों को कुछ नया और सार्थक करने का अवसर दिया. तुलनात्मक अध्ययन के शौक़ीन हृषीदा और बासु चटर्जी के बीच प्रतिद्वंदिता की बातें करते हैं. बासु चटर्जी ने ऐसी तुलनाओं से हमेशा परहेज़ किया और हृषीदा को वरिष्ठ फ़िल्मकार का सम्मान दिया.
बासु चटर्जी की ज्यादातर फ़िल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित हैं.
वे कहानियां साहित्य से लेते थे. उनकी पटकथा फ़िल्म के हिसाब से तैयार करते थे.
पहली फ़िल्म 'सारा आकाश' मूल उपन्यास की आधी कथा पर ही बनी थी. मूल से यह बदलाव उनकी बाद की फ़िल्मों में भी दिखाई देता है, लेकिन कभी किसी लेखक से मनमुटाव नहीं हुआ.
बासु चटर्जी हिंदी फ़िल्मों के वाहिद फ़िल्मकार हैं, जिनका साहित्य और साहित्यकारों से जीवंत संबंध रहा.
उनकी फ़िल्मों के के साथ उनकी फ़िल्मों के गीत-संगीत को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए.
उन्होंने किरदारों के मनोभावों को व्यक्त करने वाले गीत चुनें. उनकी फ़िल्म 'खट्टा मीठा' का गीत 'थोड़ा है थोड़े की ज़रुरत है' तो मिडिल क्लास का एंथम बन चुका है.
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