यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड पर पीएम मोदी का मुसलमानों को संदेश, विपक्ष क्या कह रहा

साल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता का मुद्दा छेड़ दिया है.

प्रधानमंत्री ने देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) की वकालत करते हुए कहा कि 'एक ही परिवार में दो लोगों के अलग-अलग नियम नहीं हो सकते. ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा?'

उन्होंने सवाल किया कि अगर ट्रिपल तलाक़ इस्लाम में इतना ही अपरिहार्य होता तो इंडोनेशिया, क़तर, जॉर्डन, सीरिया, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों में इसकी अनुमति क्यों नहीं होती.

मध्य प्रदेश में बीजेपी के ‘मेरा बूथ,सबसे मज़बूत' अभियान के तहत मंगलवार को पीएम मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया.

पीएम मोदी ने कहा, "यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के नाम पर ऐसे लोगों को भड़काने का काम हो रहा है. आप मुझे बताइए, एक घर में परिवार के एक सदस्य के लिए एक क़ानून हो. परिवार के दूसरे सदस्य के लिए दूसरा क़ानून हो तो क्या वो घर चल पाएगा क्या? कभी भी चल पाएगा क्या? फिर ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा.’’

'वोट के भूखे यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड में अड़ंगे लगा रहे हैं'

उन्होंने कहा, "हमें याद रखना है कि भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकार की बात की गई है. ये लोग हम पर आरोप लगाते हैं. लेकिन सच ये है कि यही लोग मुसलमान-मुसलमान करते हैं. अगर ये मुसलमानों के सही मायने में हितैषी होते तो अधिकांश परिवार और मेरे मुस्लिम भाई-बहन शिक्षा में पीछे नहीं रहते. रोज़गार में पीछे नहीं रहते. मुसीबत की ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर नहीं रहते."

पीएम मोदी ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है. सुप्रीम कोर्ट डंडा मारती है. कहती है कॉमन सिविल कोड लाओ. लेकिन ये वोट बैंक के भूखे लोग इसमें अड़ंगा लगा रहे हैं. लेकिन भाजपा सबका साथ, सबका विकास की भावना से काम कर रही है.’’

प्रधानमंत्री ने कहा, "जो 'ट्रिपल तलाक़' की वकालत करते हैं, वे वोट बैंक के भूखे हैं और मुस्लिम बेटियों के साथ घोर अन्याय कर रहे हैं. 'ट्रिपल तलाक़' न सिर्फ़ महिलाओं की चिंता का विषय है, बल्कि यह समूचे परिवार को नष्ट कर देता है.’’

उन्होंने कहा, "जब किसी महिला को, जिसका निकाह बहुत उम्मीदों के साथ किसी शख्स से किया गया था, 'ट्रिपल तलाक़' देकर वापस भेज दिया जाता है.''

"कुछ लोग मुस्लिम बेटियों के सिर पर 'ट्रिपल तलाक़' का फंदा लटकाए रखना चाहते हैं, ताकि उन्हें उनका शोषण करते रहने की आज़ादी मिल सके."

विपक्षी दलों का विरोध, मोदी पर साधा निशाना

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर पीएम नरेंद्र मोदी के बयान के बाद इसे लेकर बहस शुरू हो गई है.

कांग्रेस, एआईएमआईएम, जेडीयू, डीएमके जैसी पार्टियों ने प्रधानमंत्री मोदी पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है.

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री ग़रीबी, महंगाई, बेरोज़गारी और मणिपुर हिंसा जैसी चीज़ों पर जवाब नहीं देते हैं. उनका बयान इन मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है.

एआईएमआईएम के नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पीएम के बयान पर पलटवार किया है.

ओवैसी ने ट्वीट कर कहा, ''नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक़, यूनिफॉर्म सिविल कोड और पसमांदा मुसलमानों पर कुछ टिप्पणी की है. लगता है मोदी जी ओबामा की नसीहत को ठीक से समझ नहीं पाए.''

उन्होंने आगे कहा, ''मोदी जी ये बताइए कि क्या आप ''हिन्दू अविभाजित परिवार" (HUF) को ख़त्म करेंगे? इसकी वजह से देश को हर साल 3 हजार 64 करोड़ रुपये का नुक़सान हो रहा है."

मोदी जी बेचैन हो रहे हैं - आरजेडी

आरजेडी के सांसद मनोज झा ने पीएम मोदी के इस बयान प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "पीएम मोदी आजकल थोड़ा बेचैन हो रहे हैं. उन्हें यूनिफॉर्म सिविल कोड को गंभीरता से पढ़ना चाहिए. ये बेहद ज़रूरी है कि पीएम को यूनिफॉर्म सिविल कोड पर 21वें विधि आयोग की रिपोर्ट पढ़नी चाहिए. उन्हें संविधान सभा की बहस भी पढ़नी चाहिए.’’

वहीं, कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने पीएम के बयान पर कहा, ''प्रधानमंत्री खुद वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं. अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करना था तो 9 साल से उनकी सरकार है, पहले ही कर सकते थे. जैसे ही चुनाव आता है उन्हें ये सब चीज़ें याद आ जाती हैं.''

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर कांग्रेस नेता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य आरिफ़ मसूद ने कहा, ''देश बाबा साहब के बनाए संविधान पर भरोसा करता है, देश उसमें कोई बदलाव नहीं होने देगा.''

जेडीयू नेता केसी त्यागी ने बीजेपी पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया. त्यागी ने कहा, ''यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे पर सभी पार्टियों और स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा होनी चाहिए.''

क्या है समान नागरिक संहिता

शादी, तलाक़, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में भारत में विभिन्न समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग क़ानून हैं.

हालांकि, देश की आज़ादी के बाद से समान नागरिक संहिता या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की मांग चलती रही है.

इसके तहत इकलौता क़ानून होगा जिसमें किसी धर्म, लिंग और लैंगिक झुकाव की परवाह नहीं की जाएगी.

विधि आयोग ने भी इसी महीने की शुरुआत में राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मुद्दे पर सार्वजनिक और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों समेत सभी पक्षों से से सुझाव मांगकर समान नागरिक संहिता पर परामर्श की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

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