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शंकर-जयकिशन: संगीत की गौरवशाली यात्रा
- Author, यतीन्द्र मिश्र
- पदनाम, संगीत समीक्षक
शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन डाह्याभाई पंचाल की जुगलबंदी ने जिस शंकर-जयकिशन युग की शुरूआत की, वो 1949 से 1969 के बीच पूरे बीस सालों तक सुरीले दौर के तौर पर सिने इतिहास में दर्ज हैं.
यह सभी जानते हैं कि इस संगीतकार जोड़ी की शुरुआत पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर से हुई थी, जहाँ हैदराबाद (शंकर का जन्म मध्य प्रदेश में हुआ, लेकिन शुरुआती दिन हैदराबाद में बीते) से आए हुए शंकर वहां तबला-वादक की हैसियत से नौकरी करते थे.
उन्हें पृथ्वी के नाटकों में कुछ भूमिकाएं भी मिली थीं, जिन्हें उन्होंने अपनी नौकरी का हिस्सा समझकर निभाया था. इसी थिएटर में रहते हुए शंकर ने सितार बजाना भी सीखा. इस समय यह बताना भी ज़रूरी है कि पृथ्वी में आने से पहले शंकर ने अपने किशोरवय के दौरान महफ़िलों में तबला बजाने वाले उस्ताद बाबा नसीर खां से यह वाद्य सीख रखा था.
शंकर के मित्र दत्ताराम, जो बाद में स्वयं एक महत्वपूर्ण संगीत निर्देशक बने और सालों तक जिन्होंने इस जोड़ी के सहायक के रूप में काम किया, फ़िल्मों में संगीत का काम दिलाने के लिए शंकर को एक गुजराती फ़िल्म-निर्देशक चन्द्रवदन भट्ट के पास ले गए.
वहीं इंतज़ार के क्षणों में शंकर की मुलाकात जयकिशन से हुई, जो स्वयं काम की तलाश में आए हुए थे. इसी के चलते तबला-वादक शंकर को हारमोनियम के कलाकार जयकिशन की सोहबत नसीब हुई.
उस समय पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम के टीचर की जगह खाली थी, जिसके प्रस्ताव को जयकिशन ने स्वीकार करके अपनी नियति को भी इस थियेटर के साथ भविष्य के लिए जोड़ लिया. फिर क्या था, बाकी बाद का वृतान्त तो वह है, जो एक बड़े इतिहास का सुनहरा अध्याय बनकर संगीत की दुनिया को हासिल हो सका.
शंकर और जयकिशन की मित्रता ने सांगीतिक अर्थों में भी दो भिन्नताओं को एक सामान्य धरातल पर लाकर एक नए ढंग की संगीतकार जोड़ी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. इसने जहाँ एक ओर तबला और ढोलक को हारमोनियम से मिलाया, वहीं दूसरी ओर लय को अप्रतिम ढंग से सुरीलेपन के पड़ोस में जगह दी.
आंध्र प्रदेश और गुजरात के प्रचलित संगीत और लोक धुनों को भी कभी सामंजस्यपूर्ण ढंग से एक-दूसरे के समीप आने में मदद पहुँचाई.
कहने का आशय यह है कि दोनों संगीतकारों ने अपने-अपने ढंग से अपनी कलाओं और नैसर्गिकता को एक आकाश के तले लाकर खड़ा किया, जहाँ से बाद की संगीतमय यात्रा, फ़िल्म संगीत के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण और गौरवशाली यात्रा बन गई.
'बरसात' (1949) की अपार सफलता से शुरू कर शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने सैकड़ों उल्लेखनीय फ़िल्मों के लिए यादगार संगीत बनाया.
'एस. जे.' का संगीत एक ऐसे आधुनिक संगीत की नींव रखता हुआ दिखाई देता है, जिसमें पूर्वज संगीतकारों के रिदम पैटर्न की अंतर्ध्वनियाँ समाहित न होकर कुछ नए क़िस्म की लयकारी व ताल संरचना अपना आकार लेती है.
हालाँकि यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं कि नए ढंग का संगीत बनाते हुए और पियानो, मैंडोलिन, गिटार, एकॉर्डियन और ड्रम आदि का प्रयोग करने के बावजूद वे उसी समय के शास्त्रीय वाद्यों का इस्तेमाल करने में लगो हुए थे. खासतौर से ऐसे वाद्यों का प्रयोग, जिनकी संरचना को फ़िल्म संगीत में प्रमुखता से अंजाम नहीं दिया जाता.
उदाहरण के तौर पर 'बसन्त बहार' में पन्नालाल घोष की बांसुरी, 'सीमा' में उस्ताद अली अकबर खान के सरोद और पंडित रामनारायण की सारंगी और 'आम्रपाली' में उस्ताद रईस खां के सितार का बेहतरीन इस्तेमाल देखा जा सकता है.
ठीक इसी समय उनके आधुनिक संगीत की समझ को परखने के लिए हम शंकर के पियानो को 'अनाड़ी' में, हजारा सिंह के इलेक्ट्रिक गिटार को 'शरारत' में, मनोहरी सिंह के सैक्सोफ़ोन को 'आरज़ू' में, चिक चॉकलेट के ट्रम्पेट को 'दिल अपना और प्रीत पराई' में, बलसारा के हारमोनियम को 'दिल एक मन्दिर' में तथा गुडी सिरवई के एकॉर्डियन को 'चोरी-चोरी' में सुन सकते हैं.
(बीबीसी हिंदी की फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में सिरीज़- 'संग संग गुनगुनाओगे.' यह लेख इसी सिरीज़ का हिस्सा है.)
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