होर्मुज़ स्ट्रेट में भारतीय झंडे वाले जहाज़ों पर हमलाः भारत के पास क्या हैं विकल्प?

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होर्मुज स्ट्रेट में जारी तनाव के बीच दो भारतीय जहाजों पर गोलीबारी की घटना ने भारत के लिए स्थिति जटिल कर दी है.
भारत ने इस घटनाक्रम के बाद दिल्ली में ईरान के राजदूत मोहम्मद फ़थाली को बुलाया और गंभीर चिंता जताई.
भारत के विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक़, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी राजदूत के साथ बैठक के दौरान समुद्री सुरक्षा और नेविगेशन की स्वतंत्रता के महत्व पर भी ज़ोर दिया.
भारत ने ईरान से अपील भी की है कि भारत की ओर आने वाले जहाज़ों के लिए होर्मुज़ स्ट्रेट में सुरक्षित और बिना रुकावट आवाजाही बहाल की जाए.
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत अपने जहाज़ों को सुरक्षित वापस लाने के लिए ईरान और अन्य देशों के संपर्क में है.
वहीं भारत में ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा, "ईरान और भारत का रिश्ता बहुत मज़बूत है और मुझे इस घटना के बारे में जानकारी नहीं है. हम उम्मीद करते हैं कि सब ठीक होगा और यह मामला सुलझ जाएगा."
शनिवार को व्हाइट हाऊस में जब बीबीसी की सहयोगी सीबीसी न्यूज़ ने इस घटनाक्रम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से सवाल किया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया.
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ में क्या हुआ?

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शनिवार को टैंकरों की आवाजाही पर निगरानी रखने वाली वेबसाइट टैंकर ट्रैकर्स ने दावा किया था कि आईआरजीसी की नौसेना ने दो भारतीय जहाज़ों को होर्मुज़ स्ट्रेट से पीछे हटने के लिए मजबूर किया था. ये दावा भी किया गया है कि इस घटनाक्रम के दौरान ‘गोलीबारी’ भी हुई.
हालांकि, ऐसे कोई संकेत नहीं है कि जहाज़ों को ख़ासतौर से भारतीय होने की वजह से निशाना बनाया गया.
वहीं बीबीसी वेरीफ़ाई की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जब होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोला जा रहा था भारतीय झंडे वाले दो जहाज़ों, कार्गो शिप जग अर्नव और तेल टैंकर सनमार हेराल्ड, को ईरान की आईआरजीसी ने अपने निर्धारित मार्ग से हटने के आदेश दिए.
यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेसंश के मुताबिक़, आईआरजीसी ने एक जहाज़ पर गोलीबारी भी की.
मैरीटाइम ट्रैफ़िक पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइटों के मुताबिक़, इस घटना के बाद भारतीय जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट से पीछे की तरफ़ हट गए.
तेल टैंकर सनमार हेराल्ड भारत के लिए तेल लेकर आ रहा था.
इस घटनाक्रम से एक दिन पहले ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने जानकारी दी थी कि स्ट्रेट को ट्रैफ़िक के लिए खोल दिया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसका स्वागत किया था.
हालांकि, अमेरिका की ओर से होर्मुज़ स्ट्रेट में नाकाबंदी जारी रही. इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट को फिर से बंद करने की घोषणा कर दी थी.
संकट के बीच होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़र चुके हैं भारतीय जहाज़

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फ़रवरी के अंत में अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमले के बाद शुरू हुए होर्मुज़ संकट के बीच अब तक कम से कम दस भारतीय जहाज़ होर्मुज़ को पार कर चुके हैं.
भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, शुक्रवार को भी भारतीय झंडे वाला एक तेल टैंकर होर्मुज़ से गुज़रने में कामयाब रहा था.
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, चालक दल के 31 सदस्यों के साथ तेल टैंकर देश गरिमा होर्मुज़ से निकलकर मुंबई की तरफ़ बढ़ रहा है.
शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, इस संकट के दौरान होर्मुज़ से गुज़रने वाला यह दसवां भारतीय जहाज है.
हालांकि, ये जहाज़ रह-रहकर ही होर्मुज़ से गुज़र पाए हैं और इस अहम समुद्री मार्ग पर ईरान की कड़ी नाकेबंदी है.
भारत अपनी कुल तेल ज़रूरतों का लगभग 85 फ़ीसदी आयात करता है और इनमें से 55-60 फ़ीसदी तक कच्चा तेल खाड़ी देशों से आता है, जिनका प्रमुख मार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट ही है.
होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है और दुनिया का बीस फ़ीसदी कच्चा तेल इसी मार्ग से गुज़रता है.
ऐसे में, होर्मुज़ की स्थिति का सीधा असर भारत पर पड़ता है
भारत के पास आगे क्या विकल्प

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भारत ने शनिवार के घटनाक्रम के बाद ईरानी राजदूत को तलब कर अपनी चिंता ज़ाहिर की है. लेकिन ये सवाल बना हुआ है कि ऐसी स्थिति में भारत के पास और क्या विकल्प हो सकते हैं.
विश्लेषक मान रहे हैं कि भारत ने सोची-समझी रणनीति के तहत ईरान की कार्रवाई के बाद संतुलित और नपी-तुली प्रतिक्रिया दी है. विश्लेषकों के मुताबिक़ इस समय भारत की प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा है और भारत के लिए विकल्प सीमित हैं.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष वी पंत इस स्थिति की वास्तविकता की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं, “होर्मुज़ स्ट्रेट की मौजूदा स्थिति में सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी देश के पास विकल्प बहुत सीमित हैं. अमेरिका और ईरान को छोड़कर दुनिया के अन्य देश यहां बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.”
विश्लेषक मान रहे हैं कि मौजूदा टकराव में बहुत कुछ सिर्फ़ अमेरिका और ईरान के हाथ में है और भारत समेत दुनिया के बाक़ी देश ना ही इसके प्रभाव को कम करने की स्थिति में है और ना ही इसे नियंत्रित करने की. रक्षा विश्लेषक उदय भास्कर मानते हैं कि मौजूदा स्थिति में कूटनीति ही भारत के पास सबसे अधिक संभावनाओं वाला विकल्प है.
उदय भास्कर कहते हैं, “भारत के पास सबसे बेहतर विकल्प कूटनीति का है, मौजूदा सैन्य हालात में बातचीत ही भारत के लिए एकमात्र रास्ता दिखाई देता है.”
होर्मुज़ के बेरोकटोक इस्तेमाल की मांग

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होर्मुज़ संकट के बीच भारत ने लगातार ईरान से बातचीत करने का प्रयास किया है और ईरान से फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन के सिद्धांत का हवाला देते हुए, होर्मुज़ के इस्तेमाल की मांग की है.
फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन समुद्री क़ानून का एक मौलिक सिद्धांत है जिसका मतलब है कि किसी स्वतंत्र देश का जहाज़ दूसरे देशों के हस्तक्षेप के बिना समुद्र में यात्रा कर सकता है.
यह सिद्धांत 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी' (यूएनसीएलओएस-1982) पर आधारित है.
यूएनसीएलओएस के तहत समुद्र को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है.
समुद्री नेविगेशन का सबसे बड़ा हिस्सा है हाई सीज़ यानी खुला समुद्र. ये किसी भी देश की सीमा से बाहर होता है और इसमें सभी देशों को अपने जहाज़ों को चलाने की इजाज़त होती है.
इसके बाद एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन यानी ईईज़ेड आते हैं.
यह देश के तटीय इलाक़े से समुद्र में 200 नॉटिकल मील तक होता है. इस क्षेत्र में तटीय देश को मछली पकड़ने, तेल-गैस जैसे संसाधन निकालने की स्वतंत्रता होती है.
इसके बाद टेरिटोरियल वॉटर्स होतें है. ये समुद्र में वो इलाक़ा होता है जो तट से 12 नॉटिकल मील तक होता है. यहां अधिकार तो तटीय देश का होता है लेकिन विदेशी जहाज़ों को यहां से निकलने का अधिकर होता है जिसे 'इनोसेंट पैसेज' कहा जाता है.
इसका मतलब ये है कि जहाज यहां से शांति से यानी तटीय देश की स्वतंत्रता या संप्रभुता को ख़तरा पहुंचाए बिना गुज़र सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय जलडमरुमध्य जैसे कि होर्मुज़ स्ट्रेट के लिए नियम अलग हैं. दो ईईज़ेड को जोड़ने वाले स्ट्रेट में ट्रांज़िट पैसेज लागू होता है. यानी सभी जहाज़ों को यहां निरंतर और तेज़ी से गुज़रने का अधिकार होता है.
इसी लॉ के तहत होर्मुज़ स्ट्रेट के मामले में ईरान या ओमान को किसी जहाज़ को रोकने या परिवहन को निलंबित या बाधित करने का अधिकार नहीं है.
होर्मुज़ स्ट्रेट के मामले में इंटरनेशनल मेरीटाइम ऑर्गेनाइज़ेशन ने भी यही कहा है. लेकिन ईरान ने युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया है और इस क़दम का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर पड़ा है.
विश्लेषक मानते हैं कि भारत यदि अंतरराष्ट्रीय क़ानून लागू करने की मांग करता भी है तो ये सवाल उठेगा कि उसे लागू कौन करेगा?
उदय भास्कर कहते हैं, “अगर अंतरराष्ट्रीय क़ानून लागू कराने का रास्ता अख़्तियार किया जाता है तो इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा क्योंकि ईरान युद्ध के मामले में अमेरिका और इसराइल ने खुलकर अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन किया है, ऐसे में ईरान से अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को मानने की उम्मीद कैसे की जा सकती है. एक सवाल यह भी है कि इस समय अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लागू करेगा कौन?”
वहीं विश्लेषक यह भी मान रहे हैं कि अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव में दुनिया के बाक़ी देशों की भूमिका बहुत सीमित हो गई है.
हर्ष वी पंत कहते हैं कि इस संकट में सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के बाक़ी देश भी बहुत कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
पंत कहते हैं, “अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में दुनिया के अन्य देशों की भूमिका बहुत ज़्यादा दिखाई देती नहीं है. जब तक अमेरिका और ईरान इस मसले का समाधान नहीं करेंगे, बाक़ी देशों के लिए स्थितियां ऐसे ही जटिल बनीं रहेंगी.”
हालांकि, उदय भास्कर मानते हैं कि भारत ईरान के साथ कूटनीति को और बढ़ावा देकर भी कुछ ना कुछ नतीजे हासिल कर सकता है.
भास्कर कहते हैं, “भारत के पास अभी भी बहुत संभावनाएं हैं. भारत ईरान के साथ द्विपक्षीय वार्ता को बढ़ावा दे सकता है, ब्रिक्स जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल तनाव कम करने के लिए कर सकता है. भारत को कूटनीति के रास्ते पर ही आगे बढ़ना चाहिए.”
क्या जहाज़ों को एस्कॉर्ट कर सकता है भारत?

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भारत ने होर्मुज़ संकट के बीच इसी साल मार्च में ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा शुरू किया था. इस ऑपरेशन के तहत भारत के अग्रिम पंक्ति के पांच से अधिक युद्धक जहाज़ ओमान की खाड़ी और फ़ारस की खाड़ी में हैं.
भारत ने ईरानी एजेंसियों के साथ समन्वय बनाते हुए एलपीजी से लदे जहाज़ों को भारतीय नौसेना की सुरक्षा में होर्मुज़ से निकाला है. क्या भारत मौजूदा संकट के बीच होर्मुज़ से भारतीय नौसेना के जहाज़ों को भेज सकता है. विश्लेषकों के मुताबिक़ इसका सीधा जवाब है ना.
उदय भास्कर कहते हैं, “सैन्य तरीक़े से होर्मुज़ से जहाज़ों से निकालना संभव नहीं है. ये संभावना ज़रूर है कि होर्मुज़ से बाहर निकलने के बाद भारतीय नौसेना अपनी सुरक्षा में जहाज़ों को लेकर भारत आए.”
भास्कर कहते हैं, “सैन्य विकल्प ना सिर्फ़ बहुत सीमित है बल्कि बहुत अधिक जोख़िम भरे भी हैं. यदि ऐसा कोई क़दम उठाया जाता है तो इसके नतीजे नकारात्मक ही होंगे.”
भास्कर कहते हैं, “यहां समुद्री माइन भी बिछाई गई हैं, ऐसे में ये इलाक़ा सिर्फ़ मालवाहक जहाज़ों के लिए ही नहीं बल्कि युद्धक जहाज़ों के लिए भी बहुत ख़तरनाक है.”
वहीं हर्ष वी पंत का मानना है कि इस समय होर्मुज़ पर ईरान की पकड़ इतनी मज़बूत है कि दुनिया की किसी भी नौसेना के लिये उसे तोड़कर बाहर निकलना बहुत मुश्किल है.
पंत कहते हैं, “ईरान की पकड़ इतनी स्ट्रॉन्ग है कि आपकी कितनी भी क्षमताएं हों, वहां उनकी सीमाएं सामने आ जाती है…कोई भी देश वहां स्वतंत्र ऑपरेशन नहीं चला पा रहा है.”
इसका एक कारण होर्मुज़ की भौगोलिक स्थिति भी है. पंत कहते हैं, “वहां की भौगोलिक स्थिति और मैपिंग ही ऐसी है कि वहां आसानी से कोई बाहरी हस्तक्षेप संभव नहीं है. ”
हर्ष पंत मानते हैं कि जब तक अमेरिका-ईरान के बीच कोई समझौता नहीं होगा तब तक हालात ऐसे ही बनें रहेंगे.
पंत कहते हैं, “जब तक अमेरिका और ईरान के बीच सहमति नहीं बनती, तब तक ईरान को अपनी पकड़ ढीली करने से कोई लाभ नहीं है.”
मौजूदा स्थिति में सुधार की उम्मीद भी कम दिखाई देती है . उदय भास्कर कहते हैं, “यदि ईरान को किनारे लगाया जाएगा, अलग-थलग किया जाएगा तो ऐसी और भी घटनाएं भविष्य में हो सकती हैं”
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