कोलेस्ट्रॉल ठीक हो तो भी हो सकता है हार्ट अटैक, ख़तरे को कैसे पहचानें और कैसे बचें

    • Author, शुभ राणा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

क्या आप यह जानते हैं कि भारत में दिल से जुड़ी बीमारियां मौत की बड़ी वजहों में शामिल हैं. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ स्टडी के मुताबिक, हर चार में से एक मौत इन्हीं बीमारियों से होती है.

दिल की बीमारियों से होने वाली 80% से ज़्यादा मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक की वजह से होती हैं.

वैसे दिल के मामले में आम धारणा यह है कि अगर कोलेस्ट्रॉल का स्तर सही है तो सब ठीक ही होगा. लेकिन सिर्फ़ कोलेस्ट्रॉल का स्तर सामान्य होने से क्या यह मान लेना चाहिए कि हमारा दिल भी स्वस्थ होगा?

हमने इस आर्टिकल में यही जानने की कोशिश की है कि कोलेस्ट्रॉल के अलावा वे कौन से संकेत और फ़ैक्टर हैं, जो दिल के दौरे की चेतावनी पहले ही दे सकते हैं और सर्दियों में किस तरह हम दिल का ख़्याल रख सकते हैं.

बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सर्दियों में ख़तरे

अब चूंकि सर्दियां चल रही हैं तो सबसे पहले बात सर्दियों में ख़तरे की.

अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के प्रमुख जर्नल जेएसीसी में 2024 में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ. इसे यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी (ESC) कांग्रेस 2024 में पेश किया गया था. इसमें कहा गया कि बहुत ठंडे मौसम और अचानक आने वाली ठंडी लहरें हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ा देती हैं.

इस अध्ययन के मुताबिक, खास बात यह है कि यह ख़तरा ठंड पड़ते ही नहीं, बल्कि 2 से 6 दिन बाद सबसे ज़्यादा होता है.

इसी तरह अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, हर साल क्रिसमस और नए साल के आसपास हार्ट अटैक और दिल से जुड़ी मौतों के मामले सबसे ज़्यादा दर्ज किए जाते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि ठंड, लाइफ़ स्टाइल में बदलाव और शारीरिक प्रतिक्रियाओं का यह मेल दिल पर अतिरिक्त दबाव डालता है.

मेदांता मूलचंद हार्ट सेंटर के एसोसिएट डायरेक्टर एवं हेड प्रोफेसर डॉक्टर तरुण कुमार से हमने पूछा कि सर्दियों में हार्ट अटैक का ख़तरा क्यों बढ़ जाता है?

वह कहते हैं कि सर्दियों में हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ने के पीछे मुख्य रूप से चार कारण होते हैं…जब मौसम ठंडा होता है, तो शरीर खुद को गर्म रखने के लिए रक्त वाहिकाओं और नसों को सिकोड़ने लगता है. इससे दिल की मुख्य नसें (कोरोनरी आर्टरी) भी सिकुड़ जाती हैं. नतीजा यह होता है कि दिल तक खून और ऑक्सीजन कम पहुंच पाता है.

सर्दी में पसीना कम आता है और लोग कम चलते-फिरते हैं. इससे शरीर में प्लाज्मा बढ़ जाता है, यानी कुल खून की मात्रा बढ़ जाती है. इससे ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन तेज़ हो सकती है जिससे दिल पर ज़्यादा बोझ पड़ता है.

ठंड में शरीर का मेटाबॉलिज्म थोड़ा धीमा हो जाता है. लोग अनजाने में ज़्यादा कैलोरी वाले खाना खाने लगते हैं- जैसे गाजर का हलवा, गजक, मूंगफली, तले हुए पकोड़े वगैरह. साथ ही बाहर घूमना-फिरना या व्यायाम कम हो जाता है. इससे वजन और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का ख़तरा ज़्यादा हो जाता है.

सर्दियों में शरीर के हॉर्मोन्स में कुछ बदलाव आते हैं, जिससे खून में थक्का (क्लॉट) बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. अगर यह थक्का दिल की नसों में फंस जाए तो नस ब्लॉक हो सकती है और हार्ट अटैक हो सकता है.

मेट्रो हॉस्पिटल, नोएडा के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी डायरेक्टर डॉक्टर समीर गुप्ता कहते हैं, "जिन लोगों को पहले से हाइपरटेंशन है या हृदय संबंधी दिक्कतें हैं, उनके लिए सर्दियों में ज़्यादा सूप या नमक वाली चीज़ें खाना ख़तरनाक हो सकता है. ज़्यादा नमक से ब्लड प्रेशर बढ़ता है और हार्ट फेलियर का रिस्क बढ़ जाता है."

सर्दियों में कैसे रखें दिल का ख़्याल

डॉक्टर समीर गुप्ता के अनुसार, इस मौसम में कम एक्टिविटी, ज़्यादा तली-भुनी चीजें और तनाव भी दिल के लिए हानिकारक हैं.

वह कहते हैं, "वज़न नियंत्रित रखें, क्योंकि अतिरिक्त वज़न दिल पर बोझ डालता है. तनाव कम करने के लिए रोज़ योग, ध्यान करें और 7-8 घंटे की नींद लें."

खाने में तली-भुनी चीजें जैसे पकोड़े, समोसे को कम करें. इनकी जगह फल, सब्जियां, दालों को चुनें. ज़्यादा नमक-चीनी से बचें. युवाओं में बढ़ते दिल के मामलों पर वह धूम्रपान और शराब छोड़ने की सलाह देते हैं.

ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच करवाएं और अगर सीने में दर्द, सांस फूलना या चक्कर आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

इन छोटे-छोटे बदलावों से सर्दियों में भी हार्ट अटैक का ख़तरा काफी कम किया जा सकता है.

हार्ट अटैक के लक्षण

2025 की आईसीएमआर और एम्स के एक अध्ययन में युवाओं की अचानक मौतों का सबसे बड़ा कारण दिल से जुड़ी बीमारियां बताई गई हैं. दिल की मौतों में 85% मामलों में धमनियों में चर्बी जमने (कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़) से हार्ट अटैक होना सबसे प्रमुख वजह बताई गई है.

डॉक्टर तरुण कुमार कहते हैं, "भारत में अब हार्ट अटैक के मामले युवाओं में भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं. 50 साल से कम उम्र के लोगों में हार्ट अटैक आम हो गया है. कुल मामलों में 25-30% केस 40 साल से कम उम्र के युवाओं के होते हैं."

ज़रूरी है कि आपको हार्ट अटैक के लक्षण पता हों ताकि आप तुरंत मेडिकल सहायता ले पाएं.

छाती के बाईं तरफ़ या बीच में दर्द, भारीपन, दबाव या जलन जैसा महसूस होना,

दर्द पेट के ऊपरी हिस्से से निचले हिस्से तक फैल सकता है,

दर्द बाएं ऊपरी बाजू (आर्म) में भी जा सकता है,

साथ ही घबराहट होना, पसीना छूटना, चक्कर आना और सांस फूलना भी आम लक्षण हैं.

डॉक्टर तरुण कुमार कहते हैं, "अगर आपको ऐसे कोई लक्षण महसूस हों, तो बिल्कुल देर न करें तुरंत मेडिकल मदद लें."

डॉक्टर तरुण कुमार बताते हैं, "ज़रूरी नहीं कि हर किसी को छाती में दर्द ही हो. कई लोगों को सिर्फ़ बेवजह सांस फूलना (अनएक्सप्लेन्ड डिस्प्निया) होता है. ऐसे में अपनी गतिविधियां खुद से सीमित करने की बजाय, तुरंत डॉक्टर से सलाह लें. ये लक्षण नज़रअंदाज़ करने से ख़तरा बड़ा हो सकता है.

साइलेंट फ़ैक्टर्स

अब हम आते हैं उस प्रश्न की तरफ़ कि कोलेस्ट्रॉल के अलावा ऐसे कौन से मार्कर्स हैं जिन्हें साइलेंट फ़ैक्टर्स भी कहा जाता है और ये दिल की बीमारियों का ख़तरा पहले से बता देते हैं.

डॉक्टर समीर गुप्ता के अनुसार ये हैं…

एपो बी लेवल : ये हर ख़राब कोलेस्ट्रॉल पार्टिकल पर मौजूद होता है. एपो बी खून में ख़राब पार्टिकल्स की सही संख्या बताता है और दिल की बीमारियों का ख़तरा बेहतर तरीके से आंकता है.

लिपोप्रोटीन (ए) लेवल: ये एक जेनेटिक फ़ैक्टर है, जो जन्म से तय होता है और इसे ज़्यादा बदला नहीं जा सकता. साउथ एशियाई लोगों (जैसे भारतीयों) में इसका लेवल अक्सर ज़्यादा होता है, जिसकी वजह से दिल की बीमारियों और हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है.

हीमोग्लोबिन ए1सी : ये ब्लड टेस्ट पिछले 2-3 महीनों की औसत ब्लड शुगर बताता है. इसका लेवल ज़्यादा होने से डायबिटीज़ के अलावा भी दिल की बीमारियों का ख़तरा अलग से बढ़ जाता है.

डॉक्टर तरुण कुमार के अनुसार, हार्ट अटैक के खतरे का पता लगाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पैरामीटर और टेस्ट हैं. इन्हें चेक करके आप पहले से ही सतर्क हो सकते हैं.

मुख्य पैरामीटर जो हमेशा नॉर्मल रखें:

वजन और बीएमआई: बीएमआई (18.5 से 24.9) के बीच होना चाहिए.

कोलेस्ट्रॉल लेवलः एलडीएल (बैड कोलेस्ट्रॉल) - 100 mg/dL से नीचे रखें. इससे हार्ट अटैक का ख़तरा काफी कम हो जाता है

एचडीएल (गुड कोलेस्ट्रॉल) - आमतौर पर 50 mg/dL तक नॉर्मल माना जाता है

हाई सेंसिटिव सी-रिएक्टिव प्रोटीन: ये शरीर में धमनियों की सूजन (वैस्कुलर इन्फ्लेमेशन) को मापता है. अगर कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल भी है, लेकिन यह ज़्यादा है, तो धमनियों में जमा कोलेस्ट्रॉल के प्लेक फटने (रप्चर) का ख़तरा बढ़ जाता है. खासकर स्ट्रेस या अचानक ज़ोरदार व्यायाम के समय क्लॉट बन सकता है और हार्ट अटैक हो सकता है.

रिस्क कैलकुलेशन के तरीके

फ्रेमिंगहम रिस्क कैलकुलेटर: इससे अगले 10 साल में हार्ट अटैक का ख़तरा पता चलता है. इसमें उम्र, लिंग, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर जैसे फै़क्टर देखे जाते हैं. अगर रिस्क 5% से ज़्यादा आता है, तो डॉक्टर दवाइयां देने पर विचार कर सकते हैं.

कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम स्कोर: ये सीटी स्कैन से किया जाता है. स्कोर जितना ज़्यादा ज़ीरो से ऊपर, हार्ट अटैक का ख़तरा उतना ही बढ़ जाता है.

डॉक्टर तरुण कुमार कुछ अन्य ज़रूरी टेस्ट भी सुझाते हैं. वह बताते हैं, "अगर आपको डायबिटीज़ या दूसरी समस्या का शक है, तो ईसीजी, ईसीएचओ और टीएमटी (ट्रेडमिल टेस्ट) करवाएं. टीएमटी में चलते समय ईसीजी जुड़ा होता है, जो शुरुआत में ही समस्या पकड़ लेता है."

वह कहते हैं कि मौजूदा समय में कम उम्र से ही सतर्क रहना जरूरी है. 18-20 साल की उम्र में कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर चेक करवाएं और साथ ही 30-35 साल की उम्र में फ्रेमिंगहम रिस्क कैलकुलेटर, कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम स्कोर और टीएमटी करवाएं जिससे पहले से ही आप सतर्क रह सकें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)