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भारत में 'बॉब डिलन' क्यों नहीं हैं?
1960 के दशक में अपने गीतों से सामाजिक क्रांतियों में बड़ी भूमिका निभाने वाले अमरीकी पॉप गायक बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है.
गीतकार, संगीतकार, लेखक और अभिनेता पीयूष मिश्रा के मुताबिक भारत में ऐसी सोच और समझ के साथ गीत लिखनेवालों की बेहद कमी है.
पढ़ें बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से उनकी बातचीत के अंश.
बॉब डिलन तो बहुत बड़ी शख़्सियत हैं और उनका संदर्भ अमरीका रहा है पर उनके जैसे ही सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भारत में लिखे जा रहे गीतों को वैसी लोकप्रियता नहीं मिली है.
बड़ी तक़लीफ़ से ये मानना पड़ता है कि विदेश से अलग भारत में लोकप्रिय होने के लिए बॉलीवुड से जुड़ना पड़ता है.
रिकॉर्ड की बिक्री या यूट्यूब पर गाने डालने से वो व्यापक असर नहीं होता जैसा फ़िल्मों से जुड़कर हो सकता है.
मैंने भी अपने गीत नाटकों के लिए लिखे और बाद में उन्हें बॉलीवुड में इस्तेमाल किया तो लोगों ने थोड़ा पहचानना शुरू किया.
उसके बावजूद मैं व्यावसायिक तौर पर गीतकार नहीं बन पाया.
लेकिन ये समझना मुश्किल है कि बिना सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ लाए, गीत कैसे लिखे जा सकते हैं.
अगर प्यार का गीत भी है तो उसके पीछे कोई घटनाक्रम होगा.
मेरा एक गीत है जिसके बोल हैं, 'उजला उजला शहर होगा, जिसमें हम-तुम बनाएंगे घर, दोनों रहेंगे क़बूतर से, जिसमें होगा ना बाज़ों का डर'.
ये अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरने के माहौल में एक मुसलमान लड़की और हिंदू लड़के के बीच के प्रेम पर आधारित था.
पहले मुझे लगता था कि इस तरह के गीत कुछ ही लोग सुनना चाहेंगे. पर ये गीत लोकप्रिय हो रहे हैं और ख़ास तौर पर युवा वर्ग इनसे बहुत प्रभावित है.
मेरा दुर्भाग्य यह है कि जब मैं जवान हो रहा था मैंने तब बॉब डिलन को पढ़ा और सुना नहीं.
जब मेरी विचारधारा ने वामपंथी मोड़ लिया और डिलन ने शांति के मुद्दे पर काम किया तब मैंने उन्हें साक्षात सुना और उनसे बहुत प्रभावित हुआ.
तब तक मैं क़रीब 30 साल का हो चुका था और काफ़ी कुछ लिख चुका था.
उस मायने में मेरा लेखन उनसे प्रेरित नहीं है, पर उनके काम को समझकर मैंने जाना कि मेरी और उनकी सोच काफ़ी एक सी है.
भारत में ऐसा लगता है कि गीत लिखनेवाले आंख, नाक, कान खोलकर नहीं सोते हैं.
क्योंकि अगर वो इतने सजग रहें तो हमारे आसपास लिखने के लिए मुद्दे भी बहुत है और शब्द भी.
और आज का युवा जानना समझना चाहता है कि उसकी दुनिया के मसले क्या हैं, उनका संदर्भ क्या है.
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोकटोक की बातें ख़ूब हो रही हैं पर अगर ऐसा होता तो मेरे गीत बैन हो गए होते.
पिछले सालों में इस तरह के लेखन को गीतों में ढालने की एक जगह ज़रूर बन रही है, पर इसे अभी और बहुत खुलने की ज़रूरत है.