अमिताभ बच्चनः 'एंग्री यंग मैन' से दादा साहेब फ़ाल्के पुरस्कार तक

    • Author, मिहिर पांड्या
    • पदनाम, फ़िल्म समीक्षक

अमिताभ बच्चन के स्टारडम पर लिखी अपनी शोध पुस्तक 'अमिताभ : मेकिंग ऑफ़ ए सुपरस्टार' में लेखिका सुष्मिता दासगुप्ता अमिताभ बच्चन के सिनेमा में पदार्पण को एक युगांतकारी घटना बताते हुए लिखती हैं कि शायद हिन्दी सिनेमा में पहला साउंड के आने, और दूसरा कलर के आने के बाद तीसरी सबसे बड़ी युग परिवर्तनकारी घटना अमिताभ युग की शुरुआत ही मानी जा सकती है.

हो सकता है कि इस कथन में आपको थोड़ा महिमामंडन जैसा लगे, लेकिन जब आप इस दावे के ख़ास धारा को मोड़नेवाले आयाम पर गौर करेंगे तो अर्थ बेहतर समझ आएगा.

क्योंकि अमिताभ परंपरा के निर्माता होने से पहले उसे तोड़नेवाले थे.

सिनेमा की 'दूसरी परंपरा' की खोज

वे ज़रूरत से ज़्यादा लम्बे थे. उस ज़माने के फ़ैशन बेलबॉटम में तो उनकी छरहरी टांगें और उभरकर आती थीं.

ट्रेड पंडितों ने भविष्यवाणी की कि इस 'दोष' के चलते उनके साथ काम करने को, सफ़ल जोड़ी बनाने को कोई स्थापित नायिका तैयार नहीं होगी.

पर नतीजा, उन्होंने अपने सिनेमा में नायिका की भूमिका को ही सदा के लिए हाशिये पर भेज दिया.

और जैसा सिने इतिहासकार रवि वासुदेवन लिखते हैं, देखते ही देखते इस छह फीट दो इंच के इकहरे बदन लड़के का यही 'दोष' लम्बाई इस लम्बवत पसरे मुम्बई महानगर और उसकी उर्ध्वाधर वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का जीता-जागता प्रतीक बन गई.

आवाज़

अमिताभ भिन्न थे. पंजाब के देहातों से भागे गबरू जवानों और पीढ़ियों से सिनेमा बनाते आये खानदानों से निकले नायकों के बीच वे एक हिन्दी साहित्यकार के बेटे थे.

भले वे आगे चलकर एक्शन फ़िल्मों के सरताज बने, उनकी पहली फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' का अन्तर्मुखी मुस्लिम शायर अनवर अली अपनी बात क़लम और कलाम से कहना कहीं ज़्यादा पसन्द करता था.

उनकी आवाज़ को तय मानकों से भिन्न पाया गया. ऑल इंडिया रेडियो ने उन्हें ऑडिशन के बाद बैरंग लौटा दिया था.

जवाब में उन्होंने आवाज़ के तयशुदा मानकों को ही पलट डाला, हमेशा के लिए.

आज अमिताभ बच्चन की आवाज़ भारतीय जनमानस की सबसे पहचानी हुई आवाज़ों में से एक है. संभवत: सबसे पहचानी.

गुस्सैल नायक में बोलता समाज का प्रतिरोध

सत्तर का दशक उनका दशक था. यूं भी यह दशक आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा दशक है. नक्सलबाड़ी की अनुगूंज, चुनावी उठापटक, भारत-पाकिस्तान युद्ध, सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन और आपातकाल. यहाँ युद्ध भी है, तानाशाह भी, मसीहा भी, क्रांति भी.

यह दशक युवा असंतोष का दशक है, जिसका सिनेमाई प्रतिफलन अमिताभ के 'एंग्री यंग मैन' किरदार में होता है. हिन्दी सिनेमा का सबाल्टर्न हीरो महानायकीय हिंसक टर्न लेता है.

यह फ़िल्में एक ओर सिस्टम के प्रति समाज में पनपते गुस्से की ज़िन्दा बानगी हैं, वहीं हर बार समाज में गहरे पैठी गैर-बराबरी से उपजी इन समस्याओं के किसी मसीहाई समाधान के साथ इन फ़िल्मों ने अपने दर्शक के लिए अन्तत: यथास्थितिवाद की पुष्टि करने का ही काम किया.

'ज़ंजीर' से लेकर 'अग्निपथ' तक अमिताभ का निभाया गया विजय का किरदार इसी द्वैध से ग्रस्त है. वो हीरो नहीं, एंटी-हीरो है.

मैथिली राव उस दौर के सिनेमा पर टिप्पणी करते हुए लिखती हैं, "सलीम-जावेद की पटकथाओं में उन गुमसुम उलझनों के गुस्से की झलक होती थी जो नेहरुवादी सपनों के छले जाने और गरीबी हटाओ के खोखले नारे से पैदा हुई थी."

यश चोपड़ा की 'दीवार' के उस क्लासिक सीन में विजय जब पलटकर अपने भाई को कहता है, "जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ.."

तो वह पूरे नागरिक समाज को उसका निश्छल बचपन छीने जाने का अपराधी ठहरा रहा है. ये तमाम किरदार दरअसल भारत में जारी एकतरफ़ा शहरीकरण तथा कथित विकास की प्रक्रिया की बलि चढ़े किरदार हैं.

सिनेमा के परदे पर हाशिये की पहचान

कभी वो अनाथ है, कभी परिवार से बिछुड़ा, कभी ठुकरा दिया गया है. वो अकेला है, या कर दिया गया है.

उसने अपराध का रास्ता चुना है, क्योंकि सिस्टम उसे ईमानदारी के साथ और किसी सूरत में जीने नहीं देगा.

उसकी मासूमियत को इस ज़ालिम शहर ने उससे छीन लिया है, जिसे वो वापस माँगता है.

अमिताभ के इस 'एंग्री यंग मैन' के किरदार में विनय लाल जैसे इतिहासकार महाभारत के मिथकीय चरित्र कर्ण की, तो आशीष नंदी जैसे अध्येता साहित्य और सिनेमा के अमर चरित्र देवदास की प्रतिछाया देखते हैं.

साठ के दशक के पलायनवादी लोकप्रिय सिनेमा को उन्हीं के हमउम्र दो गुस्सैल लेखकों की जोड़ी वापस यथार्थ के धरातल पर खींच लाती है.

भले उस यथार्थ की सिनेमाई भाषा मैलोड्रामा से क्यों ना भरी हो, और अन्तत: मसीहाई क्लाइमैक्स में क्यों ना समाप्त हो.

सबका अपना 'विजय'

विजय का किरदार दरअसल हमारे सिनेमा का अनन्य 'आउटसाइडर' है, जिसमें इस देश का चवन्नी चैप दर्शक सदा अपना अक्स देखता रहा.

उसके तमाम साथी साझेदार भी समाज के निम्नवर्ग, हाशिये के या अल्पसंख्यक समुदाय से ही आते हैं.

जैसा खुद जावेद अख़्तर 'सिनेमा के बारे में' किताब में 'दीवार' के संदर्भ में नसरीन मुन्नी कबीर से कहते हैं, "विजय कभी भी उस आदमी की तलाश नहीं करता जिसने उसके बाप के साथ ज्यादती की थी. वो उस मुंशी के साथ भी कुछ नहीं करता जिसने उसकी माँ के साथ बदसलूकी की थी. विजय जानता है कि कुसूरवार तो ये सिस्टम है. आखिरकार वो बग़ावत तब करता है जब वो देखता है कि गोदी का एक मज़दूर ठगों के हाथों मारा जाता है, वो बग़ावत तब करता है जब वो देखता है कि गोदी के मज़दूरों से 'प्रोटेक्शन मनी' वसूल की जा रही है.. 'दीवार' में जो विजय के साथ हो रहा था वो सब हममें से बहुत से लोगों के साथ हो रहा था, हो सकता है कि हम विजय की तरह पेश ना आए हों, लेकिन फिर भी हमें उसकी बातें..कहीं ज़्यादा अपनी बातें लगती थीं."

उजालों की परछाइयाँ

ऐसा नहीं कि अमिताभ ने अपने फ़िल्मी करियर में असफ़लताएं नहीं देखीं.

अस्सी के दशक में राजनीति की ज़मीन पर मुँह की खाने के बाद जब वे सिनेमा के परदे पर वापस लौटे, तो उनके हिस्से 'जादूगर', 'तूफ़ान', 'मर्द' और 'शहंशाह' जैसी भौंडी भूमिकाएं ही आईं.

ठीक इसी तरह नब्बे के दशक में बिज़नस की पिच पर बाउंसर झेलते हुए जब वे अपने दूसरे संन्यास से वापस सिनेमा में लौटे तो भी उनके हिस्से 'मृत्युदाता' 'मेजर साब' और 'लाल बादशाह' जैसी औसत से कमतर फ़िल्में रहीं, जिनमें उनकी पूर्ववर्ती महानायकीय इमेज को भुनाने की भद्दी कोशिश दिखती थी.

पर वे इस दौर से बाहर निकले, जिसका श्रेय हर बार उनकी प्रयोगशीलता तथा नए माध्यमों तथा निर्देशकों के साथ काम करने की हिचक तोड़ने को जायेगा. हालांकि ऐसा करने में उन्हें सदा ही ज़रूरत से ज़्यादा देर लगती रही है.

नायिका के कांधे के पीछे खड़ा नायक

पर यह भी पोएटिक जस्टिस ही है कि जिस महानायक ने अपने गुस्सैल 'एंग्री यंग मैन' अवतार के साथ लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा से नायिकाओं की भूमिका को तक़रीबन अप्रासंगिक बना दिया था, उसके अभिनय जीवन के नवीनतम चरण की सबसे सुनहरी फ़िल्में सब महिलाओं के कांधों पर खड़ी हैं.

और इनमें सबसे ख़ास 'पीकू', जिसके लिए उन्होंने अपना नवीनतम राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता. महिला किरदार के नाम पर आधारित इस फ़िल्म को एक महिला ने ही लिखा है.

आज के अमिताभ के इस सबसे चमकीले अवतार, खडूस लेकिन हरदिलअज़ीज़ 'भास्कर बनर्जी' की भूमिका में दीपिका पादुकोण एवं जूही चतुर्वेदी दोनों का बराबर हिस्सा है.

सहायक भूमिकाएं, आवाज़ का जादू

भंसाली की 'ब्लैक' में वे एक ज़िद्दी अध्यापक की भूमिका में हैं, जो हमारी नन्ही सी नायिका की अन्धेरी ज़िन्दगी के तमाम बन्द दरवाज़े खोलता है.

तो उधर अकेली ही कलकत्ता महानगर के हर तालाबन्द दरवाज़े से टकराती 'कहानी' की नायिका बिद्या बाग़ची से हमारा पूर्ण परिचय उनकी ही गूंजती आवाज़ 'एकला चालो रे' की टेक पर मुकम्मल तरीके से करवाती है.

याद आता है ठीक पचास साल पहले सिनेमायी दुनिया को जब वे आवाज़ के रूप में पहली बार मिले थे, मृणाल सेन की उस 'भुवन शोम' में भी उनके ज़िम्मे एक ज़िन्दादिल गुजराती लड़की 'गौरी' की दुनिया से पहचान करवाने आए थे.

रामगोपाल वर्मा की 'निशब्द' तथा आर बाल्की की 'चीनी कम' में उनके द्वारा निभाया अधेड़ प्रेमी किरदार समाज की मान्यताओं को तोड़ता हुआ 'वर्जित फल' चखने की ख्वाहिश करता है, तो करण जौहर की 'कभी अलविदा ना कहना' का ज़िन्दादिल ससुर सैम अपनी बहु माया को ऐसी शादी के बंधन से निकल जाने की सलाह देता है जिसमें प्यार ही बाक़ी ना बचा हो.

अपनी जगह ये सभी दिलेर चयन हैं. मेरी राय में उस 'पा' वाली भूमिका से कहीं ज़्यादा दिलेर, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला.

भला-बुरा, रूढ़िवादी या क्रांतिकारी

'पिंक' मे आदर्शवादी वकील दीपक सहगल की भूमिका में वे तीन स्वातंत्र्यचेता लड़कियों का कवच बन, उनका सहारा बन खड़े हैं.

इस पुरुषसत्तात्मक समाज को स्त्री की 'नहीं' का पूरा अर्थ समझाते. हालांकि आज भी सोसायटी को यह बात समझाने के लिए एक पुरुष, वो भी खुद महानायक की उपस्थिति चाहिए, यह तथ्य अखरता है.

पर यह बच्चन के किरदार से ज़्यादा हमारे सिनेमा और वृहत्तर समाज पर प्रतिकूल टिप्पणी है.

एक बेहतरीन अभिनेता आपको सदा आदर्श भूमिकाएं नहीं देता. वो सिनेमा का नहीं, नैतिक शिक्षा की किताबों का काम है.

रामायण की कथा में राम भी होंगे और रावण भी. और आधुनिक रामायणों में तो कई बार रावण भी राम के भेस में आता है, सीता से अग्निपरीक्षा मांगता.

अमिताभ बच्चन के पचास साला सिनेमाई सफ़र में भारतीय समाज के तमाम काले-उजले पक्ष पढ़े जा सकते हैं. इतिहास को घटता देखा जा सकता है.

उनकी निभाई भूमिकाओं में हमारे असंतोष हैं, तो हमारी कुंठाएं भी. हमारी मासूमियत है, तो हमारा छल भी. हमारी लापरवाहियाँ हैं, तो हमारी रूढ़ियाँ भी.

सदा सिनेमा का 'आउटसाइडर'

पर सबसे ऊपर अमिताभ ने यह अलिखित नियम पुन: स्थापित किया है कि चाहे यहाँ सौ में से नब्बे नायक सदा 'भीतर वाले' रहें, महानायक हमेशा कोई बाहर वाला होगा. आउटसाइडर. पोएटिक जस्टिस.

फिर चाहे वो पेशावर से आए किसी फल विक्रेता का ज़हीन बेटा हो, या टैलेंट हंट में जीता कोई अजनबी सुदर्शन नौजवान.

दिल्ली से आया किसी भूले-बिसरे स्वतंत्रता सेनानी का उग्र, उच्छृंखल लड़का हो या इलाहाबाद के इक हिन्दी कवि की बेचैन, महत्वाकांक्षी संतान.

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