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पूर्व पीएम की सचिव बनीं कुष्ठ रोगियों की 'मां'
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रक्सौल (बिहार) से, बीबीसी हिंदी के लिए
सुंदरपुर गांव के लोग कविता भट्टाराई को 'मां' कहते हैं. यहां चलने वाले आश्रम के 140 कुष्ठ रोगियों के लिए वो उनकी डॉक्टर, सलाहकार और दोस्त हैं.
जिन लोगों को समाज ने ठुकरा दिया कविता भट्टाराई उनका सहारा हैं. कविता भट्टाराई नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टाराई की सचिव रह चुकीं हैं.
वो यहां रह रहे 10 साल के बच्चे की 'मां' हैं, तो 60 साल के वृद्ध भी उन्हें यही पुकारते हैं.
28 फरवरी 1961 को नेपाल के एक सभ्रांत परिवार में जन्मीं कविता भट्टाराई ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के कैनेडी स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट से लोक प्रशासन में मास्टर की डिग्री हासिल की है.
उन्होंने काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय और बैंकॉक के एशियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी से भी पढ़ाई की है. वे नेपाल की नेशनल बैडमिंटन टीम का भी हिस्सा थीं.
आठ साल से कुष्ठरोगियों की सेवा
कविता भट्टाराई पिछले आठ सालों से सुंदरपुर में रहती हैं. यह पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल प्रखंड का एक गांव है. भारत-नेपाल की सीमा पर बसा सुंदरपुर 'नो मेंस लैंड' के बिल्कुल करीब है.
यही वजह है कि लिट्ल फ्लावर लेप्रोसी वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा यहां संचालित कुष्ठ आश्रम में भारत और नेपाल दोनों देशों के कुष्ठ रोगियों अपने इलाज के लिए आते हैं. यहां कुष्ठ रोगियों के साथ उनके परिवारवाले भी रहते हैं.
कविता भट्टाराई के पास करियर के बेहतरीन विकल्प थे लेकिन फिर भी उन्होंने मुश्किल डगर को चुना. यही सवाल हमने उनसे जानना चाहा कि आखिर क्यों शहर की ज़िंदगी छोड़ कर गांव में कुष्ठ रोगियों के साथ रहने का फैसला किया.
काठमांडू छोड़, गांव में बसीं
कविता भट्टाराई कहती हैं ''हमारा अप्रोच गलत है. गरीबों को हम खराब सेवाएं देते हैं. इससे उनकी गरीबी तो मिटती नहीं है, और बढ़ जाती है. जिससे उनको मानसिक परेशानी से जूझना पड़ता है.
वो ठीक तो हो जाते हैं लेकिन उनका जीवन स्तर बेहतर नहीं हो पाता. इसलिए मुझे लगा कि ऐसी व्यवस्था में रहने से बेहतर है कि मैं समाज के उन लोगों के लिए कुछ करूं ,जिन्हें सच में मेरी जरुरत है.
मैं ब्रदर क्रिस्टो दास से मिली और 2009 में सुंदरपुर आ गयी. अब मेरी जिंदगी का लक्ष्य इन कुष्ठ रोगियों की सेवा करना है. मैं प्रोफेशनल समाजसेवी नहीं हूं. मैं परिवर्तन के लिए काम करती हूं.
भैरोगंज बगहा की नयना मुसमात के घर में कोई नहीं है. उनके पैर में फोड़ा हुआ तो वे अपनी बेटी के साथ यहां आ गयीं. उन्होंने बताया कि सुंदरपुर में उन्हें नया जीवन मिला है.
बकौल रुक्मिणी, वो जिंदगी से निराश हो चुकी थीं लेकिन यहां माताजी (कविता भट्टराई) से मिलने के बाद उनमें जीने की आस जगी है. वो चाहती हैं कि बीमारी ठीक होने के बाद वे भी यहीं रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा करें.
महात्मा गांधी और विनोबा भावे हैं आदर्श
कविता भट्टाराई कहती हैं कि ''उनके जीवन पर महात्मा गांधी और विनोबा भावे के साथ ही नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी भट्टाराई का भी काफी असर रहा.
उनके मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय में रहकर भी आप वो तमाम काम नहीं कर सकते जो समाज बदलने के लिए जरुरी हैं. इसी वजह से मैंने इंटरनेशनल फोरम पर समाज सेवा के विकल्प को चुना और कनाडा के लेजर फाउंडेशन से जुड़ गयी. इसी दौरान मुझे लिट्ल फ्लावर लेप्रोसी वेलफेयर मिशन के बारे मे पता चला.''
1981 में खुला था कुष्ठ आश्रम
स्थानीय पत्रकार दीपक अग्निरथ ने बीबीसी को बताया कि ''70 के दशक में सुंदरपुर इलाके में काफी लोग कुष्ठरोग से पीड़ित थे. तब यहां के लोग कलकत्ता (कोलकाता) जाकर मिशनरीज़ आफ चैरिटीज़ में अपना इलाज करवाते थे.
तब हुई एक दुर्घटना के बाद मदर टेरेसा ने संत क्रेस्टो दास को यहां भेजा. जिसके बाद साल 1982 में यहां लिट्ल फ्लावर कुष्ठ आश्रम की स्थापना की गयी. संत क्रेस्टो दास आजीवन इसके संचालक रहे.
साल 2011 में उनके देहांत के बाद कविता भट्टाराई इसकी प्रमुख बनाई गयीं.
यहां कुष्ठ रोगियों के लिए 140 बिस्तर का अस्पताल है , उनके बच्चों के लिए स्कूल और स्वावलंबन के लिए खादी सूत की कटाई का सेंटर, डेयरी और कारपेंटर वर्कशाप भी बनाया गया है.
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