जस्टिन ट्रूडो की मुश्किलें और बढ़ीं, उनकी सरकार का टिक पाना क्यों हुआ मुश्किल?

विदेशी मोर्चे पर एक के बाद एक संकट से जूझते कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के लिए अब घरेलू राजनीति में भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

उनकी अल्पमत सरकार को समर्थन देने वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) ने सरकार का आगे साथ देने से इनकार कर दिया है.

एनडीपी के नेता जगमीत सिंह ने कहा है कि नए साल में वो प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे.

मध्यमार्गी वाम पार्टी एनडीपी अपने साझे राजनीतिक एजेंडे के बदले ट्रूडो की अल्पमत सरकार को समर्थन देती आई है और उसके नेता के ताज़ा बयान से पार्टी के रुख़ में बदलाव का संकेत मिलता है.

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पहले ही चौतरफ़ा मुश्किलों में घिरे जस्टिन ट्रूडो की मुसीबत के और बढ़ने के आसार हैं.

ट्रूडो पर निशाना साधने वाली तीन पार्टियों में जगमीत सिंह की पार्टी नई है. इसका मतलब है कि अविश्वास प्रस्ताव में ट्रूडो सरकार का बचना मुश्किल है.

क्योंकि एनडीपी ने बीते ढाई साल से ट्रूडो सरकार को समर्थन दिया हुआ था. इस कारण ट्रूडो सत्ता में बने हुए थे.

जगमीत सिंह का एलान ऐसे समय आया है जब ट्रूडो के लिए यह सप्ताह पहले ही बहुत बुरा साबित हुआ है.

बीते सोमवार को उनकी कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ मंत्री के इस्तीफ़ा देने के बाद उनकी ख़ुद की लिबरल पार्टी में ही इस्तीफ़े की मांग बढ़ने लगी है.

उधर अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एलान ने पहले ही ट्रूडो की मुश्किलों को बढ़ा दिया है.

जगमीत सिंह ने क्या कहा?

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर जगमीत सिंह ने लिखा, "लिबरल दूसरा मौक़ा दिए जाने के लायक नहीं हैं." साथ ही उन्होंने हाउस ऑफ़ कॉमन्स के अगले सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कही है.

हालांकि बीते सितम्बर में ही उन्होंने समर्थन वापस लेने की बात कही थी.

भारतीय मूल के जगमीत सिंह की पार्टी ने बीते आम चुनावों में 24 सीटें जीती थीं और वो किंगमेकर की भूमिका में थे. जगमीत सिंह भारत की कई मौक़ों पर आलोचना करते रहे हैं.

टोरंटो में बीबीसी संवाददाता नदीन यूसुफ़ के अनुसार, कनाडा का अगला आम चुनाव अगले साल अक्तूबर में या उससे पहले होना है. चूंकि लिबरल पार्टी अल्पमत सरकार की अगुवाई कर रही है इसलिए अगर अविश्वास प्रस्ताव आता है और उसमें सरकार गिर जाती है तो यह चुनाव पहले भी कराया जा सकता है.

हाउस ऑफ़ कॉमन्स मौजूदा समय में छुट्टी पर है और जनवरी में उसकी बैठक होगी.

तीन प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने कहा है कि वो ट्रूडो सरकार को गिराना चाहती हैं.

रूढ़िवादी नेता पिएरे पोलिविएयर ने लगातार कहा है कि वो जल्द से जल्द चुनाव चाहते हैं, जबकि ब्लॉक क्यूबेक्वाइस नेता फ़्रांसुआ ब्लैंशेट ने कहा है कि 2025 के शुरुआत में चुनाव कराए जाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव जल्द से जल्द लाना चाहिए.

ट्रूडो को इस सप्ताह में कई झटकों का सामना करना पड़ा है. ट्रूडो कैबिनेट में सबसे वरिष्ठ रहीं उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री क्रिस्टिया फ़्रीलैंड ने इसी सप्ताह इस्तीफ़ा दे दिया था. ऐसे में जगमीत सिंह की घोषणा उनके लिए एक और झटका है.

सबसे हैरानी की बात है कि सोमवार को एक आर्थिक बयान दिए जाने से कुछ घंटों पहले एक सार्वजनिक चिट्ठी लिख कर फ़्रीलैंड ने इस्तीफ़ा दिया था.

उन्होंने कहा था कि अमेरिका के नवनिर्वचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आयात शुल्क बढ़ाए जाने के ख़तरों को देखते हुए "कनाडा के लिए सबसे बेहतर रास्ते" को लेकर उनके और ट्रूडो के बीच असहमतियां थीं.

ट्रंप के बयान से बढ़ी मुश्किलें

पिछले महीने ही डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर दोनों देशों के बीच साझे बॉर्डर को सुरक्षित करने को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई तो वो दो पड़ोसी देशों कनाडा और मेक्सिको के सभी उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ़ (आयात शुल्क) बढ़ा देंगे.

ट्रंप ने ट्रूथ सोशल नेटवर्क पर एक पोस्ट में लिखा कि 20 जनवरी को ऑफिस संभालते ही कनाडा, मेक्सिको और चीन के ख़िलाफ़ टैरिफ लगाने के लिए एक 'कार्यकारी आदेश' पर हस्ताक्षर करेंगे.

ट्रंप ने कहा, ''सभी को पता है कि कनाडा और मेक्सिको से हज़ारों लोग अमेरिका में घुस रहे हैं. ये अपने साथ ड्रग्स ला रहे हैं और कई अपराधों को अंजाम दे रहे हैं. जिस स्तर पर ये सब हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ.''

हालांकि ट्रंप की जीत के तुरंत बाद ट्रूडो ने उन्हें बधाई दी थी लेकिन इससे ट्रंप का रवैया नरम नहीं पड़ा.

ट्रंप और ट्रूडो के बीच संबंध तल्ख़ी भरे रहे हैं और कुछ मौक़ों पर ट्रंप ने उन पर व्यक्तिगत हमले भी बोले हैं.

कनाडा का 75 प्रतिशत निर्यात अमेरिका को होता है और टैरिफ़ बढ़ाए जाने से उसकी समस्या बढ़ सकती है.

अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि टैरिफ़ लगाए जाने से कनाडा की अर्थव्यवस्था को काफ़ी धक्का पहुंचेगा.

लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने कनाडा को लेकर और तीख़ा बयान दिया.

दो दिन पहले ट्रंप ने ट्रूथ सोशल नेटवर्क पर एक पोस्ट में लिखा, "किसी के पास जवाब नहीं है कि हम क्यों कनाडा को हर साल 10 करोड़ डॉलर की सब्सिडी देते हैं. अधिकांश कनाडाई 51वां प्रांत बनना चाहते हैं. इससे वे टैक्स और सैन्य सुरक्षा पर होने वाले ख़र्च में बहुत बड़ी बचत करेंगे. मुझे लगता है कि यह शानदार विचार है. 51वां राज्य!!"

ट्रूडो पर इस्तीफ़ा देने का बढ़ा दबाव

इस्तीफ़ा देते हुए कनाडा की वित्त मंत्री फ़्रीलैंड ने कहा कि टैरिफ़ कनाडा के लिए "गंभीर ख़तरा" है और उन्होंने प्रधानंत्री ट्रूडो पर राजकोषीय हालत सुधारने की बजाय ऐसी "महंगी पड़ने वाली राजनीति करने" का इल्ज़ाम लगाया जिसे देश नहीं झेल सकता.

इसके बाद से ही ट्रूडो से इस्तीफ़ा दिए जाने की मांग बढ़ गई है, जिसमें उनकी लिबरल पार्टी के सदस्य भी शामिल हैं.

ग्लोब और मेल के मुताबिक़, अभी तक 153 में से 19 सदस्यों ने उन्हें पद छोड़ने की सार्वजनिक रूप से अपील की है.

इन लिबरल सदस्यों में सबसे ताज़ा बयान रॉबर्ड ओलिफैंट का है.

शुक्रवार को ओलिफैंट ने सार्वजनिक रूप से चिट्ठी लिखी जिसमें कहा कि उनके साथी, पिछले नौ सालों के कार्यकाल में लिबरल सरकार द्वारा किए गए कामों को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं लेकिन ट्रूडो का नेतृत्व, अगले चुनाव में पार्टी की सफलता में "मुख्य बाधा" बन गया है.

हालांकि इन सार्वजनिक अपीलों पर ट्रूडो ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है और कथित तौर पर अपनी पार्टी के सदस्यों से कहा है कि वो छुट्टियों के दौरान इस मुद्दे पर विचार करेंगे और आगे क्या करना है, इस पर फ़ैसला लेंगे.

फ़्रीलैंड की ख़ाली जगह पर नई नियुक्ति करने के बाद अन्य ख़ाली जगहों को भरने के लिए ट्रूडो ने शुक्रवार को कैबिनेट में फ़ेरबदल किए जाने की बात कही थी, क्योंकि कई मंत्रियों ने घोषणा की थी कि वे अगले साल होने वाले चुनावों में खड़े नहीं होंगे.

जस्टिन ट्रूडो 2015 से सत्ता में बने हुए हैं. 2019 और 2021 में ट्रूडो की पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर सकी थी और वो दूसरी पार्टी के समर्थन से सरकार में हैं.

जगमीत सिंह कौन हैं?

जगमीत सिंह की जड़ें पंजाब के बरनाला ज़िले में ठिकरिवाल गांव से जुड़ी हैं. उनका परिवार 1993 में कनाडा चला गया था.

ट्रूडो और जगमीत सिंह के बीच मार्च 2022 में हुए समझौते के तहत लिबरल पार्टी ने एनडीपी को संसद के अंदर अहम मुद्दों पर समर्थन देने की बात कही थी. हालांकि इसमें सत्ता साझेदारी की बात शामिल नहीं थी.

इसी कारण बीते दो चुनावों से बहुमत हासिल नहीं कर पाई ट्रूडो की पार्टी सत्ता में बनी रही.

इस समझौते के बदले जगमीत सिंह की पार्टी की प्राथमिकताओं को पूरा करने में ट्रूडो को मदद करनी थी.

लेकिन इस साल की शुरुआत में ट्रूडो सरकार के उस फ़ैसले से एनडीपी ने अलग रास्ता अख़्तियार करने पर विचार करना शुरू कर दिया, जिसके तहत कनाडा के दो बड़े रेलवे के काम बंद करने पर कैबिनेट ने सख़्ती बरती थी.

जगमीत सिंह भारत की कई मौक़ों पर आलोचना करते रहे हैं.

अप्रैल 2022 में जगमीत सिंह ने कहा था, ''भारत में मुस्लिमों को निशाना बनाकर हो रही हिंसा की तस्वीरें, वीडियो देखकर मैं चिंतित हूँ. मोदी सरकार को मुस्लिम-विरोधी भावनाओं को उकसाने से रोकना चाहिए. मानवाधिकारों की रक्षा होनी चाहिए.''

भारत में 1984 में सिख विरोधी दंगे को लेकर जगमीत हमेशा से मुखर रहे हैं. कनाडा में इसे लेकर निकाली गई कई झांकियों पर भारत ने विरोध जताया था.

दिसंबर 2013 में जगमीत सिंह को अमृतसर आने के लिए भारत ने वीज़ा नहीं दिया था.

वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़, जगमीत सिंह पार्टी के नेता बनने से पहले ख़ालिस्तान की रैलियों में शामिल होते थे.

क्षेत्रफल के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश कनाडा में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं.

कनाडा की आबादी में सिख 2.1 फ़ीसदी हिस्सेदारी रखते हैं. पिछले 20 सालों में कनाडा के सिखों की आबादी दोगुनी हुई है. इनमें से अधिकांश भारत के पंजाब से शिक्षा, करियर, नौकरी जैसे कारणों से ही कनाडा पहुंचे हैं.

वैंकुवर, टोरंटो, कलगैरी सहित पूरे कनाडा में गुरुद्वारों का एक बड़ा नेटवर्क है.

सिखों की अहमियत इस बात से भी लगा सकते हैं कि जस्टिन ट्रूडो ने जब अपने पहले कार्यकाल में कैबिनेट का गठन किया तो उसमें चार सिख मंत्रियों को शामिल किया.

2015 में जस्टिन ट्रूडो ने कहा था कि उन्होंने जितने सिखों को अपनी कैबिनेट में जगह दी है, उतनी जगह भारत की कैबिनेट में भी नहीं है.

कई विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में भारत के साथ जो तल्ख़ी दिखी है उसके लिए ट्रूडो की ख़ालिस्तान समर्थक नीति ज़िम्मेदार है.

भारत की ओर से भी कई बार कहा गया कि ट्रूडो चुनावी राजनीति के चलते दोनों देशों के रिश्तों को संकट में डाल रहे हैं और अलगाववादियों को पनाह दे रहे हैं.

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