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इस स्कूल टीचर ने लिखी 'पटाखा' फ़िल्म की बारूदी कहानी
- Author, सूर्यांशी पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसे पता था कि दो बहनों की अनबन की कहानी बॉलीवुड के फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज को इतनी पसंद आ जाएगी कि वो इस पर फ़िल्म 'पटाखा' बना देंगे.
बॉलीवुड के निर्देशक जिनको क़िताबों में गढ़ी कहानियों से एक अनोखा लगाव रहा है, जिन्होंने शेक्सपीयर के नाटकों से प्रेरित होकर 'हैदर,' 'ओमकारा,' जैसी फ़िल्में बनाईं, उन्होंने एक दिन चरण सिंह 'पथिक' की क़िताब 'पीपल के फूल' से एक कहानी पढ़ी, 'दो बहनें.'
उसको पढ़ने के बाद विशाल भारद्वाज इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने इस कहानी के लेखक से संपर्क कर इसको रुपहले पर्दे पर उतारने की ठान ली.
शेक्सपीयर की कहानियों पर अपनी फ़िल्में सजाने वाले निर्देशक जब चरण सिंह 'पथिक' के लेखन से इतने प्रभावित हुए तो लगा कि इस फ़िल्म के ज़रिए दो बहनों की कहानी से तो आप सिनेमाघरों में रू-ब-रू होंगे, क्यों ना हम आपको चरण सिंह 'पथिक' की कहानी से रूबरू कराएं.
बल्ले से खेलते-खेलते थाम ली कलम
54 साल के चरण सिंह 'पथिक' राजस्थान में करौली ज़िले के रौंसी गांव में रहते हैं और अपने गांव से 12 किलोमीटर दूर स्थित केमरी गांव में एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने जाते हैं.
पेशे से अध्यापक, चरण सिंह 'पथिक' कभी क्रिकेटर बनने का ख़्वाब देखा करते थे लेकिन वह सपना केवल ज़िला स्तर तक सिमटकर रह गया.
लेकिन हमेशा से कुछ अलग करने की चाह उन्हें अपने दो भाइयों से अलग बनाती थी.
वह खाली समय में प्रेमचंद की कहानियां पढ़ने लगे और धीरे-धीरे लेखनी की तरफ़ उनका रुझान बढ़ने लगा.
सरकारी स्कूल में पढ़ाते-पढ़ाते उन्होंने क़िताबें लिखना शुरू किया और फिर 2005 में उनकी पहली क़िताब 'बात ये नहीं है' प्रकाशित हुई. ऐसा करते-करते क़रीब 4 क़िताबें उन्होंने लिखी जिनमें से एक थी 'पीपल के फूल'
भाभियों की कहानी है 'पटाखा'
यहां एक दिलचस्प बात का ज़िक्र करना ज़रूर है जिसका ज़िक्र चरण सिंह 'पथिक' ने किया जब बीबीसी ने उनसे बातचीत की.
उनकी क़िताब 'पीपल के फूल' में लिखी कहानी 'दो बहनें' दरअसल असली कहानी है और चरण सिंह 'पथिक' के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी की असल ज़िंदगी से प्रेरित है.
चरण सिंह के बड़े भाई की बीवी और छोटे भाई की बीवी आपस में बहने हैं और उनकी आम ज़िंदगी की नोक-झोंक को चरण सिंह ने अपनी कल्पनाओं के सहारे अक्षरों में पिरोया.
इस कहानी को जब विशाल भारद्वाज ने पढ़ा तो उन्होंने लेखक चरण सिंह 'पथिक' से संपर्क किया और फिर उनके गांव भी गए और उनकी भाभी और छोटे भाई की बीवी से भी मिले. विशाल भारद्वाज तीन दिन वहीं रहे.
विशाल भारद्वाज ने चरण सिंह 'पथिक' को मुंबई बुलाया. जिसके बाद उन्होंने फ़िल्म बनने के हर पड़ाव पर लेखक के साथ कदम से कदम मिलाकर कहानी को फ़िल्म का स्वरूप दिया. यहां तक कि 'पटाखा' की कास्ट - सान्या मल्होत्रा, सुनील ग्रोवर और राधिका मदान की वर्कशॉप भी उनके साथ कराई और राजस्थान में भी सबकी वर्कशॉप हुई.
अब चरण सिंह की कल्पना को विशाल भारद्वाज के पंख लग गए हैं और 'पटाखा' की उड़ान भर रहे हैं. चरण सिंह 'पथिक' ने बताया कि उनकी ये कहानी अब 'पेंगुइन' प्रकाशन में छपेगी और दोनों भाषाओं यानी कि हिंदी और अंग्रेज़ी में छपेगी.
कोई नहीं पूछता हिंदी साहित्यकारों को!
जब उनसे ये सवाल पूछा गया कि बॉलीवुड जब किसी अंग्रेज़ी भाषा के रचनाकार की क़िताब से प्रेरित होकर फ़िल्म बनाता है तो उस लेखक की क़िताबों की बिक्री और लेखक का ओहदा बढ़ जाता है, क्या ऐसा ही उनके साथ भी हो रहा है?
उन्होंने हिंदी साहित्यकारों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए कहा, "ये बेहद दु:खद है कि लोग हिंदी साहित्यकारों को उतनी तवज्जो नहीं देते जितने के वो हक़दार हैं. चेतन भगत के एक नॉवेल पर फ़िल्म बनती है और उनकी क़िताबें बाज़ार में बिकने को बिछ जाती है. वहीं आप किसी हिंदी साहित्यकार के साथ ऐसा होते कम ही देख पाते हैं."
उन्होंने ये भी बताया कि इस फ़िल्म के बाद उनके पास उस स्तर की रॉयल्टी नहीं आई जिस तरह की उम्मीद लोग कर रहे हैं.
हालांकि फ़िल्म के लिए उन्हें मिले पैसों से चरण सिंह 'पथिक' संतुष्ट हैं.
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