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लाइट, कैमरा, एक्शन: भारत के स्टार्टअप्स के लिए गाँव बन रहे पहली पसंद, जानिए क्यों?
- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी बिज़नेस संवाददाता, मुंबई
भारत की राजधानी से सटे, हरियाणा राज्य के छोटे-छोटे गाँव इन दिनों सुर्खियों में हैं. देश के उत्तर पश्चिम के इन ग्रामीण इलाक़ों के लिए ये सुर्खियां अप्रत्याशित हैं.
यहां के औद्योगिक शहर रोहतक की बस्तियों में किसानों के घरों और आसपास की ज़मीनों की माँग अचानक बढ़ गई है. ये एकाएक फ़िल्म के सेट के रूप में बदल गए हैं.
जहां कभी गायों के रंभाने की आवाज़ आती थी, वहाँ फ़िल्म के निर्देशक को लाइट्स, कैमरा, एक्शन सुनना अब किसी के लिए असामान्य बात नहीं रही है.
एक नए स्टार्टअप स्टेज (एसटीएजीई) ने इस इलाक़े में एक उभरते हुए फ़िल्म उद्योग को जन्म दे दिया है.
स्टेज नाम की इस कंपनी संस्थापक विनय सिंघल ने बताया, “सत्ता और न्याय पर आधारित एक ड्रामा फ़िल्म ‘बट्टा’ इस इलाक़े में बनी आधा दर्जन फ़िल्मों में सबसे नई है.”
उन्होंने बताया, “हमारे आने से पहले भारत में क़रीब एक दर्जन हरियाणवी फ़िल्में बनी थीं. साल 2019 के बाद से हमने 200 से ज़्यादा फ़िल्में बना दी हैं.”
स्टेज क्षेत्रीय इलाक़ों में रहने वाले लोगों की पसंद-नापसंद, ग्रामीण संस्कृति, रहन-सहन, उनके बोलचाल की शैली आदि को ध्यान में रखकर कंटेंट बनाती है.
भारत में अलग-अलग बोलियाँ
भारत में 19,500 अलग-अलग बोलियां हैं. उनमें से स्टेज ने 18 भाषाओं और बोलियों का चुनाव किया है. ये वो भाषाएं हैं जो बड़ी आबादी द्वारा बोली जाती हैं और उनके फ़िल्म उद्योग के लिए उपयुक्त हैं.
फ़िलहाल यह कंपनी दो भाषाओं में कंटेंट बनाती है, एक है हरियाणवी और दूसरी है राजस्थानी. इसके लगभग 30 लाख सब्सक्राइबर्स हैं, जो पैसे देकर कंटेंट देखते हैं.
यही वजह है कि अब कंपनी की योजना उत्तर-पूर्व और तटीय-पश्चिम इलाक़ों में बोली जाने वाली भाषाएं जैसे मैथिली और कोंकणी में भी कंटेंट बनाने की है.
कंपनी के संस्थापक विनय सिंघल और सह-संस्थापक एक साल पहले टेलीविज़न पर प्रसारित हुए एक बिज़नेस रियलिटी शो ‘शार्क टैंक’ के भारतीय वर्ज़न में शामिल हुए थे.
इस दौरान उन्होंने बताया था कि, “इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक अमेरिकी पूंजीवादी फर्म से फंडिंग को लेकर जारी हमारी बातचीत अंतिम दौर में है."
भारत के गाँवों पर बड़ा दांव
भारतीय स्टार्टअप्स में स्टेज उनमें से है, जो ग्रामीण बाज़ार पर बड़ा दांव लगा रहा है. इस दौड़ में एग्रोस्टार और दीहाट जैसे स्टार्टअप्स भी शामिल हैं.
भारत में 140 करोड़ लोगों की आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी यहां के 6 लाख 50 हज़ार गाँवों में रहता है. मगर, अब तक वे शायद ही स्टार्टअप्स के लिए बाज़ार बन पाए हों.
एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत, नई राह बनाने का केंद्र रही है. यहाँ कई दर्जन यूनिकॉर्न्स या एक बिलियन डॉलर से ज़्यादा मूल्य वाली तकनीकी कंपनियों का जन्म हुआ है.
लेकिन ये सब शहरी भारतीयों में शीर्ष दस फ़ीसदी लोगों के लिए बनाए गए हैं.
यह कहना है आनंद डेनियल का, जो एक्सेल वेंचर्स के भागीदार हैं. इससे पहले वो फ्लिपकार्ट, स्विगी और अर्बन कंपनी जैसे सफल उद्यम में निवेश कर चुके हैं.
हालांकि, ऑनलाइन बाज़ार मीशो या कुछ कृषि तकनीक स्टार्टअप अपवाद के तौर पर हैं. मगर, देखा जाए तो, स्टार्टअप्स की दुनिया ने बड़े पैमाने पर गाँवों को अनदेखा किया है.
लेकिन, अब समय बदल रहा है. कई संस्थापकों को उनके आइडियाज़ के लिए फंडिंग मिल रही है और वो ग्रामीण उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं.
सिंघल ने बताया, “पाँच साल पहले मुझे कोई पैसा नहीं मिला था. मुझे अकेले ही शुरुआत करना पड़ी थी. लेकिन अब मुझे कोई निवेशक बाहर का दरवाज़ा नहीं दिखा सकते हैं.”
एक्सेल अब खुद ग्रामीण बाज़ार में रूचि रखने वाले उद्यमियों के लिए निवेश उपलब्ध करवा रहा है. हाल ही में एक्सेल ने घोषणा की है कि वह ग्रामीण स्टार्टअप्स में 10 लाख डॉलर तक का निवेश करेगा.
यूनिकॉर्न इंडिया वेंचर्स और एक अन्य वीसी फंड का कहना है कि उनका 50 फ़ीसदी निवेश टियर 2 और टियर 3 शहरों में मौजूद स्टार्टअप्स में है.
और इस साल जुलाई में जापान की ऑटो की दिग्गज़ कंपनी सुजुकी ने भारत के ग्रामीण बाज़ार के लिए स्टार्टअप्स बनाने के लिए 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर का फंड देने की घोषणा की है.
तो इस बदलाव के पीछे क्या कारण हैं?
डेनियल कहते हैं कि बाज़ार में ऐसे बहुत सारे अवसर हैं, जहां अब तक कोई नहीं पहुंचा है. निवेशकों और संस्थापकों को अब इस बात का भी अहसास है कि ग्रामीण का मतलब गरीब नहीं है.
एक्सेल्स के आंकड़ों के अनुसार भारत की दो-तिहाई आबादी ग्रामीण या सुदूर इलाक़ों में रहती है. और ये आबादी सालाना 5 ख़रब अमेरिकी डॉलर खर्च करती है.
और वास्तविकता यह है कि इस आबादी का शीर्ष 20 फ़ीसदी हिस्सा शहरों में रहने वालों के मुक़ाबले आधे से ज़्यादा पैसा ख़र्च करता है.
डेनियल कहते हैं, "अगर भारत की जीडीपी अगले दशक में 4 ट्रिलियन डॉलर हो जाती है, तो उसका कम से कम 5 फ़ीसदी डिजिटल रूप से प्रभावित होगा और इसका एक हिस्सा ग्रामीण भारत से आएगा."
इसकी वजह ग्रामीण परिवारों के बीच तेज़ी से बढ़ती स्मार्टफ़ोन की पहुँच है. शहरों के बाहर लगभग 45 करोड़ भारतीय स्मार्टफ़ोन का उपयोग करते हैं, जो अमेरिका की आबादी से भी ज़्यादा है.
यूपीआई के ज़रिए एक बटन से भुगतान करना उन कंपनियों के लिए एक गेम चेंजर साबित हुआ है, जो महानगरों के बाहर अपना काम करने का सोच रही हैं.
डेनियल कहते हैं, "आज से 5-7 साल पहले तक इस टार्गेट ग्रुप तक पहुँचना आसान नहीं था. फिर चाहे वो डिजिटली हो या लॉजिस्टिकली या फिर किसी तरह का भुगतान पाने की बात हो. लेकिन, अभी का समय बहुत ज़्यादा अच्छा है. खासकर उन स्टार्टअप्स के लिए जो इस बाज़ार की ओर रुख़ करना चाहते हैं."
कस्बों से निकल रहे उद्यमी
प्राइमस वेंचर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक दशक पहले तक मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में ज्यादातर नए प्रयोग हो रहे थे. लेकिन, अब नए उद्यमियों की संख्या छोटे कस्बों से उभरकर सामने आ रही है.
इसकी प्रमुख वजहों में संचालन के लिए लगने वाली कम लागत, स्थानीय प्रतिभा की सहज उपलब्धता, और सरकार की वो किशिशें हैं, जिसके तहत ग़ैर-मेट्रो सिटीज़ में उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात कही गई है.
ऐसे में संस्थापकों को ज़मीन से जुड़े होने के चलते ग़ैर-मेट्रो बाज़ार की क्षमता को बेहतर तरह से सामने लाने में फायदा मिल सकता है.
मगर, भारत के ग्रामीण इलाक़ों के तिलिस्म को तोड़ने की बात करना जितना आसान है, वो करने में उतना आसान नहीं है.
क्योंकि, छोटे शहर का उपभोक्ता क़ीमत के प्रति जागरूक है और भौगोलिक रूप से फैला हुआ है. और ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या भी शहरों की तुलना में कम है.
फ्रंटियर मार्केट के मुख्य राजस्व अधिकारी गौतम मलिक कहते हैं कि "बुनियादी ढांचा भी पिछड़ा हुआ है, ऐसे में वितरण आसान नहीं है. इसलिए काम करने में पैसे ज़्यादा लगते हैं."
फ्रंटियर मार्केट एक ग्रामीण ई-कॉमर्स स्टार्टअप है, जो 5 हज़ार से कम आबादी वाले गाँवों में अंतिम मील तक डिलीवरी करता है.
मलिक कहते हैं जो लोग शहरी सांचे में ग्रामीण संदर्भ को जबरदस्ती जमाने की कोशिश कर रहे हैं, वो विफल हो जाएंगे.
उनकी कंपनी को बहुत जल्द यह बात समझ आ गई थी कि आख़िर पारंपरिक ई-कॉमर्स कंपनियाँ अंतिम छोर तक क्यों नहीं पहुँच पा रही हैं.
दरअसल, ग्रामीण उपभोक्ता पैसों के मामले में किसी तीसरे व्यक्ति पर भरोसा नहीं करता है. लेकिन अगर उसमें स्थानीय व्यक्ति शामिल हो तो बात अलग होती है.
वह भरोसा कायम करने के लिए गौतम मलिक और उनकी टीम ने गाँव के स्तर पर वहाँ की महिला उद्यमियों को साथ जोड़ा और उनको बिक्री और वितरण के एजेंट का काम सौंपा.
वे कहते हैं कि ग्रामीण भारत के तिलिस्म को तोड़ने और इस 200 बिलियन डॉलर के बाज़ार के अवसर को भुनाने के लिए लंबे समय तक गहरी प्रतिबद्धता की ज़रूरत होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित