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शनिवार, 03 दिसंबर, 2005 को 14:00 GMT तक के समाचार
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अमरीका में शीतल पेयों से 'मोहभंग'
शीतल पेय
अमरीका में शीतल पेय बनाने वाली कंपनियाँ स्कूलों में अपने उत्पादों की घटती बिक्री को लेकर ख़ासी चिंतित हैं और उनका कहना है कि इससे यह पता चलता है कि युवा अब ज़्यादा स्वास्थ्यप्रद विकल्पों की तरफ़ बढ़ रहे हैं.

मीठे से भरपूर शीतल पेय (सोडा) बेचने वाली कंपनियों पर अमरीका में ख़ासा दबाव है और उन पर आरोप लगाया जाता है कि उनके उत्पादों से बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है.

इन कंपनियों को कुछ आलोचकों की तरफ़ से क़ानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ रहा है. आलोचकों का कहना है कि ये कंपनियाँ स्कूल में आसानी से प्रभाव में आ जाने वाले ग्राहकों को अपना निशाना बनाती हैं.

अमरीका की बेवरेज एसोसिएशन इन आरोपों का खंडन करती है.

एसोसिएशन ने बुधवार को कहा था कि इसकी रिपोर्ट दिखाती है कि ग्राहकों को शीतल पेयों में बहुत बड़ी संख्या में और स्वास्थ्यप्रद विकल्प उपलब्ध हैं.

बुरे के लिए ख़राब?

इस रिपोर्ट में पेप्सी कोला और कोका कोला जैसी कंपनियों के आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया था और रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में बिकने वाले शीतल पेयों में 2002 और 2004 के बीच लगभग एक चौथाई की गिरावट आई है.

साथ ही तत्काल ऊर्जा देने वाले पेयों की माँग में 70 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है, बोतलों में उपलब्ध पानी की माँग 23 प्रतिशत बढ़ी है, डॉयट पेयों की माँग 22 प्रतिशत रही है और फलों के रस को 15 लोगों ने पसंद किया है.

एसोसिएशन का कहना है कि इन आँकड़ों से पता चलता है कि स्कूली छात्रों ने एक सप्ताह में एक के औसत से मीठे से भरपूर शीतल पेय वाली एक कैन ख़रीदी.

इस रिपोर्ट को एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री डॉक्टर रॉबर्ट वेस्कॉट ने तैयार किया है.

आलोचकों का कहना है कि तत्काल ऊर्जा देने वाले शीतल पेय वैसे तो स्वास्थ्यप्रद लगते हैं लेकिन असल में उनमें बहुत मीठा होता है.

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में एक आहार विशेषज्ञ मैरियन नेसले का कहना था कि यह ऐसा है जैसे कि एक बुरी चीज़ से बचने के लिए दूसरी बुरी चीज़ को अपनाया जा रहा है.

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