|
कश्मीर में उम्मीदों की 'फ़ाइल खुली' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के एक सॉफ़्टवेयर टेक्नॉलॉजी पार्क के एक शांत से कोने में 15 से भी ज़्यादा इंजीनियर अमरीका में इस्तेमाल के लिए एक सॉफ़्टवेयर तैयार कर रहे हैं. अमरीका में निर्माण क्षेत्र से जुड़ी कंपनियाँ इसका इस्तेमाल करेंगी और उन्होंने उत्पादन की क़ीमतें कम करने के लिए आउटसोर्सिंग के तहत भारत में ये काम करवाने का फ़ैसला किया है. अब ऐसे में सहज ही लगता है कि काम भारत के सिलिकन वैली बंगलौर या उसके प्रतियोगी शहर हैदराबाद में हो रहा होगा, मगर यहाँ ऐसा नहीं है. ये काम हो रहा है कि भारतीय कश्मीर में, एक ऐसा शहर जो अब लगभग रोज़ होने वाली हिंसक घटनाओं के लिए जाना जाने लगा है. लगभग 15 साल से संघर्ष झेल रहे भारतीय कश्मीर में अब सूचना क्रांति ज़ोर पकड़ने लगी है. सॉफ़्टवेयर टेक्नॉलॉजी पार्क तीन साल पहले राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में स्थापित किया गया था. आउटसोर्सिंग यहाँ चार सॉफ़्टवेयर कंपनियाँ काम करती हैं जिनमें एक आउटसोर्सिंग केंद्र मैग्नम सॉफ़्टवेयर सर्विसेज़ भी है.
इनमें से एक कंपनी है बिल-क़ाज़ी इंटरप्राइज़ेज़, जो कि अमरीकी सहयोग के साथ चल रही है. इसके परियोजना निदेशक अरशद हुसैन का कहना है कि श्रीनगर ऑफ़िस सॉफ़्टवेयर बनाता है जबकि अमरीकी ऑफ़िस से उसकी मार्केटिंग होती है. उनका कहना है कि शुरुआत में सॉफ़्टवेयर लॉस एंजलिस में बनाया जाता था मगर अब ये कश्मीर में बनाया जाता है. मगर कश्मीर में काम करना इतना आसान भी नहीं है. यहाँ की कुछ मुश्किलें भी हैं. कार्तिक राजा मैग्नम सॉफ़्टवेयर सर्विसेज़ के साथ काम करते हैं और उन्हें यहाँ काम करने आने के लिए अपनी पत्नी को काफ़ी समझाना-बुझाना पड़ा था. एक रात जब वह हाउसबोट में सो रहे थे तो उनकी नींद टूटी गोलियों की आवाज़ों से. चरमपंथियों ने एक पुलिस चौकी पर हमला किया था. वैसे इसके बावजूद उन्होंने ये जगह नहीं छोड़ने का फ़ैसला किया. सुरक्षा चिंताएँ वैसे ये पार्क तीन साल पहले स्थापित किया गया था मगर कई कंपनियों को सुरक्षा एजेंसियों से अनुमति लेने में लंबा समय लग गया. सॉफ़्टवेयर पार्क के असीम ख़ान का कहना है, "मुझे उम्मीद है कि ये कॉल सेंटर या आउटसोर्सिंग केंद्र छह महीने से साल भर के भीतर ही काम करने लगेंगे." श्रीनगर में इंटरनेट सेवाएँ देने वाली कंपनियों को ब्रॉडबैंड से जुड़ने में भी लगभग ढाई साल लग गए, क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की चिंता थी कि कहीं चरमपंथी इसका फ़ायदा न उठा लें. मगर अब स्थिति में सुधार हुआ है और काम करने की अनुमति मिल रही है. कश्मीर में समस्याओं के बावजूद लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सूचना टेक्नॉलॉजी एक उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने में मददगार साबित होगा. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||