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सुबोध कुमार सिंह कौन हैं, जिन पर पेपर लीक मामले में गिरी गाज
- Author, आलोक पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले साल 11 जून, रविवार की रात जब ख़त्म होने को थी, उस समय देश के कुछ शीर्ष नौकरशाहों की नियुक्ति का आदेश जारी हुआ.
छुट्टी वाले दिन और वो भी देर रात गए जारी हुए, इस नियुक्ति आदेश की छत्तीसगढ़ में ख़ूब चर्चा थी.
असल में इस आदेश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सुबोध कुमार सिंह का नाम भी शामिल था, जिन्हें खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद से हटा कर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का महानिदेशक नियुक्त किया गया था.
छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, “ठीक साल भर बाद, शनिवार की रात सुबोध कुमार सिंह को जिस तरह से उनके पद से हटाया गया, इसकी उम्मीद हम लोगों को नहीं थी. ऐसा लगता है कि डैमेज कंट्रोल करने के लिए सुबोध कुमार सिंह जैसे काबिल अफ़सर को निशाना बनाया गया. छत्तीसगढ़ में रहते हुए वे लगभग निर्विवाद अफ़सरों में रहे हैं.”
देश भर में नीट-यूजी और यूजीसी-नेट परीक्षाओं के पेपर लीक मामले को लेकर चल रहे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक सुबोध कुमार को पद से हटा दिया. उनकी जगह प्रदीप सिंह खरोला को नया महानिदेशक बनाया गया है.
हालांकि इन परीक्षा लीक के मामलों में एनटीए चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी की भूमिका पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं.
51 साल के सुबोध कुमार सिंह के भविष्य को लेकर छत्तीसगढ़ में नौकरशाहों के बीच अब चर्चा शुरू हो गई है.
असल में पिछले साल दिसंबर में राज्य में भाजपा सरकार की वापसी के साथ ही उनके भी छत्तीसगढ़ लौटने की चर्चा शुरू हो चुकी थी.
नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग मान कर चल रहा था कि वे जल्दी ही छत्तीसगढ़ लौट सकते हैं और उन्हें छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी जा सकती है. लेकिन फिलहाल इन अटकलों पर विराम लग गया है.
शिक्षक पिता का मेधावी बेटा
उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले सुबोध कुमार सिंह के पिता एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक थे. सुबोध सिंह के परिजन बताते हैं कि उनके शिक्षक पिता ने शुरू से ही सुबोध को बड़े सपने दिखाए और उन सपनों को पूरा करने का रास्ता भी दिखाया.
पढ़ने-लिखने में मेधावी सुबोध ने आईआईटी रुड़की से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिस्टिंक्शन के साथ बीई की डिग्री ली, फिर वहीं से एमई किया.
दोनों ही परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में पास होने के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में एमबीए भी किया.
1997 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद, 1998 में उनकी पहली नियुक्ति असिस्टेंट कलेक्टर के तौर पर अविभाजित मध्य प्रदेश के मंडला में हुई.
जनवरी 2000 से दिसंबर 2000 तक उन्होंने छत्तीसगढ़ के कोरिया ज़िले में बतौर एसडीओ काम किया और यही वह दौर था, जब नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना.
तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने युवा अफ़सरों को आदिवासी बहुल इलाकों में तैनात करना शुरू किया और राज्य बनने के दो महीने के भीतर ही सुबोध कुमार सिंह को ज़िला पंचायत बस्तर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
इसी दौरान रोजगार गारंटी योजना में देश में सबसे बेहतर काम करने के लिए 2002 में उन्हें केंद्र सरकार ने पुरस्कृत भी किया. 2002 में ही उन्हें पहली बार रायगढ़ ज़िले का कलेक्टर बनाया गया.
राज्य सरकार में ताक़तवर अफ़सर
राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों में थोड़े-थोड़े समय तक काम करने के बाद 2005 में उन्हें राजधानी रायपुर का कलेक्टर बनाया गया.
राज्य के दूसरे महत्वपूर्ण ज़िले बिलासपुर के कलेक्टर की भी जिम्मेदारी उन्होंने डेढ़ साल तक निभाई और 2008 में उन्हें फिर से रायपुर का कलेक्टर बना दिया गया.
छत्तीसगढ़ में मुख्य सचिव रह चुके एक सेवानिवृत्त अधिकारी कहते हैं, "राज्य में सत्ता बदल चुकी थी और सुबोध सिंह की पहचान एक ऐसे अफ़सर की बन चुकी थी, जिसे ट्रबल शूटर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता था. सुबोध सिंह की खासियत यही थी कि वह हमेशा लो प्रोफाइल और विनम्र बने रहते थे लेकिन बहुत प्रतिबद्धता के साथ अपना काम करना जानते थे."
यही कारण है कि 3 जून 2009 को तब के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने उन्हें अपने सचिवालय में उप सचिव के तौर पर पदस्थ किया और दिसंबर 2018 में रमन सिंह सरकार की विदाई तक वे दूसरी कई तरह की ज़िम्मेदारियों के साथ, मुख्यमंत्री के सचिवालय में बने रहे.
मुख्यमंत्री रमन सिंह के करीबी रहे एक अफ़सर कहते हैं कि रमन सिंह की सरकार में यह सब जानते हैं कि उनके सचिव अमन सिंह की मर्जी के बिना एक पत्ता नहीं हिल सकता था.
वो अफ़सर कहते हैं, “अमन सिंह हाई प्रोफाइल अधिकारी थे और सुबोध सिंह चुपचाप रह कर काम करने वाले लो प्रोफाइल लेकिन बेहद ताक़तवार अधिकारी. रमन सिंह, अमन सिंह और सुबोध सिंह, इन तीन सिंहों ने बेहतर तालमेल के साथ कई बरसों तक सरकार चलाई. अमन सिंह और सुबोध सिंह, मुख्यमंत्री रमन सिंह के दाएं-बाएं हाथ बने रहे.”
भूपेश बघेल की सरकार में किनारे
दिसंबर 2018 में जब 15 साल की रमन सिंह सरकार की विदाई हुई और राज्य में भूपेश बघेल की कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी तो रमन सिंह की सरकार के विश्वस्त मान लिए गए अधिकांश अफ़सर एक-एक कर किनारे होते चले गए.
रमन सिंह की सरकार में 36 हज़ार करोड़ के कथित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला के दो अफ़सरों डॉक्टर आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा को छोड़ कर, अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों ने केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर जाने का रास्ता अपना लिया. इनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी थे और भारतीय पुलिस सेवा के भी.
कुछ अधिकारियों ने तो अपना कैडर ही बदल लिया.
इस दौरान सुबोध सिंह को श्रम और वाणिज्य कर विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई. साल भर बाद दिसंबर 2019 में उन्हें राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया.
इसी दौरान उन्हें ई-गवर्नेंस में देश में बेहतर काम के लिए केंद्र सरकार ने पुरस्कृत किया.
रायपुर में एक टीवी चैनल के संपादक आशीष तिवारी कहते हैं, “राज्य सरकार चाहती थी कि सुबोध सिंह राज्य में बने रहें और उन्हें कुछ गंभीर ज़िम्मेदारी भी दी जाए. लेकिन उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना बेहतर समझा. केंद्र सरकार ने उन्हें 20 जनवरी 2020 को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में संयुक्त सचिव पर नियुक्ति का आदेश जारी किया और दस दिनों के भीतर उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को संभाल भी लिया.”
पिछले साल 11 जून को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का महानिदेशक नियुक्त किए जाने तक वे इसी विभाग में बने रहे. राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी में रहते हुए राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल दो छोर, सरगुजा और बस्तर में उन्होंने दो नए परीक्षा केंद्र बनाए.
सुबोध सिंह के महानिदेशक बनने के 6 महीने के भीतर ही, छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनी और केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए वरिष्ठ अफ़सरों की वापसी का सिलसिला शुरू हुआ.
स्थानीय मीडिया में इस बात की चर्चा शुरू हुई कि सुबोध कुमार सिंह की जल्दी ही छत्तीसगढ़ वापसी होगी.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला, सुबोध सिंह को पद से हटाए जाने को लीपा-पोती बता रहे हैं.
सुशील आनंद शुक्ला का आरोप है कि सुबोध सिंह केंद्र सरकार के एक मंत्री के करीबी रिश्तेदार हैं और रमन सिंह के शासनकाल में सुबोध सिंह ने राज्य में भी भाजपा के एजेंडे को ही स्थापित करने का काम किया.
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “अगले कुछ महीनों में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दिए जाने की चर्चा तो थी लेकिन जिस तरीक़े से उन्हें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी से हटाया गया है, मुझे नहीं लगता कि उन्हें कोई ज़िम्मेदारी देकर हमारी पार्टी और सरकार, कांग्रेस को बैठे-बिठाए कोई मुद्दा देगी.”
केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर सुबोध का छत्तीसगढ़ से चले जाना भी सवालों के घेरे में है.
सुशील कहते हैं, “जो अफ़सर सरकार बदलते ही, प्रतिनियुक्ति पर चला जाए, उसके पार्टी विशेष के प्रति प्रेम को समझा जा सकता है. भाजपा के एजेंडे पर काम करने के लिए ही वो केंद्र में गए थे. उन्होंने किस तरह और क्या किया, यह सबके सामने है. 25 लाख से अधिक बच्चे इस अफ़सर के कारण प्रताड़ित हुए हैं और महज़ पद से हटाना कोई हल नहीं है. इनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर के क़ानूनी कार्रवाई करने की ज़रूरत है.”
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