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फ़िल्मों में पिता का मनोरंजन पहले, बच्चे का बाद में: अमोल गुप्ते
- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
'स्टैनली का डब्बा' और 'हवा हवाई' जैसी बच्चों की फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक-निर्माता अमोल गुप्ते का कहना है कि भारत में बच्चे वयस्कों के लिए बनी फ़िल्म देखने के लिए मज़बूर है क्योंकि बच्चों के लिए कोई फ़िल्में बनाता ही नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में अमोल गुप्ते ने माता-पिताओं पर गुस्सा ज़ाहिर करते हुए कहा, "वो सितारों की बुरी फ़िल्में देखने जाते हैं और बाद में उसे गालियां भी देते हैं. पर बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने वाले को सहयोग नहीं दे रहे हैं. आप अपने बच्चों को यूए ज़ोन में धक्का दे रहे है जहां आइटम गाने चलते हैं. पिता का मनोरंजन पहले आता है, बच्चों का नहीं."
'सिर्फ मनोरंजन मक़सद नहीं'
अमोल गुप्ते ने कहा कि महज़ मनोरंजन के लिए वो बच्चों की फ़िल्में नहीं बनाते, बल्कि बच्चों से जुड़े मुद्दों को वो उठाना चाहते हैं.
उनका मानना है कि भारत की ज़्यादातर लोग बच्चों को अनदेखा करते हैं और उन्हें उचित सम्मान नहीं देते. वहीं हॉलीवुड की फ़िल्में मां-बाप अपने स्वार्थ के लिए देखने जाते हैं क्योंकि ऐसी फ़िल्मों में बेहतरीन विज़ुअल इफेक्ट्स होते हैं जिसका लुत्फ़ वयस्क भी उठाते हैं.
चार फ़िल्मों में 500 के करीब बच्चों के साथ काम कर चुके अमोल गुप्ते का कहना है कि वह बच्चों की दिनचर्या में हस्तक्षेप किए बिना फ़िल्में बनाते हैं. उन्होंने अफ़सोस जताया कि छोटी शोहरत के पीछे कई बच्चे अपना बचपन खो देते हैं. इन सब के लिए वह माता पिता को ज़िम्मेदार मानते हैं.
'टैगोर की शिक्षा व्यवस्था की ज़रूरत'
भारत की शिक्षा व्यवस्था पर भी उनके कुछ सवाल हैं. वह कहते हैं कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली से बच्चों का हुनर उभरकर नहीं आता.
अमोल के मुताबिक,"हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाई गई प्रणाली नहीं है बल्कि अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई प्रणाली है जो सिर्फ़ दफ़्तर सम्बन्धी काम के लिए शुरू की गई थी. हम आज भी उस प्रणाली से बाहर नहीं आए हैं. हमें शांति निकेतन प्रणाली की ज़रूरत है, तभी बच्चों का आर्ट और हुनर उभरकर आएगा."
अमोल गुप्ते बच्चों की एक और फ़िल्म 'स्निफ्फ' लेकर आ रहे हैं, जो 25 अगस्त को रिलीज़ होगी.
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