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लता मंगेशकर को जब धीमा ज़हर देने की कोशिश की गई थी...
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी की भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर
भारतीय सिनेमा की स्वर कोकिला लता मंगेशकर का निधन हो गया है. उन्हें एक महीने पहले कोरोना संक्रमण के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया था जहाँ आज सुबह 8 बजकर 12 मिनट बजकर उन्होंने अंतिम साँस ली. लता मंगेशकर की संगीत यात्रा के अहम पड़ावों पर एक नज़र.
बात साल 1943-44 के आसपास की है. कोल्हापुर में एक फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी और इस वक़्त की मशहूर गायिका नूरजहाँ अपने गानों की रिकॉर्डिंग के लिए वहाँ आई थीं. उसी फ़िल्म में एक छोटी बच्ची भी रोल कर रही थी.
फ़िल्म के निर्माता ने नूरजहाँ से बच्ची का परिचय करवाते हुए बोला कि ये लता है और ये भी गाना गाती है. नूरजहाँ तपाक से बोली, अच्छा कुछ गा के सुनाओ. लता ने शास्त्रीय संगीत से सजा एक गाना सुनाया. नूर जहाँ सुनती गईं और लता गाती गईं.
बच्ची के गाने से ख़ुश होकर नूरजहाँ बोली कि बहुत अच्छा गाती हो, बस रियाज़ करती रहना, आगे जाओगी. रोज़ी रोटी के लिए फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल करने वाली ये बच्ची आगे चल कर सुरों की मलिका लता मंगेशकर बनीं.
यहाँ गीतकार-निर्देशक गुलज़ार की कही एक बात याद आती है कि लता सिर्फ़ एक गायिका नहीं हैं, वो हर हिंदुस्तानी के रोज़ मर्रा के जीने का हिस्सा बन चुकी हैं.
संगीतकार आनंदघन भी थीं लता
गायिकी के अलावा लता की शख़्सियत के कई पहलू थे जिनके बारे में लोग कम जानते हैं. मसलन लता मंगेशकर का आनंदघन नाम के संगीत निर्देशक से करीबी रिश्ता.
आनंदघन ने 60 के दशक में चार मराठी फ़िल्मों के लिए म्यूज़िक दिया. ये व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि लता मंगेशकर ख़ुद थीं जो नाम बदलकर संगीत देती थीं.
1950 में उन्होंने अपने असली नाम तले भी एक मराठी फ़िल्म का संगीत दिया था- राम राम पहुणे. लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा नहीं चला.
मराठी फ़िल्म साधी माणस को सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार मिला था. लेकिन लता मंगेशकर अपनी सीट पर शांत बैठी रही. तब किसी ने बताया कि संगीतघन कोई और नहीं लता मंगेशकर हैं.
ये बात भी कम लोग ही जानते हैं कि ऋषिकेश मुखर्जी ने लता मंगेशकर को फ़िल्म आनंद का संगीत देने का न्योता दिया था. लेकिन लता ने इनकार कर दिया था.
ज़हर देने का आशंका जताई थी लता ने
लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर ने लता मंगेशकर से इंटरव्यू कर एक किताब लिखी थी.
उसी किताब में एक गाने की रिकॉर्डिंग का ज़िक्र करते हुए लता बताती हैं, "1962 में मैं एक महीने के लिए बीमार हो गई थी. मेरे पेट का एक्सरे लिया गया और मुझे बताया गया कि मुझे धीमा ज़हर दिया गया है. हमारे घर पर एक ही नौकर था जो खाना बनाता था. उस दिन वो नौकर बिना बताए निकल गया. पैसे भी नहीं लिए."
"तब हमें लगा कि किसी ने उसे हमारे घर पर रखवा दिया था. हम नहीं जानते वो कौन था. तीन महीने तक मैं बिस्तर पर थी. तब मजरूह साहब ने मेरी मदद की. वो रोज़ शाम को घर आते और तीन महीने तक सिलसिला जारी रहा. मैं जो खाती, वो भी वही खाते."
संगीत की दुनिया में लता के इस सफ़र का अंजाम भले ही कामयाबी की बुलंदियों को छूने पर हुआ हो लेकिन इसका आगाज़ संघर्ष, तिरस्कार और तकलीफ़ों से भरा रहा.
एक्टिंग से शुरू हुआ सफ़र
बचपन में ही पिता के गुज़रने के बाद लता को छोटे मोटे रोल में अभिनय कर परिवार के लिए पैसा कमाना पड़ रहा था. लेकिन लता को मेक-अप, एक्टिंग -ये सब बिल्कुल पसंद नहीं थी. उन्हें तो बस गायिका बनना था.
इसी दौरान उनकी ज़िंदगी में आए संगीत निर्देशक उस्ताद ग़ुलाम हैदर. उन्होंने लता की आवाज़ सुनी तो उन्हें लेकर निर्देशकों के पास गए. लता की उम्र बमुश्किल 19 साल की थी और उनकी पतली आवाज़ नापसंद कर दी गई. लेकिन ग़ुलाम हैदर अपनी बात पर अड़े रहे और फ़िल्म मजबूर में लता से मुनव्वर सुल्ताना के लिए प्लेबैक करवाया.
लता बताती हैं कि ग़ुलाम हैदर ने उनसे कहा था कि एक दिन तुम बहुत बड़ी कलाकार बनोगी और जो लोग तुम्हें नकार रहे हैं, वही लोग तुम्हारे पीछे भागेंगे.
ये अजीब इत्तेफ़ाक है कि नूर जहाँ और ग़ुलाम हैदर दोनों बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए पर लता के लिए उनकी कही बात सच हो गई.
किशोर से अजीब मुलाक़ात
फ़िल्म मजबूर में लता का गाना सुनने के बाद लता को कमाल अमरोही की फ़िल्म महल मिली और उन्होंने आएगा आने वाला गाया. इसके बाद लता को कभी फ़िल्मों की कमी नहीं हुई.
शुरुआती दिनों का एक मज़ेदार किस्सा लता मंगेशकर ने कुछ साल पहले बीबीसी को यूँ सुनाया था, "40 के दशक में जब मैंने फिल्मों में गाना शुरू ही किया था. तब मैं अपने घर से लोकल पकड़कर मलाड जाती थी और वहां से उतरकर स्टूडियो पैदल जाती. रास्ते में किशोर दा भी मिलते. लेकिन मैं उनको और वो मुझे नहीं पहचानते थे. किशोर दा मेरी तरफ देखते रहते. कभी हंसते. कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते. मुझे उनकी हरकतें अजीब सी लगतीं. मैं उस वक़्त खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी. एक दिन किशोर दा भी मेरे पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए. मैंने खेमचंद जी से शिकायत कर दी कि ये लड़का मेरा पीछा करता रहता है. मुझे देखकर हंसता है. तब उन्होंने कहा कि अरे, ये तो अपने अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर है. फिर उन्होंने मेरी और किशोर दा की मुलाक़ात करवाई. और हमने उस फिल्म में साथ में पहली बार गाना गाया."
मोहम्मद रफी के खिलाफ़ लिया था स्टैंड
बाद के सालों में लता ने सारे बड़े संगीतकारों और किशोर, रफी, मुकेश, हेमंत कुमार जैसे गायकों के साथ गाने गए. बहुत कम उम्र में अपने दम पर लता ने इंडस्ट्री में अपना मकाम बनाया. लता ने बड़े मुद्दों पर स्टैंड लेने से गुरेज़ नहीं किया फिर इसके लिए उन्हें भले ही दिग्गजों से टकराना पड़ा.
मसलन रॉयलटी के मुद्दे को लेकर वो अपने दौर के सबसे बड़े गायकों में एक मोहम्मद रफी, शोमैन राज कपूर और एचएमवी कंपनी तक से भिड़ गईं.
दरअसल 60 के दशक में लता अपनी फिल्मों में गाना गाने के लिए रॉयल्टी लेना शुरू कर चुकी थी. लेकिन वो चाहती थी कि सभी गायकों को रॉयल्टी मिले. उन्होंने, मुकेश और तलत महमूद ने एसोसिएशन बनाई और रिकॉर्डिंग कंपनी एचएमवी और प्रोड्यूसर्स से मांग की कि गायकों को गानों के लिए रॉयल्टी मिलनी चाहिए. लेकिन उनकी मांग पर सुनवाई नहीं हुई. ऐसे में उन्होंने एचएमवी के लिए रिकॉर्ड करना ही बंद कर दिया.
मोहम्मद रफ़ी रॉयल्टी के ख़िलाफ़ थे. बात को सुलझाने के लिए सब मिले तो बात और बिगड़ गई.
लता मंगेशकर बीबीसी इंटरव्यू में बताती हैं, "रफ़ी साहब ग़ुस्सा हो गए. मेरी तरफ देखकर बोले कि मुझे क्या समझा रहे हो. ये जो महारानी बैठी है. इसी से बात करो. तो मैंने भी गुस्से में कह दिया कि आपने मुझे सही समझा. मैं महारानी ही हूं. उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे साथ गाने ही नहीं गाऊंगा. मैंने भी पलट कर कह दिया, कि आप ये तक़लीफ मत करिए. मैं ही नहीं गाऊंगी आपके साथ." कोई तीन साल तक ये झगड़ा चला.
इसी मुद्दे पर राजकपूर से भी लता भिड़ गईं और काम करने से मना दिया. 70 के दशक में राज कपूर अपनी पंसदीदा गायिका के पास फिर लौटे और बॉबी के गाने गवाए.
फ़िल्मफ़ेयर से टकराईं
वो किस तरह के गाने गाएँगी, इसके लिए भी लता ने अपने दम पर और अपनी मर्ज़ी से गाने चुने. एक महिला गायक के लिए ऐसा कर पाना उस समय बड़ी बात थी.
लता मंगेशकर ने अपने करियर में कई अवॉर्ड जीते. वैसे दिलचस्प बात है कि 1958 तक फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ गायन के लिए पुरस्कार ही नहीं था.
1957 में शंकर जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिलने वाला था और वो लता के पास आए कि लता समारोह में गाना गाएँ.
उसके बाद क्या हुआ लता नसरीन मुन्नी कबीर की लिखी किताब में बताती हैं- मैंने जयकिशन जी से कहा मैं फ़िल्मफेयर में नहीं गाऊँगी. आपको पुरस्कार मिल रहा है, मुझे नहीं. वो लोग सर्वश्रेष्ठ गायक या गीतकार वो पुरस्कार नहीं दे रहे. तो अपने ऑरकेस्ट्रा दल को कहिए कि बिना गायक के धुन बजाएँ. मैं फ़िल्मफ़ेयर के लिए तब तक नहीं गाऊँगी जब तक पार्श्वगायक और गीतकार लोगों को भी पुरस्कार घोषित नहीं किया जाता."
1959 में जब शुरु हुआ तो कई सालों तक पुरुष और महिला गायकों के लिए एक ही कैटेगरी थी. 1959 में इस मिक्सड वर्ग का पहला अवॉर्ड लता ने ही जीता था फ़िल्म मधुमती के गाने आजा रे परदेसी के लिए.
लता की ख़ूबियाँ
लता के गानों की ख़ूबियों पर बात करना वाकई मुश्किल काम है. गीत के जज़्बात और नज़ाकत को अपनी आवाज़ में पिरोने में वो माहिर थीं.
मसलन फ़िल्म बंदिनी का गाना 'मोरा गोरा अंग लेइलो.'.. अलहड़ मस्ती वाले गाने लता को मिले और गंभीर गाने आशा भोंसले को.
या..जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे, हो मेरे रंग गए सांझ सकारे
तू तो अंखियों से जाने जी की बतियाँ
तोसे मिलना ही जुल्म भया रे
लता की आवाज़ में ये गाना सुनते हुए आप प्यार में डूबी कल्याणी (नूतन) के दिल की धड़कन महसूस कर सकते हैं.
ये फिर रज़िया सुल्तान का गाना 'ऐ दिले नादां' आप सुनते हैं तो लता की आवाज़ और बीच की वो ख़ामोशी दिल के आर-पार हो जाती है.
या फ़िल्म अनुपमा का वो गाना -'कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं...' जहाँ ज़िंदगी के अकेलेपन और सूनेपन से जूझती और ख़ुद से बातें एक लड़की जो बेहद उदास है पर ख़ुशी का मुखौटा लगाए घूमती है. लता ने मन की गहराइयों तक छू जाने वाली आवाज़ में इसे गाया है.
फ़िल्म अनामिका का गाना लीजिए- 'बाहों में चले आओ' जो एक प्रेमिका रात के अंधेरे में धीमे से गा रही है. अगर आप वो गाना सुनेंगे तो रात को अपने आगोश में लेती उस प्रेमिका के जज़्बात को आप महसूस कर पाएँगे.
60 और 70 की उम्र में लता ने माधुरी, काजोल, जूही, प्रीति ज़िंटा जैसी अभिनेत्रियों के लिए गाने गए.
गीत के बोल को लेकर चुनिंदा
ये किस्सा तो मशहूर है ही कि कैसे लता की आवाज़ में 'ऐ मेरे वतन के लोगों' सुनने के बाद जवाहर लाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे. गाने के बाद निर्देशक महबूब खान आए और लता को नेहरू के पास ले गए . तब नेहरू ने कहा था कि तुमने तो मुझे रुला ही दिया.
इससे ठीक उलट था फ़िल्म इंतकाम का वो कैबरे -'आ जाने जा, तेरा ये हुस्न जवाँ' जो हेलन पर फ़िल्माया गया था. वैसे क्लब नंबर और कैबरे से लता ने हमेशा ही गुरेज़ किया. 'ओ जाने जा' शायद लता की आवाज़ में एकमात्र कैबरे होगा.
जबकि उनकी बहन आशा भोंसले ने ग़ज़ल, कैबरे, शास्त्रीय संगीत सब तरह के गाने गाए हैं और कई लोग दोनों की तुलना में आशा को ज़्यादा वर्सटाइल गायिका मानते हैं.
लता पर अलग राय
मशहूर चित्रकार एमएफ़ हुसैन की इस पर अपनी राय थी. कई फ़िल्में बना चुके हुसैन ने बीबीसी से इंटरव्यू में कहा था कि लता लोकप्रिय गायिका हैं पर महान नहीं .
इस बात को लेकर विवाद भी उठता रहा कि गायिकी की दुनिया में लता का दबदबा इतना रहा कि दूसरी कई गायिकाओं को उभरने का मौका ही नहीं मिला. पर लता हमेशा इससे इनकार करती रहीं.
इस सब से परे लता के दीवाने और उनके फ़न के कद्रदान लाखों में हैं और भारत की सीमा से बाहर सरहद पार दूसरे देशों में भी हैं.
लता की निजी ज़िंदगी
नसरीन मुन्नी की किताब लता मंगेशकर ..इन हर ओन व्याइस में उनसे शादी पर भी सवाल किए गए हैं.
इस सिलसिले में लता बताती हैं- "मेरे पिता ने मेरी जन्मपत्री पढ़ी थी और कहा था कि मैं अकल्पनीय रूप से मशहूर होऊँगी, पूरे परिवार को देखूँगी और शादी नहीं करूँगी. यही जीवन है. जन्म, मरण और शादी पर किसी को कोई ज़ोर नहीं होता. अगर मैंने शादी की होती तो मेरी ज़िंदगी अलग होती. मैं कभी अकेलापन महसूस नहीं करती. मैं हमेशा परिवार के साथ रही हूँ."
बचपन
वैसे अतीत में जाएं तो मंगेशकर परिवार का ताल्लुक हमेशा से संगीत से रहा. पिता दीनानाथ मंगेशकर ख़ुद भी गाते थे और ड्रामा कंपनी चलाते थे. साथ ही कई छात्रों को संगीत की शिक्षा भी देते थे. पर इस बात से अंजान कि उनके अपने घर में संगीत प्रतिभा है. लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ.
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में लता बताती हैं, "एक बार मेरे पिताजी अपने शागिर्द को संगीत सिखा रहे थे. उन्हें शाम को कहीं जाना पड़ गया तो उन्होंने शागिर्द से कहा कि तुम अभ्यास करो मैं आता हूं. मैं बालकनी में बैठे शागिर्द को सुन रही थी. मैं उसके पास गई और कहा कि ये बंदिश तुम गलत गा रहे हो. मैंने उसको वो बंदिश गाकर सुनाई. इतनी देर में पिताजी आ गए और मैं वहां से भागी. उस वक्त मैं चार-पांच साल की ही थी और पिताजी को नहीं पता था कि मैं गाती भी हूं. शागिर्द के जाने के बाद पिताजी ने मां से कहा कि अपने घर में गवैया बैठा है और हम बाहर वालों को सिखा रहे हैं.अगले दिन पिताजी ने मुझे छ बजे उठाकर तानपुरा थमा दिया."
पहली दफ़ा उन्होंने अपने पिता के साथ स्टेज पर परफॉर्मेंस दिया जब वो सिर्फ़ 9 साल की थी और उन्होंने राग खंबामती गाया था.
हालांकि लता के पिता नहीं चाहते थे कि वो फ़िल्मों वगैहर में गाना गाए. लेकिन 1942 में अपने एक दोस्त की गुज़ारिश पर पंडित दीनानाथ मंगेशकर तैयार हो गए और लता ने मार्च 1942 में एक मराठी फ़िल्म में गाना गाया. हुआ कुछ यूँ कि गाना रिकॉर्ड तो हुआ पर फ़िल्म नहीं बनी और एक महीने बाद ही लता के पिता गुज़र गए.
उस समय परिवार चलाने की ज़िम्मेदारी लता पर आ गई और उन्हें सहारा मिला निर्देशक मास्टर विनायक का जो अभिनेत्री नंदा के पिता थे. मास्टर विनायक ने लता को फ़िल्मों में बतौर एक्टर काम दिया और उस्ताद अमान अली खांन की शागिर्दगी भी दिलवाई जिनसे उन्होंने संगीत सीखा और उन्हें मराठी फ़िल्म में गाने का मौका मिला. और यहीं से आगे के रास्ते उनके लिेए खुले.
संगीत को लेकर उनकी लगन की सब लोग दाद देते हैं.
'लता एक सुर गाथा' नाम की किताब में लेखक यतिंद्र मिश्र लिखते हैं, "बॉलीवुड के दिग्गज संगीतकार अनिल विश्वास एक दिन सुरिंदर कौर का गीत रिकॉर्ड करा रहे थे. अनिल दा ने बड़े प्यार से कहा, ''लतिके ! इधर आओ, तुम कोरस में गाओ. इससे गाना अच्छा हो जाएगा. लता जी ने बताया कि दादा ने ना जाने किस मूड में बड़ी प्रसन्नता से यह बात कही थी, तो मुझे भी लगा उनके मन की बात करते हैं. और आप विश्वास करिए कि मुझे उस समय कोरस में गाकर भी उतना ही आनंद आया, जितना की उनके मुख्य किरदारों के लिए रचे गए गीतों को गाते हुए होता था." ये बात तब की है कि लता मुख्य सिंगर के तौर पर नाम कमा चुकी थीं.
एक बार पंडित जसराज ने लता के बारे में कहा था, "मैं कभी कभी सोचता हूं, यार कमाल है. हम एक शिष्य को बुलाते हैं, उसको सिखाने की कोशिश करते हैं. यहां लताजी से तो पूरी दुनिया ऐसे ही सीखती रहती है. चार पीढ़ियों की गुरु बनना कोई मामूली बात नहीं"
और जहाँ तक फ़िल्मों में योगदान की बात है तो लता मंगेशनकर के ही शब्द याद आते हैं. 2013 में भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के 100 साल पूरे होने पर लता ने कहा था, अगर फ़िल्म उद्योग के 100 साल हैं तो इसमें 71 साल मेरे भी हैं.
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