इच्छाशक्ति को मज़बूत बनाने का क्या है तरीक़ा

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एल्विया (बदला हुआ नाम) ने बहुत छोटी उम्र से टेनिस खेलना शुरू किया था. लगातार अच्छी टेनिस खेलते हुए राज्य स्तर पर वे कई प्रतियोगिताएं जीतीं.

राष्ट्रीय स्तर पर उनकी रैंक भी अच्छी आ गई, पर न जाने क्या हुआ कि टूर्नामेंट जीतने की उनकी ताक़त ही गुम हो गई और वे सेमीफ़ाइनल या फ़ाइनल में हारने लगीं.

शुरू शुरू में तो उनके पेरेंट्स और कोच को लगा कि कोई तकनीकी खामी कि वजह से ऐसा हो रहा है, पर जब हर तरह से देखा गया और सीनियर स्तर के कोच से भी सलाह ली गई तो उन्होंने किसी मनोवैज्ञानिक से उनकी काउंसलिंग कराने की सलाह दी.

लखनऊ की रहने वाली एल्विया (बदला हुआ नाम) के माता-पिता ने पहले तो लखनऊ में ही उन्हें दिखाया और फिर दिल्ली ले आए.

शुरू में महीने में दो बार और फिर एक महीने छोड़ कर उनकी काउंसलिंग की गई तो एल्विया (बदला हुआ नाम) ने एक बार फिर टूर्नामेंट जीतना शुरू कर दिया. अब उनकी नेशनल रैंकिंग टॉप-40 में है.

उनकी काउंसलिंग करने वाले परामर्श मनोवैज्ञानिक अरविंद मौर्य ने बीबीसी सहयोगी अंजिल दास को बताया, "हम इस तरह लोगों को मोटिवेट करते हैं कि वो अपने नज़रिए में थोड़ा बदलाव ला सकें. साइकोथेरेपिस्ट के तौर पर काम करते हुए हम उनके सोच-विचार पर ज़्यादा काम करते हैं. ताकि उनके नज़रिए में थोड़ा बदलाव आ सके."

पश्चिम दिल्ली साइकेट्री सेंटर में परामर्श मनोवैज्ञानिक अरविंद कहते हैं, "हमने एल्विया (बदला हुआ नाम) से बात की. चूंकि उसकी उम्र छोटी है तो हमें उसका ख़्याल भी रखना था. काउंसलिंग से एक खिलाड़ी के रूप में उनके स्टेट ऑफ़ माइंड में बदलाव आया और फिर जीतते जीतते हारने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई."

फ़ौलादी इच्छाशक्ति

इच्छाशक्ति

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संभव है कि आपने स्विटज़रलैंड के 38 वर्षीय टेनिस स्टार स्टेन वावरिंका के हाथों पर एक टैटू देखा हो.

तीन बार के ग्रैंडस्लैम विजेता रहे वावरिंका के हाथों पर इस टैटू में लिखा है, "इवेन ट्राइड. इवेन फ़ेल्ड. नो मैटर ट्राइ अगेन. फ़ेल अगेन. फ़ेल बेटर." यानी "चाहे कोशिश की हो? चाहे नाकाम हुए हों? कोई बात नहीं. फ़िर कोशिश करें. फ़िर नाकाम हों. पर पहले से बेहतर नाकाम हों."

38 साल के वावरिंका कई असफलताओं के बाद आख़िरकार एक नहीं तीन बार टेनिस के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंडस्लैम टूर्नामेंट जीतने में सफल हुए.

वावरिंका की इस सफलता के पीछे जो एक चीज़ काम कर रही थी वो है उनकी 'दृढ़ इच्छाशक्ति.'

ये वो सबसे 'मज़बूत हथियार' है जिसकी बदौलत खेल की दुनिया समेत अन्य सभी क्षेत्रों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं, जहाँ असफल होने के बाद लोग वापस ऊंचाई पर पहुंचते देखे गए हैं.

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मैं वर्षों तक इसलिए जीतती रही क्योंकि मेरे अंदर इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास है.
कोनेरू हम्पी
शतरंज की ग्रैंड मास्टर

ठीक इसी तरह शतरंज की ग्रैंड मास्टर कोनेरू हम्पी ने भी बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द इयर अवॉर्ड जीतने के बाद कहा था, "मैं वर्षों तक इसलिए जीतती रही क्योंकि मेरे अंदर इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास है."

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन का लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड पाने के बाद एथलीट अंजू बॉबी जॉर्ज ने बताया था कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया और उससे बाहर भी निकलीं तो उसकी वजह कड़ी मेहनत और लगन थी. अंजू बॉबी जॉर्ज ने भी तब कहा था "सही प्रेरणा और इच्छाशक्ति से सब कुछ संभव है."

आत्मसंयम की आज़माइश

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कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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हम कभी न कभी कुछ ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं, जो ऐसे आती हैं कि जैसे हमारे आत्मसंयम की आज़माइश कर रही हों.

मान लीजिए कि आप डाइट कंट्रोल पर हों ताकि अपने वजन को नियंत्रित रख सकें. ऐसे में आपकी सबसे प्रिय चीज़ (जो मीठी भी है) खाने के लिए सामने रखी जाए. वो चीज़ आपके कान में फ़ुसफ़ुसाएगी कि चलो एक बार के लिए खा लो. लेकिन आप उसे देखने के बाद भी ख़ुद पर काबू पा लेंगे और नहीं खाएंगे.

यह तभी होगा जब आपके अंदर की इच्छाशक्ति आपको ऐसा करने की मजबूती देगी. इच्छाशक्ति ऐसे प्रलोभन से बचाते हुए अपने लक्ष्य पर टिके रहने की मजबूती देती है.

हर ऐसे मौक़े पर आपकी इच्छाशक्ति आपके अंदर पनपने वाले अनचाहे विचारों, भावनाओं और आवेग को नियंत्रित करने की आपको क्षमता देती है जिससे आप ख़ुद पर संयम पाते हैं, किसी काम को करने की टालमटोल बंद करते हैं और अपने लक्ष्य पर आपका फ़ोकस बनता है.

परामर्श मनोवैज्ञानिक अरविंद मौर्य कहते हैं कि हर एक पेशेंट की अलग मनोस्थिति होती है. वे कहते हैं, "ऐसे में हम जब किसी से बात करते हैं तो उनसे कंसिस्टेंसी बनाए रखने पर फ़ोकस करते हैं. कॉन्सेंट्रेशन पर भी ज़ोर देते हैं और इसका सकारात्मक असर देखने को मिलता है."

अधिक इच्छाशक्ति का होना

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यह इच्छाशक्ति कुछ लोगों में अन्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक होता है. उदाहरण के लिए- कुछ लोग दिन भर कड़ी मेहनत के बाद भी जिम में इसलिए वर्कआउट करते हैं कि उन्हें फ़िटनेस का लक्ष्य जो पूरा करना है, वहीं आपका ध्यान फ़िटनेस पर न हो कर जंक फ़ूड के साथ टीवी के सामने समय बिताने में गुज़रता है.

कई लोगों का मानना है कि अगर उनके पास इच्छाशक्ति नाम की रहस्यमयी ताक़त है तो वो अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं.

ख़ुद पर और अधिक नियंत्रण हमें सही खाना खाने, रोज़ कसरत करने, नशीली चीज़ें खाने और शराब पीने से बचने, अपने रिटायरमेंट के लिए बचत करने और काम को टालने की प्रवृति को बंद करने से लेकर हर छोटे बड़े लक्ष्य को पाने में हमारी भरपूर मदद करता है.

'अहम में कमी'

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हाल के समय तक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत यह मानता था कि इच्छाशक्ति एक बैटरी के जैसी होती है. इसकी शुरुआत तो पूरी ताक़त के साथ होती है लेकिन आप विचारों, भावनाओं और व्यवहार पर नियंत्रित करने में ही उस बैटरी की ऊर्जा ख़त्म कर देते हैं.

बैटरी की तरह रिचार्ज़ करने के लिए अगर आपको आराम न मिले तो आपकी इच्छाशक्ति भी ख़तरनाक रूप से क्षीण पड़ जाती है और इससे धैर्य बनाए रखना और सामने आने वाले आसान प्रलोभनों से बचना मुश्किल हो जाता है.

फ्रॉयडवादी मनोविश्लेषण में इसे 'अहम में कमी' के संदर्भ में जाना जाता है.

जिन लोगों में आत्मबल अधिक होता है, हो सकता है कि शुरुआती दौर में उनमें इच्छाशक्ति अधिक हो लेकिन दबाव में आने पर वो कमज़ोर पड़ जाते हैं.

इच्छाशक्ति का मानसिकता से संबंध

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इच्छाशक्ति और उसे बनाए रखने की एकाग्रता किसी शख़्स की अपनी मानसिकता पर निर्भर करता है.

2010 में, हालांकि मनोवैज्ञानिक वेरोनिका जॉब ने अपनी शोध का नतीजा प्रकाशित कराया जिसमें कुछ दिलचस्प सबूतों के साथ इस सिद्धांत पर सवाल उठाया गया कि इच्छाशक्ति में कमी आना लोगों को मूलभूत मान्यताओं पर निर्भर करता है.

नए शोध में ये बताया गया है कि कामयाबी पाने के लिए दमदार इच्छाशक्ति के साथ ही बनाई गई रणनीतियां भी अहम है जो हमें मंज़िल की ओर आगे ले जाती हैं.

जॉब ने पाया कि सीमित मानसिकता वाले लोग ठीक 'अहम की कमी' वाले सिद्धांत की तरह काम करते हैं. एक काम के बाद उन्हें के लिए बहुत अधिक एकाग्रता चाहिए होता था. जैसे कि किसी उबाऊ कंटेंट को एडिट करना. लेकिन उन लोगों में इस सिद्धांत के लक्षण देखने को नहीं मिले जो असीमित नज़रिया रखते थे. उनकी मानसिक एकाग्रता में कोई कमी नहीं दिखी.

अमेरिकी छात्रों से इस मामले में भारतीय छात्र आगे

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वेरोनिका जॉब ने इस नतीजे की अन्य संदर्भों में भी जांच की. उदाहरण के लिए, नारायणा टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी, सिंगापुर में कृष्णा सावनी के साथ काम करते हुए उन्होंने पाया कि इच्छाशक्ति की धारणा एक से दूसरे देश में अलग-अलग होती है. उन्होंने दिखाया कि अमेरिकी छात्रों की तुलना में असीमित मानसिकता वाले भारतीय छात्र बहुत हैं.

जॉब ने यह भी दिखाया कि लोगों की इच्छाशक्ति की मानसिकता वास्तविक जीवन के नतीज़ों से जुड़ा है.

जॉब ने अपने शोध में यूनिवर्सिटी के छात्रों को दो लगातार नहीं होने वाले साप्ताहिक कक्षाओं के दौरान उनकी एक्टिविटी पूरा करने को कहा.

इसमें असीमित इच्छाशक्ति और कम इच्छाशक्ति वाले छात्रों पर अध्ययन किया.

एक्टिविटी के अगले दिन अधिक काम होने के बावजूद असीमित इच्छाशक्ति वाले छात्रों की काम करने की क्षमता बढ़ती दिखी.

जॉब का शोध यह भी बताता है कि आज के दौर के विज्ञान के बारे में मौजूदा किताबों के ज़रिए सीखना- कम से कम कुछ समय के लिए ही सही पर लोगों की मान्यताओं को बदल सकता है.

ARVIND MAURYA
कई पेशेंट के साथ तो ऐसी बॉन्डिंग हो जाती है कि वो लंबे समय तक हमारे संपर्क में रहते हैं. अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत आज उनमें से अधिकतर अपने अपने क्षेत्र में तरक्की कर रहे हैं.
अरविंद मौर्य
परामर्श मनोवैज्ञानिक

हाल ही में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेंसिल्वेनिया के शोधकर्ताओं ने प्री-स्कूल के बच्चों को यह सिखाने के लिए एक स्टोरीबुक तैयार की है कि इच्छाशक्ति का प्रयोग थकावट की जगह स्फ़ूर्तिदायक हो सकता है और इसका जितना अधिक हम अभ्यास करेंगे हमारा आत्मबल उतना ही बढ़ेगा.

आप भी अपने आत्मबल से जुड़े छोटे टेस्ट से शुरू कर सकते हैं. इससे आपके जीवन में आपकी इच्छानुसार बदलाव आएंगे. जैसे कि सोशल मीडिया से कुछ हफ़्तों की दूरी बनाना या फिर किसी चिड़चिड़े परिजन के साथ अधिक से अधिक संयम दिखाना. आपने अगर यह दृढ़ता बनाए रखी तो यकीन मानिए आपकी वर्तमान इच्छाशक्ति और अधिक बढ़ सकती है.

परामर्श मनोवैज्ञानिक अरविंद कहते हैं, "कई पेशेंट के साथ तो ऐसी बॉन्डिंग हो जाती है और वो लंबे समय तक हमारे संपर्क में रहते हैं. अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत आज उनमें से अधिकतर अपने अपने क्षेत्र में तरक्की कर रहे हैं."

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