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रूना लैला: जिन्हें हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी-बांग्लादेशी तीनों चाहते हैं
- Author, विभुराज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'दो दीवाने शहर में... रात या दोपहर में...', 'दमा दम मस्त कलंदर...'
रूना लैला की आवाज़ हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में किसी तारीफ़ की मोहताज नहीं है.
वो शायद भारतीय उपमहाद्वीप की उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं, जिनकी आवाज़ का जादू चटगांव से लेकर कराची तक महसूस किया जा सकता है.
रूना की पैदाइश बांग्लादेश की है तो परवरिश पाकिस्तान की. यहां तक कि रूना की स्कूलिंग और कॉलेज की तालीम भी पाकिस्तान में ही हुई.
उनके पिता सैयद मोहम्मद इमदाद अली सरकारी नौकरी में थे और कराची में उनकी पोस्टिंग थी.
17 नवंबर 1952 को पैदा हुईं रूना ने महज 12 बरस की उमर में पाकिस्तान फ़िल्म 'जुगनू' के लिए अपना पहला गाना गाया.
दो बरस बाद पाकिस्तानी फ़िल्म 'हम दोनों' ने उनके लिए कामयाबी की नई इबारत लिख दी.
वो सुपरहिट गीत था, 'उनकी नज़रों से मोहब्बत का जो पैग़ाम मिला...'
ये गीत इस कदर मशहूर हुआ कि रूना का नाम गायकी के बड़े-बड़े फनकारों के साथ लिया जाने लगा. ये 1966 की बात है और तब रूना 14 साल की थीं.
सबसे यादगार गाना
पाकिस्तान से अपने जुड़ाव पर रूना ने एक बार बीबीसी उर्दू से कहा था, "मैं तो वहां पली-बढ़ी, स्कूल-कॉलेज भी वहीं गई. मेरे बचपन के सारे दोस्त वहां हैं. पाकिस्तान की बेशुमार यादें हैं. पाकिस्तानी फ़िल्म जुगनू के लिए गाया गया मेरा पहला गाना सबसे यादगार है."
1972 आते-आते रूना की कशिश भरी आवाज़ संगीत की दुनिया में छा गई. इसी बरस रिलीज़ हुई 'मन का जीत' का गाना 'मेरा बाबू छैल-छबीला, मैं तो नाचूंगी...' ने लोकप्रियता का नया इतिहास रच दिया.
इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 13 साल बाद 1985 में रूना ने इसी गाने को बॉलीवुड फ़िल्म 'घर द्वार' के लिए एक बार फिर से गाया.
बॉलीवुड में दस्तक
1974 में मुंबई में रूना का पहला कॉन्सर्ट हुआ. और फिर रूना संगीतकार जयदेव से मिलीं जिन्होंने उन्हें अपनी फ़िल्म 'घरौंदा' में मौका दिया. 'घरौंदा' का सोलो सॉन्ग 'तुम्हें हो न हो, मुझको तो इतना यकीन है...' आज भी बेहद लोकप्रिय है.
बॉलीवुड से सिलसिला कैसे बना, इस सवाल पर उन्होंने कहा था, "मैं 1974 की जनवरी में पाकिस्तान से बांग्लादेश आ गई. नवंबर में मुझे भारत की तरफ़ से किसी कल्चरल प्रोग्राम के लिए न्योता मिला."
बॉलीवुड में रूना ऐसे वक्त में आईं जब लता मंगेशकर और आशा भोंसले ही सिनेमाई संगीत पर राज कर रही थीं.
इन दोनों की आवाज़ के बीच रूना ताजा हवा के झोंके की तरह आई थीं. 'मेरा बाबू छैल-छबीला, मैं तो नाचूंगी...' और 'दमा दम मस्त कलंदर...' जैसे गीतों से उन्हें यहां ख़ूब शोहरत मिली.
लता और आशा की मुरीद
रूना खुद लता मंगेशकर और आशा भोंसले दोनों की ही बड़ी मुरीद हैं.
लता मंगेशकर के लिए अपनी भावनाएं उन्होंने कुछ इन शब्दों में जाहिर की थी, "भारत में मुझसे ये पूछा गया कि आप किस शख़्सियत से मिलना चाहेंगी. मैंने कहा कि आप मेरी मुलाक़ात बस लता जी से करवा दीजिए, किसी भी तरह. उन्होंने कहा कि लता जी तो बाहर के कार्यक्रमों में बहुत कम जाती हैं लेकिन फिर भी हम लोग कोशिश करेंगे. लेकिन जब कॉन्सर्ट से पहले मंच के पीछे रिहर्सल कर रही थी तो अचानक मैंने देखा कि मंच के पिछले दरवाज़े से कोई सफेद साड़ी पहनी हुई महिला आ रही हैं. उनके साथ कुछ लोग और भी थे. उनके हाथ में गुलाब का गुलदस्ता था. मुझे लगा कि मैं कोई ख्वाब देख रही हूं."
रूना लैला ने पॉप से लेकर गज़ल तक हर विधा में अपनी छाप छोड़ी हैं. वो बचपन में डांसर बनना चाहती थीं और कत्थक और भरतनाट्यम सीख भी रही थीं.
लेकिन बड़ी बहन का गला ख़राब होने की वजह से उन्हें एक दिन एक म्यूज़िक प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ा और वो जीत गईं.
पांच दशकों से लंबे संगीत करियर में प्रशंसकों का दिल जीतने की रूना की रफ़्तार थमी नहीं है. आख़िर उन्हें यूं ही तो नहीं 'क्वीन ऑफ़ बांग्ला पॉप' कहा जाता है.
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