मल्टीपल स्क्लेरोसिस: दिमाग़ और रीढ़ की हड्डी पर वार करने वाली बीमारी की रोकथाम क्या संभव है- दुनिया जहान

फ़रवरी 2024 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक एंथनी इप्सटाइन का निधन हो गया. करीब 50 साल पहले एंथनी इप्सटाइन ने इवान बार के साथ मिल कर एक ऐसे वायरस का पता लगाया था, जिसे बाद में इप्सटाइन-बार वायरस या ईबीवी का नाम दिया गया.

कई बार इस वायरस से संक्रमित लोगों को ज़िंदगीभर पता तक नहीं चलता कि वो बीमार हैं.

इन दोनों वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाया था कि यह वायरस बहुत आम है बल्कि यह कुछ किस्म के कैंसर की बीमारी का एक कारण भी हो सकता है.

कुछ समय से यह संदेह भी था कि यह वायरस मस्तिष्क की बीमारी या न्यूरोलॉजिकल बीमारी मल्टीपल स्क्लेरोसिस का भी एक कारण हो सकता है. लेकिन दो साल पहले अमेरिकी सेना के सैनिकों और कर्मचारियों के लाखों ब्लड सैंपल के अध्ययन के बाद इस बात की पुष्टि हो गई है कि इस वायरस का मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानि एमएस (एमएस) के साथ निश्चित ही संबंध है.

इस वायरस का पता चलने के 50 साल बाद अब यह उम्मीद जगी है कि न सिर्फ मल्टीपल स्क्लेरोसिस या एमएस की बीमारी से बचा जा सकता है बल्कि दुनिया में इससे पीड़ित करीब 30 लाख लोगों का इलाज भी किया जा सकता है.

इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या जल्द ही मल्टीपल स्क्लेरोसिस की रोकथाम संभव होने जा रही है?

क्या है मल्टीपल स्क्लेरोसिस?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस या एमएस एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है. इसके कुछ लक्षणों में थकान होना, हाथ या पैरों में संवेदना कम हो जाना, चलने फिरने में मुश्किल पैदा होना या दृष्टि खो देना शामिल है. आमतौर पर स्कैनिंग के ज़रिए मष्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में घाव या किसी प्रकार के नुक़सान को देख कर शरीर में एमएस के संक्रमण का पता लगाया जाता है.

अमेरिका की नेशनल एमएस सोसाइटी के मुख्य विज्ञान अधिकारी डॉक्टर टिम कोट्ज़ी तीस साल से एमएस संबंधी शोध में शामिल हैं. वो कहते हैं कि एमएस दुनिया में किसी को भी हो सकता है. यह क्यों होता है इसका पता अभी तक नहीं लग पाया है.

कोट्ज़ी कहते हैं, ''पुरुषों की तुलना में महिलाओं में एमएस के संक्रमण की संभावना दो-तीन गुना अधिक होती है. ऐसा क्यों है यह पता लगाने के लिए अभी रिसर्च चल रही है. लेकिन निश्चित ही पुरुषों की तुलना में यह बीमारी महिलाओं में अधिक पाई जाती है.''

दूसरा सवाल उठता है कि यह बीमारी ज़्यादातर युवाओं को होती है या अधेड़ उम्र के लोगों को?

डॉक्टर टिम कोट्ज़ी ने बताया कि एमएस से संक्रमित लोगों की संख्या 18 से 45 साल आयुवर्ग में अधिक पाई गई है. हालांकि 18 से कम उम्र के लोगों में भी एमएस के मामले पाए गए हैं, मगर इस आयु वर्ग में उनकी संख्या बहुत कम है. 50 और 70 साल के लोगों में भी एमएस के संक्रमण के मामले पाए जा रहे हैं. यानि ऐसा नहीं है कि यह बीमारी 18 से 45 साल के बीच की आयु के लोगों को ही होती है.

एमएस एक ऑटो इम्यून बीमारी है. हमारे शरीर के प्रतिरक्षातंत्र या इम्यून सिस्टम का काम बाहरी वायरस या बाहरी ख़तरे से लड़ना है, मगर इसके मरीज़ का प्रतिरक्षातंत्र ग़लती से अपने शरीर को ही बाहरी ख़तरा समझ कर उसपर हमला कर देता है. ऑटो इम्यून बीमारियों में स्क्लेरोसिस, अस्थमा, टाइप 1-डायबिटीज़, रोमोटोइड आर्थराइटिस भी शामिल हैं.

एमएस इन सबमें सबसे ख़तरनाक बीमारी है, क्योंकि यह हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों पर हमला करती है. टिम कोट्ज़ी कहते हैं कि यह मस्तिष्क यानि ब्रेन और स्पाइन या रीढ़ की हड्डी की बीमारी है. यह अंग शरीर के चलने-फिरने, दिमाग के काम करने से लेकर हमारी पूरी ज़िंदगी को नियंत्रित करते हैं.

मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीज़ का इम्यून सिस्टम ब्रेन और रीढ़ की हड्डी को निशाना बनाता है. दरअसल वो ब्रेन और रीढ़ की हड्डी के भीतर कोशिकाओं या नर्व्स को सुरक्षित रखने वाली परत को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है.

डॉक्टर टिम कोट्ज़ी ने कहा, ''इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा ब्रेन और स्पाइन जिन नर्व्स से बना है, उनके ऊपर एक इन्सूलेशन कवर होता है जो इन नर्व्स को सुरक्षित रखता है. इन नर्व्स के ज़रिए ही हमारे पूरे शरीर में सिग्नल भेजे जाते हैं. इसकी वजह से हम चल फिर सकते हैं, देख सकते हैं और दूसरे कई काम कर सकते हैं. एमएस के मरीज़ का इम्यून सिस्टम नर्व्स के इन्सूलेशन को नष्ट कर के शॉर्ट सर्किट कर देता है और शरीर के अन्य अंगों तक सिग्नल नहीं पहुंच पाते.''

जिस शॉर्ट सर्किट की बात टिम कोट्ज़ी कर रहे हैं उसी की वजह से एमएस के लक्षण सामने आते हैं यानि मरीज़ को हिलने डुलने, संतुलन रखने में या देखने में दिक्कत आने लगती है. यह हमले कई बार धीमी गति से होते हैं या चरणों में होते हैं. कई बार तो शरीर इम्यून सिस्टम के हमलों से उबर जाता है लेकिन बढ़ती उम्र के साथ शरीर के लिए इन हमलों से उबरना मुश्किल होता जाता है और मरीज़ की स्थिति तेज़ी से बिगड़ती जाती है. तो अब तक वैज्ञानिक एमएस से कैसे निपटते रहे हैं?

बीमारी के कारण नहीं बल्कि लक्षणों पर निशाना

1970 के दशक के दौरान एमएस के इलाज के लिए स्टेरॉइड का इस्तेमाल किया जाने लगा था. स्टेरॉइड, दरअसल कृत्रिम या सिंथेटिक हार्मोन होते हैं, जो बीमारी से बचा तो नहीं सकते लेकिन उसके प्रभाव को कम करने में मदद ज़रूर करते हैं.

जर्मनी के ड्रेसडेन शहर में कार्ल गुस्ताफ़ यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजिस्ट चैफ़ ज़िमरसन कहते हैं कि यह स्टेरॉइड एंटी इनफ़्लेमेटरी यानी सूजन कम करने वाली दवाइयां हैं.

वो कहते हैं, ''जब बीमारी गंभीर होने लगती थी तो सबसे पहले सूजन कम करने के लिए इन एंटी इनफ़्लेमेटरी स्टेरॉइड का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन इससे इलाज में लंबे समय के दौरान ख़ास फ़ायदा नहीं दिखा था.''

यानि एमएस के लक्षणों पर काबू पाने की कोशिश तो की गयी लेकिन इस बीमारी के कारणों की रोकथाम में कामयाबी नहीं मिल रही थी. मगर 1993 में इस दिशा में बड़ा बदलाव आया जब इंटरफ़ेरोन बीटा नाम की दवाई को अमेरिका में मंज़ूरी मिल गयी. यह एक इम्यूनोसप्रेसंट दवाई है जो इम्यून सिस्टम को शरीर के अंगों पर हमला करने से रोकती है ताकि वो शरीर के नर्वस सिस्टम पर हमला करके उसे नुकसान ना पहुंचाए. बाद मे ऐसी ही एक और दवाई का इस्तेमाल होने लगा जिसका नाम था ग्लैटीरैमा एसिटेट.

चैफ़ ज़िमरसन ने कहा कि, ''यह दोनों ही एंटी इनफ़्लेमेटरी दवाइयां हैं जिनका इस्तेमाल बीस सालों से हो रहा है. बीमारी को नियंत्रित करने में दोनो का प्रभाव एक जैसा है. हम कह सकते हैं कि यह लगभग तीस प्रतिशत तक प्रभावी हैं.''

हमारे शरीर की व्हाइट सेल या श्वेत रक्त कोशिकाएं बाहरी वायरस से या ख़तरों से शरीर की रक्षा करती हैं और जब इम्यून सिस्टम ग़लती से शरीर को ही ख़तरा समझ लेता है तो यह व्हाइट सेल उस पर हमला कर देती हैं. यह कोशिकाएं शरीर में मौजूद लिंफ़ नोड यानि लसिकापर्व से निकलती हैं. बाद में ऐसी दवाइयों का इस्तेमाल शुरू हुआ जो व्हाइट सेल को लिंफ़ नोड से निकलने से ही रोक देती हैं ताकि वो नर्वस सिस्टम को चोट ना पहुंचाएं.

चैफ़ ज़िमरसन ने बताया कि एस वन पी (S1P) एक ऐसा सबस्टंस होता है जो लिंफ़ नोड के दरवाज़े पर होता है जो व्हाइट सेल को बाहर निकलने देता है. इस सबस्टंस को ब्लॉक कर देने से व्हाइट सेल बाहर नहीं निकल पाती हैं और ब्रेन को नुकसान नहीं पहुंचा पाती.

लेकिन अगर व्हाइट सेल बाहर ही नहीं आ पाएंगी तो वो शरीर में घुसने वाले बाहरी वायरस से लड़ भी नहीं पाएंगी. यानि एक बीमारी के इलाज के लिए दूसरी बीमारियों का ख़तरा उठाना पड़ेगा.

चैफ़ ज़िमरसन इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि अगर एमएस संक्रमण का पता जल्द लगा लिया जाए तो उसे नियंत्रित करके मरीज़ की स्थिति को स्थिर रखने में मदद मिलती है.

वो कहते हैं कि इस बात की गारंटी तो नहीं है कि इलाज कामयाब होगा लेकिन मल्टीपल स्क्लेरोसिस से शरीर को हुए नुकसान को सीमित ज़रूर किया जा सकता है.

मायलिन की मरम्मत

अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेफ़री होयंग मल्टीपल स्क्लेरोसिस से नर्व्स के इंसुलेशन को होने वाले नुक़सान पर शोध कर रहे हैं. नर्व्स या तंत्रिकाओं को सुरक्षित रखने के लिए उनके इर्द-गिर्द चर्बी युक्त पदार्थ की एक परत होती है. इसे मायलिन कहते हैं.

प्रोफ़ेसर होयंग यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि एमएस के कारण क्षतिग्रस्त हो चुके मायलिन की कृत्रिम तरीके से मरम्मत कैसे की जा सकती है.

वो कहते हैं, ''मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि मस्तिष्क किसी चोट के बाद चोटिल हिस्से की मरम्मत कैसे करता है? इसके पीछे जीव विज्ञान के कौन से सिद्धांत हैं. अगर हम यह समझ पाएं तो ऐसी दवाइयां बना पाएंगे जो क्षतिग्रस्त मायलिन को ठीक कर सकेंगी.''

मायलिन पर होने वाले हमले को डीमायलीनेशन कहा जाता है. यानि नर्व्स के इर्द-गिर्द लिपटी चर्बीदार मायोलिन कि परत क्षतिग्रस्त हो जाती है.

जेफ़री होयंग ने बताया कि हमारे ब्रेन में जब किसी प्रकार की चोट की वजह से डीमायलीनेशन होता है तो ब्रेन उसे ठीक कर करके रीमायलीनेशन करता है. लेकिन जो मरीज़ 15-20 साल से एमएस से संक्रमित होते हैं, उनके शरीर में रीमायलीनेलशन की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है या ठीक से नहीं हो पाती जिसकी वजह से मरीज़ की स्थिति बिगड़ती जाती है.

जेफ़री होयंग का मानना है कि जिस प्रकार बढ़ती उम्र के साथ शरीर की किसी चोट से उबरने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है, उसी प्रकार रीमायलीनेशन की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है. एमएस का प्रभाव भी बढ़ती उम्र के साथ तीव्र होने लगता है. 70-80 साल की उम्र के मरीज़ों की दिक्कत बढ़ जाती है. मगर कई बार 30-40 साल बाद भी रीमायलीनेशन की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है. ब्रेन में चोट को ठीक करने का काम शरीर के अन्य अंगों की तुलना में ज़्यादा मुश्किल होता है.

जेफ़री होयंग की रिसर्च का मक़सद ऐसी दवा बनाने में मदद करना है, जो रीमायलीनेशन की समस्या का हल निकाल सके. मगर हम ऐसी दवा बनाने के कितना करीब हैं?

इसके जवाब में जेफ़री होयंग ने कहा, ''हम कामयाबी के काफ़ी करीब हैं. ऐसी कई दवाइयों का ट्रायल चल रहा है जो मल्टीपल स्क्लेरोसिस से क्षतिग्रस्त हो चुकी नर्व्स पर रीमायलीनेशन कर पाएंगी. मुझे लगता है कि बहुत जल्द ऐसी दवा तैयार हो जाएगी जो एमएस से होने वाले नुकसान का इलाज कर पाएगी. इस रिसर्च का फ़ायदा यह होगा कि इससे स्ट्रोक, ब्रेन इंजुरी और अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी के इलाज के लिए दवा बनाने में भी मदद मिल सकती है.''

यानि वैज्ञानिक शरीर के काम करने की क्षमता को ठप्प करने वाली कई बीमारियों के इलाज पर शोध कर रहे हैं. उनका उद्देश्य ना सिर्फ़ मल्टीपल स्क्लेरोसिस का इलाज ढूंढना है, बल्कि इस बीमारी को पूरी तरह ख़त्म करना है.

किसिंग वायरस क्या है?

जनवरी 2022 में अमेरिकी वैज्ञानकों ने एक बड़ी खोज की. अमेरिकी सैनिकों और कर्मचारियों के एक करोड़ ब्लड सैंपल के अध्ययन के बाद उन्होंने पाया कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस और एक आम किस्म की हरपीस के बीच निश्चित ही कोई संबंध है. इस प्रकार के हरपीस से ग्लैंड्यूलर फ़ीवर होता है जिसे 'किसिंग डिसीज़' भी कहते हैं.

यूके की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी में वायरोलॉजी की प्रोफ़ेसर डॉक्टर क्लेयर शैनन लोव इपस्टाइन-बार वायरस या इबीवी (EBV) की मल्टीपल स्क्लेरोसिस और कैंसर की बीमारी में भूमिका पर रिसर्च कर रही हैं. वो कहती हैं कि यह वायरस कई बार बचपन में ही बच्चों के शरीर में घुस जाता है. यह आम किस्म का वायरस है और इससे बच्चों में ग्लैंड्यूलर फ़ीवर या बुख़ार के लक्षण उभर आते हैं.

''कुछ दशकों पहले संदेह हुआ था कि ईबीवी (EBV) वायरस का संबंध मल्टीपल स्क्लेरोसिस से हो सकता है. यह काफ़ी आम वायरस है और दुनिया के 95 फीसदी आबादी में इसका संक्रमण है. यह बात भी सामने आई कि जिन लोगों को एमएस बीमारी है, उनमें ईबीवी मौजूद था. जिन्हें एमएस बीमारी नहीं है, उनमें ईबीवी का संक्रमण भी नहीं पाया गया.''

इन आंकड़ों के अनुसार जिन पांच फीसद लोगों में ईबीवी का संक्रमण नहीं होता, उन्हें एमएस भी नहीं होता मगर क्लेयर शैनन लोव भी मानती हैं कि इससे कुछ ठोस पता नहीं चलता.

''ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि ईबीवी से निश्चित तौर पर एमएस की बीमारी होती है. मगर स्थितियों के आकलन से यह संकेत मिलता है कि ईबीवी के संक्रमण से एमएस होने का ख़तरा बढ़ जाता है.''

ईबीवी और मल्टीपल स्क्लेरोसिस के बीच कोई संबंध तो है मगर वो क्या है, यह बताना विज्ञान का काम है. इस दिशा में कुछ प्रगति भी हुई है. दरअसल होता यह है कि ईबी वायरस से एक प्रोटीन निकलता है जिसकी मदद से वो हमारे शरीर में रह सकता है.

हमारा इम्यून सिस्टम उस प्रोटीन पर हमला करके वायरस को रोकने की कोशिश करता है. लेकिन चंद लोगों के भीतर इम्यून सिस्टम मायलिन और इस वायरस के प्रोटीन में फ़र्क नहीं समझ पाता और मायलिन पर हमला कर देता है, जो हमारे शरीर की नर्व्स की सुरक्षा के लिए ज़रूरी होता है.

इसका एक उपाय यह है कि ऐसी वैक्सीन बनाई जाए जो हमारी इम्यून सिस्टम को मायोलिन और ईबी वायरस के बीच फ़र्क करना सिखाए.

क्लेयर शैनन लोव ने कहा, ''यह वायरस बहुत पेचीदा है और सदियों से हमारे भीतर रहते हुए बदलता गया है. यह हमारे इम्यून सिस्टम से आसानी से बच जाता है और अपने प्रोटीन को भी छिपा लेता है. तो सही प्रोटीन का पता लगा कर वायरस को रोकने वाली वैक्सीन से इस समस्या का हल निकल सकता है. मगर इस वैक्सीन को तैयार करने में कम से कम दस साल और लगेंगे.''

तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या जल्द ही मल्टीपल स्क्लेरोसिस की रोकथाम संभव होने जा रही है? पिछले 30 सालों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के इलाज में आये बदलाव से एमएस के मरीज़ों की स्थिति में सुधार आया है. लेकिन एमएस की पूरी तरह रोकथाम के लिए इपस्टाइन-बार वायरस या ईबीवी को रोकने वाली वैक्सीन से काफ़ी मदद मिल सकती है. इससे एमएस ही नहीं बल्कि कैंसर समेत कई अन्य बीमारियों की रोकथाम में भी मदद मिलेगी. इस दिशा में शोध जारी है.

अब शरीर में एमएस का पता लगाने के तरीके पहले से कहीं बेहतर हो गए हैं. इस साल फ़रवरी में पचास साल पहले ईबीवी का पता लगाने वाले वैज्ञानिक एंथनी इप्सटाइन की मृत्यु हो गई, लेकिन उनके शोध ने वैज्ञानिकों के सामने एमएस की रोकथाम के रास्ते खोल दिए हैं.

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