ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्या है और अमेरिका-इसराइल क्या चाहते हैं?

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- Author, रफ़ी बर्ग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
विवादों से घिरे ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर नए समझौते पर पहुंचने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच कई साल के बाद शनिवार को पहली बार बातचीत होने वाली है.
डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए साल 2018 में ईरान और वैश्विक शक्तियों के बीच हुए पिछले परमाणु समझौते से अमेरिका को हटा लिया था.
उन्होंने ईरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे ईरान नाराज़ हो गया था.
अब ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान के साथ बातचीत सफल नहीं हुई तो उस पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी.

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ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति क्यों नहीं है?

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ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक उद्देश्यों के लिए है.
ईरान इस बात पर जोर देता है कि वह परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश नहीं कर रहा है. लेकिन कई देश और साथ ही दुनियाभर के परमाणु कार्यक्रम पर नज़र रखने वाली संस्था, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए इससे सहमत नहीं हैं.
साल 2002 में जब ईरान के गुप्त परमाणु ठिकानों का पता चला था, उसी समय उसके मक़सद पर संदेह पैदा हुआ था.
इसी के बाद परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) समझौता टूट गया, जिस पर ईरान समेत लगभग अन्य सभी देशों ने हस्ताक्षर किए थे.
एनपीटी सैन्य मक़सद के अलावा बाक़ी ज़रूरतों के लिए परमाणु तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति देता है. इनमें चिकित्सा, खेती और ऊर्जा ज़रूरत शामिल हैं. लेकिन यह समझौता परमाणु हथियारों के विकास की अनुमति नहीं देता है.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम कितना विकसित है?

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साल 2018 में जब से अमेरिका ने मौजूदा परमाणु समझौते ज्वॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन या जेसीपीओए से हाथ खींचा, उसी वक़्त से ईरान ने प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के ट्रंप के फ़ैसले के विरोध में अपनी प्रमुख प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन किया है.
ईरान ने यूरेनियम संवर्धन के लिए हजारों उन्नत सेंट्रीफ्यूज मशीनें स्थापित की हैं, जिस पर जेसीपीओए के तहत प्रतिबंध लगाया गया था.
परमाणु हथियारों के लिए 90% शुद्धता तक संवर्धित यूरेनियम की ज़रूरत होती है. जेसीपीओए के तहत, ईरान को केवल 300 किलोग्राम यूरेनियम रखने की अनुमति थी, जो 3.67% तक संवर्धित हो. ये नागरिक परमाणु ऊर्जा और शोध के मक़सद के लिए पर्याप्त है, लेकिन इससे परमाणु बम नहीं बनाया जा सकता है.
लेकिन आईएईए ने कहा कि मार्च 2025 तक ईरान के पास क़रीब 275 किलोग्राम यूरेनियम था जिसे 60% तक शुद्ध किया गया है. अगर ईरान यूरेनियम को और शुद्ध कर ले तो यह सैद्धांतिक रूप से क़रीब आधा दर्जन परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त है.
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि उनका मानना है कि ईरान उस यूरेनियम को एक हफ़्ते में ही एक बम बनाने के ज़रूरत के मुताबिक़ बदल सकता है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने में एक साल से लेकर 18 महीने तक का वक़्त लगेगा.
ट्रंप परमाणु समझौते से क्यों हट गए?

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संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने साल 2010 से ईरान पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं, क्योंकि उन्हें संदेह था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए कर रहा है.
इन प्रतिबंधों ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में तेल बेचने से रोक दिया और देश की एक सौ अरब डॉलर की विदेशी संपत्ति को फ्रीज़ कर दिया. इससे ईरान की अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो गई और इसकी मुद्रा रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई. देश में महंगाई भी बढ़ गई.
साल 2015 में, ईरान और छह वैश्विक ताक़तें जिनमें - अमेरिका, चीन, फ्रांस, रूस, जर्मनी और ब्रिटेन शामिल हैं, ये देश कई साल की बातचीत के बाद जेसीपीओए पर सहमत हुए थे.
ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम के संबंध में जो कुछ करने की अनुमति दी गई थी, उसे सीमित करने के साथ ही इसने आईएईए को ईरान के सभी परमाणु ठिकानों तक पहुंच बनाने और संदिग्ध ठिकानों की जांच करने की अनुमति दे दी.
इसके बदले में ईरान के ऊपर लगी पाबंदी हटाने पर सहमति बन गई.
जेसीपीओए 15 साल के लिए निर्धारित किया गया था, उसके बाद ईरान पर लगे प्रतिबंध समाप्त हो जाएंगे.
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में साल 2018 में अमेरिका को इस समझौते से दूर कर लिया था, जो कि इसका एक प्रमुख स्तंभ था.
उन्होंने कहा कि यह एक "बुरा सौदा" था क्योंकि यह स्थाई नहीं था और इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के साथ ही अन्य बातों का भी समाधान नहीं था.
ट्रंप ने ईरान को एक नए और विस्तृत समझौते पर बातचीत की ख़ातिर बाध्य करने के लिए "अधिकतम दबाव" बनाने वाले अभियान के तहत अमेरिकी प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिया.
ट्रंप का यह फ़ैसला अमेरिका के उन सहयोगियों से प्रभावित था जो इस समझौते के विरोधी थे, जिसमें मुख्य तौर पर इसराइल था.
इसराइल ने दावा किया कि ईरान अभी भी गुप्त परमाणु कार्यक्रम चला रहा है और चेतावनी दी कि ईरान प्रतिबंधों की वजह से राहत के तौर पर मिले अरबों डॉलर का इस्तेमाल अपनी सैन्य गतिविधियों को मजबूत करने में करेगा.
अब अमेरिका और इसराइल क्या चाहते हैं?

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ईरान के साथ बातचीत के बारे में ट्रंप की घोषणा ने इसराइल को हैरान कर दिया है. ट्रंप लंबे समय से कहते आए हैं कि वो जेसीपीओए से "बेहतर" सौदा करेंगे. हालांकि अब तक ईरान ने समझौते पर फिर से बातचीत करने से इनकार कर दिया है.
ट्रंप ने पहले चेतावनी दी थी कि अगर ईरान ने नया समझौता नहीं किया तो उसपर "बमबारी की जाएगी".
ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वाल्ट्ज ने कहा है कि ट्रंप ईरान के परमाणु कार्यक्रम को "पूरी तरह से नष्ट" करना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "यह (ईरान का यूरेनियम) संवर्धन है, यह शस्त्रीकरण है और यह एक रणनीतिक मिसाइल कार्यक्रम है."
हालांकि ट्रंप ने कहा कि "प्रत्यक्ष वार्ता" होगी, लेकिन ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ओमान में होने वाली वार्ता अप्रत्यक्ष होगी.
उन्होंने कहा कि ईरान अमेरिका के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है, लेकिन ट्रंप को पहले इस बात पर ज़रूर सहमत होना चाहिए कि कोई "सैन्य कार्रवाई" नहीं होगी.
ट्रंप की घोषणा के बाद इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि इस मामले में स्वीकार करने लायक एकमात्र समझौता यह होगा कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने पर सहमत हो जाए.
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है: "हम अंदर जाएंगे, परमाणु ठिकानों को उड़ा देंगे और अमेरिकी निगरानी में सभी उपकरणों को नष्ट कर देंगे."
इसराइल का सबसे बड़ा डर यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान के पूर्ण आत्मसमर्पण के बिना किसी समझौते को स्वीकार कर सकते हैं और जिसे वो कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं.
इसराइल ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और माना जाता है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं, जिसकी न तो वह पुष्टि करता है और न ही खंडन करता है.
इसराइल का मानना है कि परमाणु हथियार संपन्न ईरान, जो इसराइल के अस्तित्व के हक़ को स्वीकार नहीं करता, वो इसराइल के लिए एक बड़ा ख़तरा पैदा करेगा.
क्या अमेरिका और इसराइल ईरान पर हमला कर सकते हैं?

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अमेरिका और इसराइल दोनों के पास ईरान के परमाणु ठिकानों के बुनियादी ढांचे पर बमबारी करने की सैन्य ताक़त है, लेकिन ऐसा करना काफ़ी जटिल और जोखिम भरा अभियान होगा और इसके नतीजे भी निश्चित नहीं होंगे.
ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकाने ज़मीन के नीचे बने हुए हैं, जिसका मतलब है कि केवल सबसे ताक़तवर बंकर-बस्टिंग बम ही उन तक पहुंच सकते हैं. ऐसे बम अमेरिका के पास ज़रूर हैं, लेकिन इसराइल के पास इनके होने की जानकारी नहीं है.
अगर ऐसा होता है तो ईरान निश्चित रूप से अपनी रक्षा करेगा, जिसमें इस इलाक़े में अमेरिकी संपत्तियों पर हमला करना और इसराइल पर मिसाइल हमले करना शामिल हो सकता है.
इस तरह के ऑपरेशन के लिए, अमेरिका को संभवतः खाड़ी में अपने ठिकानों के साथ-साथ विमान वाहक जहाजों का भी उपयोग करना होगा.
लेकिन क़तर जैसे देश, जहां सबसे बड़ा अमेरिकी एयरबेस है, वो बदले की कार्रवाई के डर से ईरान पर हमला करने में मदद करने के लिए संभवतः तैयार न हो.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















