पुतिन के दौरे से पहले रूस ने भारत के पाले में डाली गेंद, भारत क्या करेगा फ़ैसला?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे से ठीक पहले रूस ने गेंद भारत के पाले में डाल दी है.

राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव मंगलवार को रूसी न्यूज़ एजेंसी स्पुतनिक की ओर से आयोजित ऑनलाइन प्रेस वार्ता में शामिल हुए थे.

इसी प्रेस वार्ता में पेस्कोव ने कहा कि चीन के साथ रूस का संबंध सीमाओं से परे है और भारत के मामले में भी रूस का यही रुख़ है.

पेस्कोव ने कहा कि यह भारत पर निर्भर करता है कि वह किस हद तक आगे बढ़ने के लिए तैयार है.

दिमित्री पेस्कोव ने कहा, ''चीन हमारा ख़ास रणनीतिक साझेदार है. चीन के साथ बहुत ही उच्च स्तर का सहयोग है, जैसा कि भारत के साथ है. हम चीन के साथ सीमाओं से परे सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार हैं.''

''लेकिन भारत के साथ भी हमारा वही रुख़ है. भारत जिस हद तक आगे जाएगा, हम भी उस हद तक जाने के लिए तैयार हैं. भारत जिस हद तक सहयोग बढ़ाएगा, उसके लिए हम भी पूरी तरह से तैयार हैं.''

पेस्कोव ने यह भी कहा कि रूस से संबंधों के लेकर भारत पर दबाव है और इस दबाव के बीच दोनों देशों को द्विपक्षीय व्यापार सुरक्षित करने की ज़रूरत है.

पेस्कोव ने कहा, ''हम समझते हैं कि भारत पर दबाव है. यही कारण है कि हमें अपने संबंधों को आगे बढ़ाने में बहुत सावधानी बरतनी होगी. हमारे संबंध किसी तीसरे देश के प्रभाव से मुक्त होने चाहिए. हमें अपने संबंधों को सुरक्षित रखना होगा. हमें अपने उस व्यापार को सुरक्षित रखना होगा, जो दोनों देशों के हक़ में है.''

रूस की रणनीति क्या है?

भारत आने से पहले मंगलवार को राष्ट्रपति पुतिन ने भी कहा कि वह चीन और भारत के साथ संबंधों को नई ऊँचाई तक ले जाना चाहते हैं.

जियोपॉलिटिकल स्ट्रैटिजिस्ट वेलिना चकारोवा मानती हैं कि रूस ने भारत के सामने यह ऑफ़र रखकर चीन पर बढ़ी अपनी निर्भरता को संतुलित करने की कोशिश की है.

वेलिना चकारोवा ने एक्स पर लिखा है, ''रूस ने भारत के साथ सीमाओं से परे संबंध का संकेत दिया है. यह अहम संकेत है. रूस खुलेआम भारत को बराबरी का रणनीतिक रुतबा देकर चीन पर बढ़ी निर्भरता को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.''

वेलिना ने लिखा है, ''यह प्रतिबंधों के बीच रूस की अपने लिए रणनीतिक गुंज़ाइश तलाशने की कोशिश है. रूस नए शीत युद्ध की बनती स्थिति में भारत की केंद्रीय भूमिका को समझ रहा है. यह चीन और रूस की उस कोशिश को भी दर्शाता है, जिसके तहत वह अमेरिका और भारत के संबंधों की गहराई के बावजूद नई दिल्ली को रणनीतिक रूप से अपने क़रीब रखना चाहता है. अगर भारत इस प्रस्ताव का कुछ हिस्सा भी स्वीकार करता है, तो एशिया की भू-राजनीतिक संरचना, जैसे यूक्रेन युद्ध, ब्रिक्स प्लस, ऊर्जा प्रवाह और इंडो-पैसिफ़िक संतुलन एक बार फिर बदल जाएगा."

यानी रूस खुलकर कह रहा है कि भारत को अगर उसके साथ संबंधों में चीन वाली ऊँचाई लानी है, तो पश्चिम के दबाव से मुक्त होना होगा.

रूस यह भी चाहता है कि अमेरिकी टैरिफ़ के कारण भारत उसके साथ व्यापारिक संबंधों को सीमित नहीं करे. लेकिन भारत के लिए ये सब इतना आसान नहीं है.

भारत क्या चाहता है?

जिंदल स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स के डीन और 'फ्रेंड्स: इंडियाज क्लोजेस्ट स्ट्रैटिजिक पार्टनर्स' के लेखक श्रीराम चौलिया कहते हैं कि रूस ने भले भारत के पाले में गेंद डाल दी है, लेकिन रूस का यह सपना पूरा नहीं होगा.

श्रीराम चौलिया ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''रूस और चीन का गठजोड़ अमेरिका विरोधी है. भारत इस गठजोड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता है. चीन और रूस दोनों अमेरिका को प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, लेकिन भारत ऐसा नहीं मानता है. भारत को अपनी विकास यात्रा में अमेरिका की ज़रूरत है. भारत न तो रूस के लिए अमेरिका को छोड़ सकता है और न ही अमेरिका के लिए रूस को.''

श्रीराम चौलिया कहते हैं, ''रूस और चीन का सीमाओं से परे संबंध उनकी ज़रूरत के हिसाब से है. दूसरी तरफ़ भारत की ज़रूरत रूस, चीन और अमेरिका तीनों हैं. रूस से भारत का संबंध ऊर्जा और रक्षा तक सीमित है जबकि अमेरिका से बहुआयामी है. 2024 में अमेरिका और भारत का द्विपक्षीय व्यापार 129 अरब डॉलर का था और 45 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस भारत के पक्ष में था. ऐसे में भारत क्यों अमेरिका विरोधी खेमे में शामिल होगा. भारत को अभी अमेरिकी तकनीक की ज़रूरत है.''

पेस्कोव ने कहा कि भारत और रूस का द्विपक्षीय व्यापार अभी 63 अरब डॉलर का है और उम्मीद करते हैं कि 2030 तक यह 100 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा.

यूक्रेन में युद्ध शुरू होने से पहले यानी 2021 में रूस और भारत का द्विपक्षीय व्यापार महज 13 अरब डॉलर का था, जो 2024-25 में 68 अरब डॉलर हो गया है. हालाँकि इस बढ़ोतरी में भारत के तेल आयात का सबसे बड़ा योगदान है.

एकतरफ़ा व्यापार

भारत और रूस के बीच व्यापार एकतरफ़ा है. 2024-25 में भारत का रूस को निर्यात महज 4.88 अरब डॉलर रहा जबकि आयात 63.84 अरब डॉलर रहा.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, 15 अक्तूबर तक भारत को रूस से तेल बेंचमार्क क्रूड की तुलना में दो से ढाई डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था. लेकिन 2023 में यह अंतर प्रति बैरल 23 डॉलर से ज़्यादा था.

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के अनुसार, मार्च 2025 तक समाप्त हुए पिछले वित्त वर्ष में रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट कम होने के कारण भारत ने तेल ख़रीद में महज 3.8 अरब डॉलर की ही बचत की थी.

दूसरी तरफ़ अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है और भारत ने पिछले साल 87 अरब डॉलर का सामान अमेरिका में बेचा था.

पुतिन के दौरे से पहले रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे भारत से क्या चाहिए. पहला यह कि भारत को तय करना होगा कि वह रूस के साथ संबंध सीमाओं से परे चाहता है कि या एक हद तक.

दूसरा यह कि दोनों देशों के संबंधों में किसी तीसरे देश का दबाव ना हो. तीसरा यह कि भारत के साथ 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुँच जाए.

ये तीनों चीज़ें भारत के लिए आसान नहीं है. पुतिन के दौरे से ठीक पहले रूस से भारत के तेल आयात में गिरावट आई है.

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि रूस से तेल ख़रीदारी लगातार कम हो रही है.

अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ''भारतीय कंपनियों ने पहले ही रूस से कच्चे तेल की ख़रीद कम कर दी है. आधिकारिक व्यापार आँकड़ों से पता चलता है कि अक्तूबर 2025 में रूस से कुल आयात साल-दर-साल 27.7 फ़ीसदी से घट गया, जो अक्तूबर 2024 के 6.7 अरब डॉलर से गिरकर इस साल 4.8 अरब डॉलर रह गया. चूँकि इन आयातों का ज़्यादातर हिस्सा कच्चा तेल होता है, इसलिए यह रूसी तेल ख़रीद में 30 फ़ीसदी से अधिक की गिरावट दिखाता है.''

भारत ये भी नहीं चाहता है कि वह पूरी तरह से अमेरिका विरोधी खेमे में शामिल हो जाए. चीन और रूस की जुगलबंदी को इसी रूप में देखा जाता है.

पुतिन का दौरा पश्चिम के लिए कैसा संकेत?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया अमेरिका और सोवियत यूनियन के नेतृत्व में दो खेमे में बँट गई थी, तब भी भारत किसी खेमे में शामिल नहीं था.

भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को चुना और अब भी उसी नीति पर चल रहा है. विदेश मंत्री एस जयशंकर कई बार कह चुके हैं कि रणनीतिक स्वायत्तता से भारत समझौता नहीं करेगा.

इसके बावजूद सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि पुतिन का भारत दौरा अमेरिकी दबदबे को चुनौती देगा.

चेलानी ने एक्स पर लिखा है, ''प्रतिस्पर्धी गुटों में बँटती दुनिया में 4–5 दिसंबर को पुतिन की नई दिल्ली यात्रा कोई सामान्य राजनयिक पड़ाव नहीं है; यह एक शक्तिशाली जियोपॉलिटिकल संकेत है. यह यात्रा महत्वपूर्ण समझौतों को जन्म दे सकती है, जिनमें नए पेमेंट चैनल भी शामिल हैं. स्विफ्ट प्रणाली को दरकिनार करने और अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए भी यह अहम है.''

''भारत देख रहा है कि कैसे पश्चिमी नीतियों ने प्रतिबंधों के साथ स्विफ्ट के अलावा अन्य वित्तीय उपकरणों के हथियारीकरण ने रूस को चीन की गोद में धकेल दिया है. फिर भी पुतिन की यह यात्रा, जो यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा है, दर्शाती है कि रूस के पास चीन से परे भी विकल्प मौजूद हैं और वह ख़ुद को चीन का 'जूनियर साझेदार' बनने नहीं देगा.''

चेलानी ने लिखा है, ''उधर भारत भी अपना एक कड़ा संदेश दे रहा है. जब ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका भारत के साथ अपमानजनक व्यवहार कर रहा है, तब नई दिल्ली न तो रूस को अलग-थलग करने और न ही पश्चिमी प्रतिबंधों की लाइन में चल रहा है जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को नुक़सान पहुँचाते हैं. पुतिन की मेज़बानी करके भारत यह साफ़ कर रहा है कि वह पश्चिम से थोपे गए 'या तो हमारे साथ या हमारे ख़िलाफ़' वाली नीति को स्वीकार नहीं करता और अपनी स्वतंत्र राह चुनेगा.''

यूक्रेन पर हमले से पहले दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया था और अपनी साझेदारी का नाम 'नो लिमिट्स' यानी सीमाओं से परे बताया था.

वॉशिंगटन के थिंक टैंक स्टिम्सन सेंटर में चाइना प्रोग्राम के डायरेक्टर युन सुन ने डब्ल्यूएसजे से कहा था, ''शी जिनपिंग के रूस से संबंध मज़बूत करने को व्यापक पैमाने पर हम यूक्रेन में रूसी हमले से नहीं जोड़ सकते हैं. दोनों देशों के बीच संबंध में इस तरह की गर्मजोशी कभी भी आ सकती थी.''

चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने एक लिखित बयान में कहा था, ''चीन और रूस एक दूसरे के रणनीतिक साझीदार हैं. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध गुट-निरपेक्षता, टकराव रहित और किसी तीसरे पक्ष को नुक़सान नहीं पहुँचाने के सिद्धांत पर आधारित है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.