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त्रिपुरा के 12 लाख आदिवासियों को टिपरा मोथा और केंद्र सरकार के समझौते से क्या मिलेगा?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
दो मार्च को भारत सरकार, त्रिपुरा सरकार और इंडिजीनस प्रोग्रेसिव रीजनल अलायन्स यानी 'टिपरा मोथा' ने नई दिल्ली में अन्य हितधारकों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए.
केंद्र सरकार दावा कर रही है कि ये समझौता त्रिपुरा के जनजातीय समूहों के लिए मील का पत्थर साबित होगा.
यह नया समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा और टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा की मौजूदगी में हुआ.
प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने इस नए समझौते को लेकर गृह मंत्रालय के हवाले से एक बयान जारी किया है.
इसमें कहा गया है कि इस समझौते के तहत त्रिपुरा के जनजातियों के इतिहास, भूमि और राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक विकास, पहचान, संस्कृति और भाषा से संबंधित सभी मुद्दों को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया जाएगा.
जनजातीय लोगों की समस्याओं का सम्मानजनक समाधान सुनिश्चित करने के लिए पारस्परिक रूप से सहमत बिंदुओं पर समयबद्ध तरीक़े से काम करने और उन्हें लागू करने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह का गठन किया जाएगा.
समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस समझौते से त्रिपुरा विवाद मुक्त त्रिपुरा बनने की ओर आगे बढ़ गया है. लेकिन इस समझौते की एक बात जनजातीय लोगों में चर्चा का विषय बन गई है.
गृह मंत्रालय के बयान में स्पष्ट लिखा है कि समझौते के कार्यान्वयन के लिए अनुकूल माहौल बनाए रखने के लिए सभी हितधारकों को समझौते पर हस्ताक्षर करने के दिन से किसी भी प्रकार के विरोध अथवा आंदोलन का सहारा लेने से बचना होगा.
गृह मंत्री शाह ने कहा, "अब आपको अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ज़रूरत नहीं है और भारत सरकार एक ऐसी प्रणाली विकसित करने के लिए आगे आएगी, जो सभी के अधिकारों की रक्षा करेगी."
त्रिपुरा के पहले चरमपंथी गुट त्रिपुरा नेशनल वालंटियर्स (टीएनवी) के साथ हुए पहले वाले समझौते में भी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने जनजातीय लोगों के हितों की ऐसी ही बातें की थीं. लेकिन 36 साल बाद एक और समझौता करने की ज़रूरत पड़ गई.
अब सवाल यह है कि क्या कि इस नए समझौते से त्रिपुरा के 12 लाख जनजातीय लोगों की समस्याएं ख़त्म हो जाएंगी? क्या इस नए समझौते में जनजातीय लोगों की उन सभी समस्याओं को शामिल किया गया है जिसके कारण महज़ 37 लाख आबादी वाले इस छोटे से राज्य में लंबे समय तक खूनी हिंसा हुई?
समझौते में संवैधानिक सुरक्षा का ज़िक्र नहीं
त्रिपुरा विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर गौतम चकमा कहते हैं कि जनजातीय लोगों की इस समय संवैधानिक सुरक्षा सबसे अहम है, लेकिन इस एक पन्ने के समझौता पत्र में ऐसे किसी शब्द का ज़िक्र नहीं है.
त्रिपुरा की जनजातीय समुदाय से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेसर चकमा कहते हैं, "इस समझौते में जो बातें कही गई हैं उन अधिकारों का फायदा तो जनजातीय लोगों को पहले से ही मिल रहा है. त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त ज़िला परिषद की बात हो या फिर जनजातीय लोगों के लिए 20 सीटों के आरक्षण वाली सुविधाएं.. वो तो पहले से ही हैं. इस समझौते में जनजातियों के लिए क्या नया है वो स्पष्ट नहीं है. माइग्रेशन सबसे बड़ी समस्या है उसका समझौते में कोई ज़िक्र नहीं है. आम चुनाव होने वाले हैं लिहाज़ा समझौते की भाषा में राजनीति साफ झलक रही है."
प्रोफेसर गौतम चकमा के अनुसार संवैधानिक सुरक्षा का मतलब छठी अनुसूची के तहत आने के बाद भी स्वायत्त जिला परिषद के पास शक्तियां बहुत कम हैं. वित्तीय शक्ति को बढ़ाने पर जनजातीय इलाकों के लिए केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट सीधे लोगों तक पहुंचेगा.
दरअसल जनजातीय लोगों का लंबे समय से आरोप रहा है कि बांग्लादेश से नियमित घुसपैठ के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव ने उन्हें अपने ही गृह राज्य में अल्पसंख्यक बना दिया है.
विवाद मुक्त त्रिपुरा का जिक्र भी इसलिए आता है क्योंकि माइग्रेशन के तहत प्रदेश में आए बंगाली लोगों के हाथों में राज्य की बागडोर है और जनजातियों को अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ रही है.
त्रिपुरा में अवैध घुसपैठ के खिलाफ आवाज उठाते आ रहे ट्विप्रा स्टूडेंट्स फेडरेशन नए समझौते में 'अप्रवासियों की समस्या का उल्लेख नहीं होने' से नाराज है.
नए समझौते पर फेडरेशन के महासचिव हमालू जमातिया कहते हैं, "जनजातियों के भूमि और राजनीतिक अधिकारों तथा पहचान, संस्कृति की मांग के कारण हमने टिपरा मोथा के आंदोलन को समर्थन दिया था. क्योंकि हमारे संगठन की भी लंबे समय से यही मांग रही है. लेकिन इस समझौते में घुसपैठ के मुद्दे को स्पष्ट तौर पर उल्लेख करना चाहिए था. हम अप्रवासियों की वजह से आज अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन गए है."
छात्र नेता कहते हैं, "इस समझौते में सरकार ने जनजातीय लोगों के लिए आगे विरोध-प्रदर्शन नहीं करने की जो शर्त रखी है, वो हमारे संगठन पर लागू नहीं होती. क्योंकि इस समझौते पर टिपरा मोथा के नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं.''
''एक लोकतांत्रिक देश में आंदोलन करने का अधिकार सभी को है. इस समझौते से क्या हासिल होगा अभी कहना मुश्किल है. हमें उम्मीद है कि सरकार जल्द एक कमेटी बनाकर अगले 6 से 8 महीनों में इस समझौते को लागू करने का अपना वादा पूरा करेगी."
जनजातियों के अधिकारों की राजनीति
त्रिपुरा के जनजातियों को लेकर सालों से राजनीति होती रही है. पूर्वी बंगाल और बाद में बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों और शरणार्थियों के परिणामस्वरूप त्रिपुरा की जनसांख्यिकी में एक बड़े बदलाव के कारण यहां चरमपंथी संगठनों का गठन हुआ और कई क्षेत्रीय दल बने.
दरअसल प्रवासियों को राज्य में बसाने का सिलसिला राजशाही के समय से ही शुरू हो गया था. 14वीं शताब्दी की शुरुआत से उत्तर-पूर्व के इस बड़े हिस्से पर लंबे समय तक माणिक्य राजवंश का शासन रहा.
उस दौरान ज्यादातर जनजातियां पहाड़ों पर ही रहती थीं और मैदानी इलाकों में काम करने के लिए बाहर से लोग लाए गए. उस दौर से राज्य की राजनीति और प्रशासन पर बंगाली भाषी और अप्रवासियों का वर्चस्व बढ़ता गया.
पूर्वोत्तर के राज्यों में दशकों से पत्रकारिता कर रहे समीर कर पुरकायस्थ कहते हैं, "जनजातियों के अधिकारों की राजनीति करने वाले लोग समस्याओं को पूरी तरह हल करने में विफल रहे हैं. 70 के दशक में त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति नामक एक पार्टी बनी जिसने जनजातीय वोटों की बदौलत 1988 में कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई.''
वो कहते हैं, ''2001 में यह पार्टी भंग हो गई और इसके कुछ नेताओं ने इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा नामक पार्टी का गठन किया जो 2018 से बीजेपी के साथ सरकार में शामिल है. पिछले चुनाव में जनजातीय लोगों ने माणिक्य राजवंश से आने वाले प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा की पार्टी टिपरा मोथा को अपना समर्थन दिया. उन्होंने 13 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की. पुरानी पार्टियां जब खरी नहीं उतरीं तो लोगों ने नए दलों को समर्थन दिया."
त्रिपुरा विधानसभा ने 1982 में त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) अधिनियम बनाया. केंद्र ने 1985 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इसे छठी अनुसूची में शामिल कर लिया.
इसके बावजूद जनजातीय लोगों की शिकायत रही कि परिषद को वो पावर नहीं दिया गया जिससे जनजातियों को स्वतंत्र अधिकार मिल सके.
यही कारण रहा कि कांग्रेस छोड़कर आए प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा ने 2019 में टिपरा मोथा पार्टी बनाई और जनजातियों के लिए एक अलग राज्य 'ग्रेटर टिपरालैंड' की मांग पर ज़ोरदार आंदोलन किया.
त्रिपुरा की बांग्लादेश के साथ लगभग 856 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा है. लिहाजा घुसपैठ यहां सबसे बड़ा मुद्दा रहा है. प्रदेश में 19 प्रमुख जनजातियां हैं.
साल 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल आबादी 36 लाख 74 हजार में 31.05 फीसदी जनजातीय लोग हैं, जबकि 69.95 फीसद गैर-जनजातीय हैं.
टिपरा मोथा पार्टी नए समझौते पर क्या बोली
27 फरवरी को टिपरा मोथा प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा ने स्वदेशी लोगों की समस्याओं के स्थायी समाधान की मांग के लिए 'आमरण अनशन' शुरू किया था.
इस अनशन के बीच वे अपनी पार्टी की ओर से नई दिल्ली में त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करने गए थे.
भारत सरकार के साथ हुए इस समझौते पर देबबर्मा ने बीबीसी से कहा, "लोकसभा चुनाव के छह महीने के भीतर एक कमेटी का गठन कर समझौते में किए गए वादों को लागू करने का काम शुरू होगा."
अलग राज्य की मांग पर देबबर्मा कहते हैं कि समझौते में अगर अलग राज्य के बारे में जिक्र नहीं है तो सरकार ने यह भी नहीं कहा कि अलग राज्य नहीं मिलेगा.
वो कहते हैं, "यह समझौता भारत सरकार के साथ हुआ है और जिन बातों पर सहमति हुई है सरकार को उन्हें लागू करना होगा. बात जहां तक आगे आंदोलन करने की शर्त से जुड़ी है तो यह महात्मा गांधी का देश है और यहां सत्याग्रह को कोई रोक नहीं सकता. अगर हमारी मांगें पूरी नहीं होती हैं तो हम आगे भी आंदोलन करेंगे."
इस समझौते के महज चार दिन बाद मुख्य विपक्ष की भूमिका निभा रहे टिपरा मोथा पार्टी बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गई.
प्रद्योत देबबर्मा कहते हैं, "हमारे दो लोग सरकार में मंत्री बने हैं. मैंने अपने दोनों लोगों से कहा है कि सरकार में जाकर चुप नहीं बैठना है."
जनजातियों के अधिकारों के लिए हुए इस नए समझौते को राज्य के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने ऐतिहासिक बताया है.
उन्होंने मीडिया से कहा, "समझौता समय की मांग है. आज इस समझौते का काफी महत्व है. हम चाहते हैं कि त्रिपुरा में शांति बनी रहे. हम समस्याएं पैदा करके नहीं, बल्कि संकटों का समाधान कर सरकार में बने रहना चाहते हैं."
एनएलएफटी से 2019 में हुआ था समझौता
त्रिपुरा में जनजातियों के अधिकारों को लेकर कई चरमपंथी संगठनों का गठन हुआ है. त्रिपुरा पुलिस की वेबसाइट में आज भी नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ ट्विप्रा (एनएलएफटी) नामक चरमपंथी संगठन का जिक्र है.
इसके अलावा ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स भी 1956 के बाद त्रिपुरा में प्रवेश करने वाले सभी विदेशियों के निष्कासन की मांग पर सशस्त्र संघर्ष करते रहा है.
त्रिपुरा में इन चरमपंथी संगठनों की कार्रवाई से 1980 और 1990 के दशक में काफी खूनी हिंसा हुई.
भारत सरकार ने 10 अगस्त 2019 को एनएलएफटी के साथ भी एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.
इस समझौते में भी सरकार ने त्रिपुरा की जनजातियों के समग्र विकास का वादा किया है. समझौते में सरकार ने 100 करोड़ रुपये का विशेष आर्थिक विकास पैकेज देने की बात भी कही है.
36 साल पहले भी हुआ था समझौता
12 अगस्त 1988 की तारीख उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा के खासकर जनजातीय लोगों के लिए उनकी समस्याओं के समाधान का दिन था. क्योंकि 12 अगस्त को केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार और खूंखार ट्राइबल नेशनल वालंटियर्स (टीएनवी) नामक चरमपंथी संगठन के बीच एक समझौता हुआ था.
भारत से त्रिपुरा को अलग करने की मांग पर जनजातीय युवाओं ने 1978 में टीएनवी का गठन कर हथियार उठा लिए थे. यह त्रिपुरा का पहला अलगाववादी संगठन था जो 1988 तक सक्रिय रहा.
21 जनवरी 1972 को एक पूर्ण राज्य बनने के बाद त्रिपुरा में टीएनवी के साथ यह पहला ऐसा समझौता था जिसमें आदिवासियों के लिए कई वादे किए गए थे.
इन वादों में भूमिगत चरमपंथियों का पुनर्वास समेत राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से जनजातीय लोगों के लिए आरक्षण, आदिवासियों की अलग की गई ज़मीनों को बहाल करने से लेकर जनजातीय युवाओं के लिए रोज़गार की बातें शामिल थीं.
इस समझौते में सीमापार से घुसपैठ को रोकने तथा बेहतर गश्त और निगरानी के लिए सीमा पर व्यवस्था को मजबूत करने की बात भी कही गई. परंतु इस समझौते को 36 साल बीत जाने के बाद भी राज्य में जनजातीय लोगों का आंदोलन नहीं थमा.
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