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रवींद्र जैन: 'चितचोर' से 'राम तेरी गंगा मैली' तक
- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, संगीत और कला समीक्षक
रवींद्र जैन जैसे विलक्षण संगीतकार की पूरी देन एक ऐसे प्रबुद्ध कलाकार के योगदान की तरह रेखांकित की जा सकती है, जिन्होंने संगीत-निर्देशन के साथ-साथ गीत और कविता लिखने का भी बहुत ही सफल और सार्थक काम किया है.
वे उन चंद बिरले संगीतकारों में रहे हैं, जिन्होंने कविता, शायरी और गीत की समझ को आत्मसात करते हुए लीक से हटकर कुछ गम्भीर तरह का काम किया है.
रवींद्र जैन इसी मायने में अलग राह के एक ऐसे समावेशी संगीतकार के रूप में देखे जा सकते हैं, जिन्होंने ग्रामीण और शहरी जीवन के मनोभावों को फ़िल्मी धुनों के लिए रचकर अमर बनाया है.
'गीत गाता चल'
रवींद्र जैन बचपन से ही अपनी कमजोर आंखों के चलते साहित्य और कविता को दूसरों के मुख से सुनकर बड़े होते रहे. इस लिहाज़ से उनके भीतर एक बिल्कुल अलग किस्म की दुनिया बनी जिसने उनके मानस को उर्वर करते हुए वाचिक परम्परा का राही बनाया.
वे जो कुछ भी सुनते थे, उन्हें याद रह जाता था और उन्होंने अपने संगीत की नोटबुक और कॉपियों को भी मानसिक रूप से स्मरण में संजोया. अभ्यास के लिए सहज बनाया. यही वो अलग राह है, जो रवींद्र जैन के संगीत चितेरे को कल्पनाशील बनाते हुए एक बिल्कुल जुदा क़िस्म का संगीतकार बनाती है.
कुछ गीतों के बहाने उनकी उस उर्वरा और स्मरण की मेधा को देशज अभिव्यक्ति के तहत देखा जा सकता है. इनमें प्रमुख रूप से 'चितचोर' का गीत 'जब दीप जले आना जब शाम ढले जाना', 'गीत गाता चल' का 'श्याम तेरी बंशी पुकारे राधा नाम' और 'राम तेरी गंगा मैली' का 'एक राधा एक मीरा दोनों ने श्याम को चाहा' आएंगे.
बंगाल का जादू
रवींद्र जैन ने बचपन में संगीत की बारीकियाँ पंडित घंमडी लाल, पंडित जनार्दन शर्मा और पंडित नाथूराम शर्मा से सीखी थीं और बाक़ायदा प्रयाग संगीत समिति से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा ली थी.
एक हारमोनियम वादक के रूप में भी उन्हें महारत हासिल रही और बंगाल के लोक संगीत के प्रति समर्पित रहते हुए उन्होंने रवींद्र संगीत के स्थापत्य को भी अपनी सांगीतिक यात्रा में विशेष स्थान दिया.
इस आहट और बंगाल के उस 'सुर-प्रभाव' को 'सुनयना' के 'मेघा ओ रे मेघा' और 'सौदागर' के 'तेरा मेरा साथ रहे' में बखूबी सुना जा सकता है.
बंगाल के इस जादू का विस्तार उनकी उन अन्य व्यावसायिक धुनों में भी दिखाई देता है, जो लोकप्रियता के आँगन में भी स्वीकृत हुईं और आज रवींद्र जैन के सर्वश्रेष्ठ गीतों की नुमाइंदगी के तौर पर देखी जाती हैं.
हरारत और रंगत
रवींद्र जैन ने कम फ़िल्मों में संगीत दिया है, उनमें भी अधिकतर फ़िल्में घरेलू या ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्में रहीं हैं.
फिर भी, खुद की प्रतिभा और संगीत के प्रति वैविध्य टटोलने वाली उनकी दृष्टि ने इन फ़िल्मों में भी नवाचारी तौर पर संगीत के लिए हरारत और रंगत भरी है.
यदि हम किसी रूपक या प्रतीक के आधार पर कहें, तो रवींद्र जैन का संगीत लोक-व्याप्ति में उस पुकार को संकेतित है, जो गांव की सीवान पर अपनी कूक को ज़्यादा बड़े अर्थों में चरितार्थ करता है.
फिर वह 'गीत गाता चल' के संगीत का मामला हो या कि 'चितचोर' का बिल्कुल ठेठ पारम्परिक स्वर, जिसमें 'येसुदास' की पुकार में 'गोरी तोरा गांव बड़ा प्यारा' सुनना सहज लगता है. ..... और 'अँखियों के झरोखे से' की वो कर्णप्रिय शीर्षक गीत की धुन, जो आज भी एकदम नई लगती है.
नदिया के पार
गांव के माहौल से अलग, शहरी परिवेश के लिए रचा गया उनका संगीत भी उतना ही दिलचस्प है. उन्होंने अधिकांश फ़िल्मों के संगीत द्वारा वो कुलीनता भी हासिल की है, जो एक साथ दो विपरीत छोरों पर साधना किसी संगीतज्ञ के लिए मुश्किल का काम समझा जाता है.
एक तरफ उन्होंने प्रतिष्ठित पार्श्वगायक/गायिकाओं, मसलन- लता मंगेशकर, आशा भोंसले और किशोर कुमार के लिए गीत रचा, तो दूसरी तरफ उन्होंने आरती मुखर्जी, हेमलता, जसपाल सिंह और येसुदास के लिए उनके कॅरियर की सर्वश्रेष्ठ धुनें दीं, जो आज भी फ़िल्म संगीत इतिहास का सुनहरा इतिहास रचती हैं.
'दुल्हन वही जो पिया मन भाये', 'चितचोर', 'ब्रजभूमि' और 'नदिया की पार' जैसी फ़िल्में इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं.
'हिना' का संगीत
लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ते हुए रवींद्र जैन ने अपनी संगीत निर्देशन की सबसे बड़ी सफलता या सर्वश्रेष्ठ का प्रतिपादन राजकपूर बैनर की फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' से किया था.
ये फ़िल्म उनकी करियर में वही मुकाम रखती है, जो खय्याम के लिए 'उमराव जान' और शिव-हरि के लिए 'सिलसिला' का रहा है. कर्णप्रियता की अत्यंत मनोहारी और ताज़गी भरी अदायगी लिए हुए रवींद्र जैन ने राग किरवानी, पहाड़ी, अहीर भैरव आदि रागों का सराहनीय ढंग से उपयोग करते हुए 'राम तेरी गंगा मैली' का संगीत रचा, जो आज भी सराहा जाता है.
साथ ही, लता जी और सुरेश वाडकर की आवाज़ों के माधुर्य के लिए अलग से स्मरणीय बन चुका है. उन्होंने राजकपूर की 'हिना' के लिए भी बेहतरीन संगीत बनाया था.
राजकपूर की आत्मा
इस फ़िल्म की एक धुन के बारे में यह कहा जाता है कि राजकपूर की आत्मा इस धुन में बसती थी.
यह वह गीत है, जिस गीत में दर्द और रूमान का बड़ा उदात्त पक्ष गायिकी और संगीत के चलते छलक सका, जिसे रवींद्र जैन ने रचकर अमर बनाया.
रवींद्र जैन नहीं हैं, मगर उनकी कीर्ति शेष है और वह शाहकार धुन भी, जिसे लता जी ने गाकर अमरता दी है.
'चिठिये दर्द फिराक वालिये' 'हिना' को याद करते हुए रवींद्र जैन जैसे विलक्षण बंदिश रचने वाले संगीतकार को बार-बार याद किया जाना चाहिए.
(रवींद्र जैन पर ये लेख बीबीसी की स्पेशल सिरीज़ 'संग-संग गुनगुनाओगे' का हिस्सा है.)
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