दुनिया बदली पर क्यों नहीं बदल पा रही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तस्वीर

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सितंबर 2025 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए नाइजीरिया के उपराष्ट्रपति कशीम शेटीमा ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार के लिए चार सुझाव पेश किए.
इनमें एक सुझाव यह था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ऐसे सुधार किए जाएं, जो विश्व में शांति, विकास और मानवाधिकारों की रक्षा को और मज़बूत करे.
उन्होंने यह भी कहा कि नाइजीरिया को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाना चाहिए. नाइजीरिया ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनना चाहते हैं. दशकों से केवल पांच राष्ट्र ही इसके स्थायी सदस्य हैं.
तो इस हफ़्ते 'दुनिया जहान' में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अब भी प्रासंगिक है?
विश्व की पुलिस

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लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रोफ़ेसर डेविका हॉवेल मानती हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है.
वह कहती हैं, "यह एक ऐसा मंच है जहां विश्व की बड़ी शक्तियां साथ बैठकर समस्याओं का निपटारा करती हैं. इसमें वो हमेशा सफल भले ही न हों, लेकिन इसके अलावा हमारे पास फिलहाल कोई दूसरा साझा मंच नहीं है."
डेविका हॉवेल बताती हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गठन का प्रस्ताव रखा था. उन्होंने कहा था कि यह "विश्व के चार पुलिसमैन" होंगे, क्योंकि उस समय इसमें अमेरिका, रूस, यूके और चीन को सदस्य बनाया गया था. बाद में फ़्रांस को इसका पाँचवाँ स्थायी सदस्य बना लिया गया.
उनका मानना था कि ये ताकतें विश्व में शांति सुनिश्चित कर पाएंगी. इस संस्था के गठन में रूज़वेल्ट, यूके के विंस्टन चर्चिल और सोवियत संघ के नेता जोसेफ़ स्टालिन की मुख्य भूमिका थी.
1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए चार्टर या अधिकारपत्र पर हस्ताक्षर हुए, तब सुरक्षा परिषद को संयुक्त राष्ट्र का छठा अंग बनाया गया.
डेविका हॉवेल का मानना है कि इस संस्था में केवल पाँच शक्तिशाली सदस्य इसलिए रखे गए थे ताकि विश्व शांति को खतरा पहुँचाने वाली किसी स्थिति से तुरंत निपटा जा सके.
डेविका हॉवेल बताती हैं कि संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डैग हैमरश्कोल्ड ने कहा था, "सुरक्षा परिषद का उद्देश्य सामान्य रूप से सभी युद्धों को रोकना नहीं, बल्कि महायुद्ध को रोकना है."
इस मायने में कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सफल रही है, क्योंकि दुनिया की बड़ी शक्तियों ने इसके अब तक के कार्यकाल के दौरान सीधे एक-दूसरे से युद्ध नहीं किया है.
डेविका हॉवेल कहती हैं कि सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग है, क्योंकि केवल सुरक्षा परिषद द्वारा पारित प्रस्तावों का पालन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य बाध्य हैं. इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए सदस्य देश अपनी सेनाएं उपलब्ध कराते हैं, जो संयुक्त राष्ट्र शांति सुरक्षा बल के रूप में काम करती हैं.
संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का पालन न करने वाले देशों के ख़िलाफ़ सुरक्षा परिषद प्रतिबंध भी लगा सकती है.
1940 के दशक में अमेरिका, सोवियत संघ और उनके सहयोगी देशों के बीच बढ़ते तनाव के चलते शीत युद्ध शुरू हुआ, जिसका असर सुरक्षा परिषद पर भी पड़ा.
इसके सदस्य मिलकर काम करने में असमर्थ हो गए. 1991 में शीत युद्ध समाप्त हुआ और उसी साल सोवियत संघ का विघटन हो गया. इसके बाद सुरक्षा परिषद की सक्रियता बढ़ गई.

डेविका हॉवेल कहती हैं कि इसकी सक्रियता में आई तेज़ी का एक उदाहरण खाड़ी युद्ध है, जहां सुरक्षा परिषद ने कुवैत से इराक़ को बाहर खदेड़ने के लिए सैनिक कार्रवाई को मंज़ूरी दी.
उस दौरान संयुक्त राष्ट्र के शांति सुरक्षा बलों की भूमिका भी बढ़ गई. नामीबिया, मोज़ांबिक, कंबोडिया और अल सल्वाडोर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा बलों ने उन देशों में युद्ध रोककर शांति कायम करने में मदद की.
1990 के दशक में रवांडा और पूर्व यूगोस्लाविया में युद्ध अपराध के दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए दो अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध न्यायालय गठित किए गए. लेकिन कई जनसंहारों को रोकने में सुरक्षा परिषद नाकाम भी रही, जिनमें रवांडा और स्रेब्रेनित्सा के जनसंहार प्रमुख हैं.
आज सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, यूके और फ़्रांस के साथ दस अस्थायी सदस्य शामिल हैं.
दो साल के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य देशों में से अस्थायी सदस्य चुने जाते हैं. इन पंद्रह सदस्यों में से हर देश को एक महीने के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिलती है.
डेविका हॉवेल ने कहा कि अस्थायी सदस्यता क्षेत्रीय आधार पर दी जाती है. इसमें तीन सीटें अफ़्रीका को, दो एशिया को, दो लैटिन अमेरिका को, दो पश्चिम यूरोपीय गुट को और एक पूर्वी यूरोप को दी जाती है.
वो बताती हैं कि उभरती शक्तियों को सुरक्षा परिषद की सदस्यता से अधिक प्रभाव हासिल होता है, लेकिन अब भी लगभग 60 देशों को सुरक्षा परिषद की सदस्यता नहीं मिली है.
सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों को एक-एक वोट मिलता है, और किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिए नौ वोटों की ज़रूरत होती है. लेकिन स्थायी सदस्य देशों के पास वीटो का अधिकार है, यानी अगर किसी प्रस्ताव को बहुमत मिल भी जाए, तो कोई भी स्थायी सदस्य उसे वीटो कर खारिज कर सकता है.
डेविका हॉवेल कहती हैं, "इसी वीटो अधिकार की वजह से हाल के वर्षों में सुरक्षा परिषद के काम में काफी अड़चनें आई हैं."
वीटो का खेल

न्यूयॉर्क स्थित संस्था क्राइसिस ग्रुप में संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय कूटनीतिक विभाग के निदेशक रिचर्ड गोवेन की राय है कि वीटो का अधिकार सुरक्षा परिषद का मूल हिस्सा है, क्योंकि वीटो के बिना अमेरिका, रूस और चीन जैसी बड़ी ताकतें सुरक्षा परिषद का हिस्सा नहीं बनना चाहेंगी. उन्हें अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए वीटो की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "बाहर से वीटो काफ़ी निर्णायक बात नज़र आए, लेकिन असल में यह पेचीदा कूटनीतिक खेल का हिस्सा है. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के एक अनुच्छेद में कहा गया है कि सदस्य देशों को उन प्रस्तावों को रोकना या उनके ख़िलाफ़ मतदान नहीं करना चाहिए जिन मुद्दों से वे खुद जुड़े हुए हों. लेकिन दशकों से वीटो अधिकार के इस्तेमाल में इस नियम की अनदेखी होती रही है."
सुरक्षा परिषद के गठन के बाद से अब तक वीटो का इस्तेमाल 300 से ज़्यादा बार किया गया है. 2024 में सात प्रस्तावों के मसौदे वीटो किए गए थे. रिचर्ड गोवेन का कहना है कि वीटो का सबसे अधिक इस्तेमाल रूस ने किया है, लेकिन 2025 में सबसे ज़्यादा वीटो अमेरिका ने लगाए. पिछले साल रूस ने चार बार वीटो का इस्तेमाल किया था.
रिचर्ड गोवेन मानते हैं कि कई बार देश अपनी किसी कार्रवाई की आलोचना को रोकने के लिए वीटो का इस्तेमाल करते हैं.
"मिसाल के तौर पर रूस ने यूक्रेन युद्ध से संबंधित प्रस्तावों को वीटो किया है. अमेरिका ने अपने सहयोगी इसराइल के बचाव के लिए भी वीटो का इस्तेमाल किया है."
यूके और फ़्रांस ने आख़िरी बार 1989 में वीटो का इस्तेमाल किया था. रिचर्ड गोवेन के मुताबिक़, ये देश सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को खुलकर ख़ारिज करते नहीं दिखना चाहते, लेकिन पर्दे के पीछे वीटो इस्तेमाल करने की धमकी ज़रूर देते हैं.
पिछले साल चीन ने रूस के साथ मिलकर अमेरिका के ग़ज़ा में युद्ध को तुरंत रोके जाने वाले प्रस्ताव को वीटो किया था. रिचर्ड गोवेन कहते हैं कि चीन, रूस के साथ मिलकर सीरिया जैसे मुद्दों से जुड़े प्रस्तावों के खिलाफ़ भी वीटो करता रहा है. हालांकि आम तौर पर वह प्रस्तावों को रोकने वाली शक्ति के रूप में नहीं दिखना चाहता.
रूस बेझिझक वीटो का इस्तेमाल करता है ताकि यह दिखा सके कि वह एक बड़ी ताकत है. अगर कोई प्रस्ताव वीटो हो जाए तो संयुक्त राष्ट्र महासभा अपने विशेषाधिकार के तहत सामूहिक हस्तक्षेप के लिए कदम उठा सकती है. लेकिन सदस्य देश केवल सुरक्षा परिषद द्वारा पारित प्रस्तावों का पालन करने के लिए ही बाध्य होते हैं.
रिचर्ड गोवेन के मुताबिक़, स्थायी सदस्यों के व्यवहार का असर अस्थायी सदस्यों के चुनाव पर भी पड़ता है.
वह कहते हैं, "कई देश यह भी मानते हैं कि पाँच स्थायी सदस्यों के बीच बढ़ती दरारों के चलते सुरक्षा परिषद प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रही, इसलिए वे इसकी अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव नहीं लड़ना चाहते. स्थायी सदस्य वीटो का जितना अधिक इस्तेमाल करेंगे, सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता को उतना ही ज़्यादा नुकसान पहुँचेगा."
प्रतिनिधित्व की मांग

लंदन स्थित संस्था चैटम हाउस के ग्लोबल गवर्नेंस एंड सिक्योरिटी सेंटर के निदेशक डॉक्टर समीर पुरी कहते हैं, "दशकों से पाँच देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य यानी पी-5 क्लब का हिस्सा हैं. यह व्यवस्था अब पुरानी हो चुकी है और दुनिया काफी बदल चुकी है. कई देश चाहते हैं कि उन्हें भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाए."
मिसाल के तौर पर भारत की दावेदारी का आधार यह है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और एक बड़ी अर्थव्यवस्था भी है. इस नाते सुरक्षा परिषद में उसे प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. स्थायी सदस्यता के लिए जापान और जर्मनी भी मिलकर कोशिश करते रहे हैं.
सुरक्षा परिषद में कुछ नए देशों को स्थायी सदस्य बनाने की मांग मौजूदा स्थायी सदस्यों के भीतर से भी उठी है. ओबामा सरकार ने भारत को स्थायी सदस्य बनाने पर ज़ोर दिया था.
"हाल में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी भारत की दावेदारी का प्रबल समर्थन किया है. मगर इसे इस संदर्भ में भी देखना ज़रूरी है कि ट्रंप सरकार ने भारत पर भारी टैरिफ़ लगा दिए हैं. ऐसे में रूस का कोई भी भारत समर्थक कदम भारत को रूस के और करीब ला सकता है."
रूस ने ब्राज़ील की स्थायी सदस्यता का भी समर्थन किया है. वहीं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद में अफ्रीका के प्रतिनिधित्व का सुझाव देते हुए कहा है कि "परिषद दुनिया के साथ नहीं बदल पाई है."
डॉक्टर समीर पुरी कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र को सुरक्षा परिषद की कमियों का अहसास है. पिछले साल संयुक्त राष्ट्र ने अपनी भविष्य की योजना की जो रूपरेखा पेश की, उसमें कामकाज के तरीकों में सुधार की बात की गई.
मिसाल के तौर पर शांति सुरक्षा बलों और डिजिटल तकनीक के नियंत्रण की चर्चा की गई, लेकिन संस्था अब भी अपनी ख़ामियों को दूर करने के प्रभावी तरीकों की ओर नहीं बढ़ पाई है.
यही वजह है कि अब उभरती आर्थिक शक्तियां संयुक्त राष्ट्र के बजाय ब्रिक्स जैसे नए संगठनों की ओर झुक रही हैं. शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन और यूरेशियन ग्रुप भी ऐसे ही संगठन हैं, जिनमें भारत शामिल है.
डॉक्टर समीर पुरी ने कहा, "भारत विश्व में अपनी साख मज़बूत करने के लिए इन संगठनों का इस्तेमाल कर रहा है. इसी के चलते उसने जी-20 सम्मेलन का शानदार आयोजन किया. ब्राज़ील ने भी यही किया."
"दोनों देशों ने दिखा दिया है कि हम भले ही पी-5 न हों, लेकिन विश्व के समीकरणों में हमारा स्थान बहुत महत्वपूर्ण है. हम विश्व की चुनौतियों से निपटने के लिए किए जाने वाले सामूहिक प्रयासों और चर्चाओं में अहम भूमिका निभा रहे हैं. इसलिए हमारी अनदेखी मत कीजिए."
मूलभूत सिद्धांत

संयुक्त राष्ट्र के कानून विभाग की पूर्व कानून अधिकारी और सुरक्षा परिषद में सुधार संबंधी एक किताब की सह संपादक मोना अली ख़लील का मानना है कि फ़िलहाल सुरक्षा परिषद अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रही है.
उन्होंने कहा, "हमें संयुक्त राष्ट्र के चार्टर को किसी आदर्शवादी संहिता की तरह नहीं बल्कि व्यावहारिक सिद्धांतों और सामूहिक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखना चाहिए."
"अगर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य अपना वर्चस्व बरकरार रखना चाहते हैं तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सभी सिद्धांतों का पालन करते हुए ज़िम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए. सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता को कायम रखना चाहिए. हमें संयुक्त राष्ट्र के मूलभूत सिद्धांतों की तरफ़ लौटना चाहिए."
मोना अली ख़लील की राय है कि सुरक्षा परिषद में सुधार करने के लिए या उसका विस्तार करते समय हमें संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है बल्कि उसके मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर ही सुधार होना चाहिए.
किसी भी अत्याचार, आक्रामकता या मानवाधिकार उल्लंघनों के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र की प्रभावी कार्यवाही होनी चाहिए जिसमें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालयों को सक्रियता से काम करना चाहिए. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय एक स्वतंत्र संस्था है.
मोना अली ख़लील के अनुसार शांति और न्याय के लिए कई संस्थाओं को मिल कर काम करना चाहिए. इसमें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, क्षेत्रिय न्यायालय और राष्ट्रीय न्यायालय भी शामिल हैं.
"लोगों को न्याय दिलवाने और अपराधियों की जवाबदेही तय करने के लिए चार्टर में संशोधन की ज़रूरत नहीं है. किसी स्थायी सदस्य को इन समाधानों का वीटो करने का अधिकार नहीं होना चाहिए."
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का मुख्य उद्देश्य विश्व को सुरक्षित बनाना है और इसे हासिल करने के लिए सुरक्षा में बदलाव के सुझाव कई सालों से दिए जा रहे हैं.
इन बदलावों का इसके पांच स्थायी सदस्यों पर क्या असर पड़ेगा?
मोना अली ख़लील कहती हैं, " किसी भी बदलाव के लिए या तो हमें इन स्थायी सदस्यों को सहयोग के लिए प्रोत्साहित करना होगा या उनके बिना ही काम करने का विकल्प ढूंढना पड़ेगा. तो फिर हम संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के सिद्धांतों के अनुसार ही काम क्यों ना करें? क्योंकि यह सबके मानवाधिकार सुरक्षित रखने और पर्यावरण के संरक्षण को ध्यान में रख कर विकास के तरीकों पर ज़ोर देता है."
अगर जनसंहार होंगे, अत्याचार होंगे तो उसके साथ अतिवाद भी पनपेगा और युद्ध होंगे जिससे विश्व की सुरक्षा को ख़तरा होगा. इन सबको टालने के लिए संयुक्त राष्ट्र के मूल सिद्धांतों के अनुसार काम करना ही सबसे बेहतर विकल्प है. यह चार्टर केवल सिद्धांतों का दस्तावेज़ नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व को कायम रखने का ज़रिया है."
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न पर क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अब भी प्रासंगिक है?
विश्व की समस्याओं को हल करने और बड़ी ताकतों को एक मंच पर लाने की दृष्टि से यह संस्था निश्चित रूप से प्रासंगिक है. लेकिन इसकी स्थायी सदस्यता वर्तमान विश्व को प्रतिबिंबित नहीं करती.
संयुक्त राष्ट्र और उसके सदस्य देश मानते हैं कि इसमें बदलाव आवश्यक है, मगर इस पर आम सहमति नहीं बन पाई है.
यह चिंताजनक है कि जिस संस्था का मुख्य उद्देश्य ही सबके साथ मिलकर काम करना है, वही संस्था इस मुद्दे पर सहमति नहीं बना पा रही.
हमारे विशेषज्ञ समीर पुरी के अनुसार, कई मामलों में इसकी निष्क्रियता के कारण कुछ देश मानने लगे हैं कि यह संस्था पहले जितनी प्रभावी नहीं रही और अब समस्याओं का समाधान इसके बगैर ही खोजा जाना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित














