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उत्पादन ज़्यादा फिर भी क़ीमतें ऊँची | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेल निर्यातक देशों का संगठन ओपेक भले ही ये दावा कर रहा है कि उसके सदस्य देश क्षमता से अधिक उत्पादन कर रहे हैं मगर तेल की क़ीमतें 13 वर्षों के सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गई हैं. मंगलवार की रात को न्यूयॉर्क में तेल की क़ीमतें 38.98 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से बंद हुईं और ये क़ीमत 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद सबसे ऊँची क़ीमत है. इन क़ीमतों के बढ़ने का दोष अमरीका को हो रही आपूर्ति और मध्य पूर्व में हिंसा के बढ़ने पर मढ़ा जा रहा है. ओपेक ने आधिकारिक तौर पर प्रति बैरल तेल की क़ीमत 22 से 28 डॉलर रखी है मगर कई महीनों से ख़ुद उसकी क़ीमतें ही ऊँची चल रही हैं. 'बास्केट प्राइस' नाम से जानी जाने वाली ये क़ीमत 34 डॉलर के आसपास चल रही है. ओपेक ने अप्रैल महीने के शुरुआत में तेल का उत्पादन लगभग 10 लाख बैरल प्रति दिन के हिसाब से कम करके दो करोड़ 35 लाख बैरल तक कर दिया था. उस दौरान उसके 11 सदस्य देशों ने तेल की क़ीमतों से मिलने वाले राजस्व को लेकर चिंता व्यक्त की थी. मगर संगठन के अध्यक्ष पूर्नोमो युसगिआंतोरो का कहना है कि इन सबके बावजूद तेल उत्पादन कोटे से लगभग 15 लाख बैरल प्रति दिन के हिसाब से अधिक है. इस तरह जकार्ता में दिए गए उनके इस संकेत का मतलब लगाया जा रहा है कि जून तक कोटा बढ़ने की संभावना नहीं है. कई व्यापारी और अर्थशास्त्री तेल की बढ़ती क़ीमतों की वजह से चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि इससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा. तेल की क़ीमतों पर सुरक्षा चिंताओं के साथ ही भारत और चीन की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं ने काफ़ी दबाव बना रखा है. |
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