अबू मोहम्मद अल-जुलानी: सीरिया के शहरों पर कब्ज़ा करने वाले विद्रोही गुट के नेता कौन हैं?

    • Author, बीबीसी न्यूज़ अरबी, बीबीसी मॉनिटरिंग और बीबीसी एक्सप्लेनर्स

सीरिया के प्रमुख शहर अलेप्पो पर इस्लामी चरमपंथी ग्रुप हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएएस) का कब्ज़ा हो गया है.

एचटीएस के नेतृत्व में अन्य चरमपंथियों ने हमा शहर पर भी कब्ज़ा कर लिया है.

एचटीएस के प्रमुख अबू मोहम्मद अल-जु़लानी पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं.

हाल के सालों में वो दुनिया के सामने अपना उदारवादी चेहरा पेश करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन अमेरिका ने उन्हें पकड़ने के लिए एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है.

अबू मोहम्मद अल-जुलानी कौन हैं?

अबू मोहम्मद अल-जुलानी एक उपनाम है. उनका असली नाम और उम्र विवादित है.

अमेरिकी ब्रॉडकास्टर पीबीएस ने फ़रवरी 2021 में अल-ज़ुलानी का इंटरव्यू किया था.

उस वक्त जुलानी ने बताया था कि जन्म के समय उनका नाम अहमद अल-शारा था और वो सीरियाई हैं. उनका परिवार गोलान इलाक़े से आया था.

उन्होंने कहा था कि उनका जन्म सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुआ था, जहां उनके पिता काम करते थे. लेकिन वो खुद सीरिया की राजधानी दमिश्क में पले बढ़े हैं.

हालांकि ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि उनका जन्म पूर्वी सीरिया के दैर एज़-ज़ोर में हुआ था और ऐसी भी अफ़वाहें हैं कि इस्लामी चरमपंथी बनने से पहले उन्होंने मेडिसिन की पढ़ाई की थी.

संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ की रिपोर्टों के अनुसार, उनका जन्म 1975 से 1979 के बीच हुआ था.

इंटरपोल का कहना है कि उनका जन्म 1979 में हुआ था. जबकि अस-सफ़ीर की रिपोर्ट में उनका जन्म 1981 बताया गया है.

अल-जुलानी कैसे इस्लामी समूह के नेता बने?

माना जाता है कि साल 2003 में अमेरिका और गठबंधन सेनाओं के इराक़ पर हुए हमले के बाद, अल-जुलानी वहां मौजूद जिहादी ग्रुप अल-क़ायदा के साथ जुड़ गए थे.

अमेरिका की अगुवाई वाली गठबंधन सेना ने राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और उनकी बाथ पार्टी को सत्ता से हटा दिया था लेकिन उन्हें विभिन्न चरमपंथी समूहों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा.

साल 2010 में इराक़ में अमेरिकी सेना ने अल-जुलानी को गिरफ़्तार कर लिया और कुवैत के पास स्थित जेल कैंप बुका में बंदी बनाए रखा.

माना जाता है कि यहां उनकी मुलाक़ात उन जिहादियों से हुई होगी, जिन्होंने इस्लामिक स्टेट (आईएस) ग्रुप का गठन किया था. यहां इराक़ में आगे चल कर आईएस के नेता बने अबू बक्र अल-बग़दादी से भी उनकी मुलाक़ात हुई होगी.

अल-जुलानी ने मीडिया को बताया कि जब 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ सीरिया में हथियारबंद संघर्ष शुरू हुआ तो अल-बग़दादी ने उन्हें वहां ग्रुप की एक शाखा शुरू करने के लिए भेजने का इंतज़ाम किया.

इसके बाद अल-जुलानी एक हथियारबंद ग्रुप नुसरा फ़्रंट (या जबहत अल-नुसरा) के कमांडर बन गए, जिसका गोपनीय संबंध इस्लामिक स्टेट से था. जंग के मैदान में इसने काफ़ी कामयाबियां हासिल कीं.

साल 2013 में अल-जुलानी ने नुसरा फ़्रंट का संबंध आईएस से तोड़ लिया और इसे अल-क़ायदा के मातहत ला दिया.

हालांकि, साल 2016 में उन्होंने एक रिकॉर्डेड संदेश में अल-क़ायदा से भी अलग होने का एलान किया था.

साल 2017 में, अल-ज़ुलानी ने कहा था कि उनके लड़ाकों ने सीरिया के अन्य विद्रोही ग्रुपों के साथ विलय कर लिया है और हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) का गठन किया.

अल-ज़ुलानी इस पूरे ग्रुप को कमांड करते हैं.

अल-ज़ुलानी किस प्रकार के नेता हैं?

अल-जुलानी के नेतृत्व में एचटीएस, उत्तर-पश्चिम सीरिया में इदलिब और आसपास के इलाक़ों में सक्रिय प्रमुख विद्रोही ग्रुप बन गया.

जंग से पहले इस शहर की आबादी 27 लाख हुआ करती थी. कुछ अनुमानों के अनुसार, विस्थापित लोगों के आने से एक समय शहर की आबादी 40 लाख तक पहुंच गई थी.

यह ग्रुप इदलिब प्रांत में 'सैल्वेशन गवर्नमेंट' को नियंत्रित करता है. यह स्वास्थ्य, शिक्षा और आंतरिक सुरक्षा मुहैया कराने में स्थानीय प्रशासन की तरह काम करता है.

साल 2021 में ही अल-ज़ुलानी ने पीबीएस को बताया था कि उन्होंने अल-क़ायदा की वैश्विक जिहाद वाली रणनीति का अनुसरण नहीं किया.

उन्होंने कहा था कि उनका मुख्य मकसद सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बाहर करना था और ये भी कि, 'अमेरिका और पश्चिम का भी यही मकसद था.'

उन्होंने कहा, "यह क्षेत्र यूरोप और अमेरिकी की सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं पैदा करता. यह क्षेत्र, विदेशी जिहाद को अंजाम देने का मंच नहीं है."

साल 2020 में, एचटीएस ने इदलिब में अल-क़ायदा के ठिकानों को बंद कर दिया, हथियार ज़ब्त कर लिए और इसके कुछ नेताओं को जेल में डाल दिया.

इसने इदलिब में इस्लामिक स्टेट की सक्रियता पर भी अंकुश लगा दिया.

एचटीएस ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में इस्लामी क़ानून लागू किया है, लेकिन अन्य जिहादी ग्रुपों के मुक़ाबले इसमें बहुत कम कड़ाई की जाती है.

यह सार्वजनिक रूप से ईसाइयों और ग़ैर मुस्लिमों के साथ संपर्क करता है. अपने 'अधिक' उदारवादी रुख़ को लेकर जिहादी ग्रुपों की आलोचना के निशाने पर रहा है.

हालांकि मानवाधिकार संगठनों ने एचटीएस पर जनता के विरोध प्रदर्शनों को दबाने और मानवाधिकार उल्लंघनों का आरोप लगाया है.

अल-जुलानी ने इन आरोपों से इनकार किया है.

एचटीएस को पश्चिम और मध्य पूर्व की सरकारों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा चरमपंथी संगठन के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

क्योंकि अल-जुलानी का अतीत अल क़ायदा से जुड़ा रहा है. उनकी ग़िरफ़्तारी के लिए सूचना देने के लिए अमेरिका सरकार ने उन पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रख रखा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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