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एड्स के ख़िलाफ़ अभियान में टाटा भी
विकासशील देशों में सक्रिय दुनिया की सात कंपनियों ने अफ़्रीका और अन्य देशों में एड्स के ख़िलाफ़ लाखों डॉलर की सहायता उपलब्ध कराने का वादा किया है. इसमें भारत की टाटा स्टील भी शामिल है. ये कंपनियाँ सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के ढाँचागत विकास और प्रशिक्षण कार्यक्रम को सुधारने में मदद करेंगी. ये सात कंपनियाँ हैं- एंग्लो अमेरिकन, हेंकेन, शेवरन टैक्सको, डेमलर, एस्कोम, लाफार्ज और टाटा स्टील. इनमें तेल कंपनियों से लेकर कार निर्माता कंपनियाँ शामिल हैं. अनेक विकासशील देशों में निजी क्षेत्र की कंपनियाँ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एचआईवी-एड्स के ख़िलाफ़ सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी में अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता है. ये कंपनियाँ घाना, कैनरून, नाइजीरिया, रूस और भारत में विशेष कार्यक्रम शुरू करेंगी. बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इसमें कंपनियों के भी हित छिपे हुए हैं, ऐसे क्षेत्रों में एचआईवी-एड्स के संक्रमण से उनके कर्मचारी प्रभावित होते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की एड्स संस्था ने इसका स्वागत किया है. भारतीय दवा कंपनियाँ इसके पहले बिल क्लिंटन की संस्था, विलियम जे क्लिंटन प्रेसिंडेंशियल फ़ाउंडेशन ने भी चार दवा कंपनियों से एक समझौता किया था जिसके तहत विकासशील देशों को एड्स की सस्ती दवा हासिल हो सकेगी. इस समझौते के तहत चार दवा कंपनियाँ पेंटेंट दवाइयों की वर्तमान क़ीमतों से एक तिहाई क़ीमत पर क्लिंटन फ़ाउंडेशन को दवा उपलब्ध करवाएँगी. इनमें से तीन कंपनियाँ भारत की हैं जिसमें रैनबैक्सी, सिपला और मैट्रिक्स दवा कंपनियाँ शामिल हैं. इस समझौते के तहत दवा की क़ीमत डेढ़ डॉलर यानी लगभग सत्तर रुपए से घटकर बीस रुपए हो जाएगी. |
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