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जापान और ईरान में बड़ा समझौता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जापान ने ईरान के अज़ादेगान में तेल कुएँ की खुदाई के एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किया है. यह समझौता दो अरब डॉलर का है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने किसी देश के साथ पहली बार इतने बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किया है. इस समझौते के तहत जापान को आज़ादेगान के दक्षिणी इलाक़े में खुदाई की स्वतंत्रता होगी. अनुमान है कि इस इलाक़े से 26 अरब बैरल तेल निकाले जा सकेंगे. अमरीका ने इस समझौते पर निराशा जताई है. अमरीका की आपत्ति के कारण ही पिछले दो वर्षों से यह समझौता अधर में पड़ा हुआ था. अमरीका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रिचर्ड बाउचर ने कहा, "मैं दोनों देशों के बीच हुए इस समझौते से निराश हूँ." जापान ऊर्जा क्षेत्रों में अपनी ज़रूरत के लिए आयात पर ही निर्भर रहता है और उसके लिए यह बड़ा समझौता है. ज़रूरत लंबे समय के लिए अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही जापान आज़ादेगान तेल कुएँ की खुदाई के लिए समझौता करने के लिए काफ़ी उत्सुक था. इस समझौते के बाद जापान अपनी ज़रूरतों के लिए अब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर अपनी निर्भरता कम कर पाएगा. जहाँ से फ़िलहाल जापान के तेल आयात का क़रीब दो तिहाई हिस्सा आता है. समझौते से उत्साहित ईरान के तेल मंत्री बिजान ज़ंगानेह ने बताया, "जापान दुनिया का दूसरा बड़ा देश है जहाँ सबसे ज़्यादा तेल की खपत होती है और ईरान ओपेक देशों में दूसरा बड़ा तेल उत्पादक देश है. इसलिए हम एक सिक्के के दो पहलू हैं." पिछले साल जुलाई में जापान और ईरान के बीच यह समझौता खटाई में पड़ गया था क्योंकि अमरीका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर आपत्ति जताई थी. अमरीका ने जापान के साथ समझौते पर चल रही बातचीत पर भी ऐतराज जताया था. लेकिन ईरान के अपने परमाणु ठिकाने की जाँच कराने पर राज़ी हो जाने के बाद जापान के साथ इस समझौते पर दोबारा बातचीत शुरू हुई. |
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