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इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष: 100 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी
इसराइल पर शनिवार को ग़ज़ा से औचक और बड़ा हमला हुआ. इसके बाद इसराइल की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई और एक पुराने विवाद में तनाव और हिंसा की नई लपटें उठने लगीं.
इसराइल पर हमले की ज़िम्मेदारी फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट हमास ने ली है, हमास ने जितने बड़े पैमाने पर इसराइल पर हमला बोला है, उसे 'अभूतपूर्व' कहा जा रहा है.
हमास का दावा है कि उसने शनिवार तड़के इसराइल पर 5000 रॉकेट दागे. इसराइल के कई शहरों में जानमाल का काफ़ी नुकसान हुआ है.
अधिकारियों ने कहा है कि हमले में 100 इसराइली नागरिकों की मौत हुई है और 985 से अधिक लोग घायल हुए हैं.
जवाबी कार्रवाई में इसराइली ने ग़ज़ा पट्टी में हमास के 17 सैन्य ठिकानों और 4 हेडक्वार्टर पर हवाई हमला किया जिसमें, स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक 198 फ़लस्तीनी मारे गए हैं और 1,000 से अधिक घायल हुए हैं.
इसराइल और फ़लस्तीन के बीच बीते कई दशकों से विवाद चल रहा है. इसे लेकर कई बार युद्ध भी हुए और युद्ध जैसे हालात भी पैदा हुए.
ये विवाद सौ साल पुराना है जब यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग उठी. आईए जानते हैं इस विवाद की जड़ क्या थी और कब कब क्या हुआ.
100 साल पुराना विवाद
बीसवीं सदी की शुरुआत में यूरोप में यहूदियों को निशाना बनाया जा रहा था. इन हालात में यहूदी लोगों के लिए एक अलग देश की मांग ज़ोर पकड़ने लगी. भूमध्य सागर और जॉर्डन नदी के बीच पड़ने वाला फ़लस्तीन का इलाक़ा मुसलमानों, यहूदियों और ईसाई धर्म, तीनों के लिए पवित्र माना जाता था. इस इलाक़े पर ऑटोमन साम्राज्य का नियंत्रण था और ये ज़्यादातर अरबों और दूसरे मुस्लिम समुदायों के क़ब्ज़े में रहा.
इस सब के बीच यहाँ यहूदी लोग बड़ी संख्या में आकर बसने लगे और स्थानीय लोगों में उन्हें लेकर विरोध शुरू हो गया.
पहले विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य का विघटन हो गया और ब्रिटेन को राष्ट्र संघ की ओर से फ़लस्तीन का प्रशासन अपने नियंत्रण में लेने की मंज़ूरी मिल गई.
लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के पहले और लड़ाई के दौरान अंग्रेज़ों ने अरबों और यहूदी लोगों से कई वायदे किए थे जिसका वे थोड़ा सा हिस्सा भी पूरा नहीं कर पाए. ब्रिटेन ने फ्रांस के साथ पहले ही मध्य पूर्व का बँटवारा कर लिया था. इस वजह से अरब लोगों और यहूदियों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई और दोनों ही पक्षों के सशस्त्र गुटों के बीच हिंसक झड़पों की शुरुआत हो गई.
द्वितीय विश्व युद्ध और नाज़ियों के हाथों यहूदियों के व्यापक जनसंहार के बाद यहूदियों के लिए अलग देश की मांग को लेकर दबाव बढ़ने लगा. उस वक्त ये योजना बनी कि ब्रिटेन के नियंत्रण वाले इलाक़े को फ़लस्तीनियों और यहूदियों के बीच बाँट दिया जाएगा.
1948 के बाद की स्थिति
1947 में संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन को यहूदियों और अरबों के अलग-अलग राष्ट्र में बाँटने को लेकर मतदान हुआ और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया.
इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया जबकि अरब पक्ष ने इसको ख़ारिज कर दिया और यह कभी लागू नहीं हो पाया.
1948 में समस्या सुलझाने में असफल होकर ब्रिटिश शासक चले गए.
आख़िरकार 14 मई, 1948 को इसराइल की स्थापना हो गई. और इसराइल के गठन के साथ ही एक स्थानीय तनाव क्षेत्रीय विवाद में बदल गया. अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक़ ने इस इलाक़े पर हमला कर दिया. ये पहला अरब-इसराइल संघर्ष था. इसे ही यहूदियों का स्वतंत्रता संग्राम भी कहा गया था. इस लड़ाई के ख़त्म होने के बाद संयुक्त राष्ट्र ने एक अरब राज्य के लिए आधी ज़मीन मुकर्रर की.
फ़लस्तीनियों के लिए वहीं त्रासदी का दौर शुरू हो गया. साढ़े सात लाख फलस्तीनियों को भागकर पड़ोसी देशों में पनाह लेनी पड़ी या फिर यहूदी सशस्त्र बलों ने उन्हें बेदखल कर दिया.
लेकिन साल 1948 यहूदियों और अरबों के बीच कोई आख़िरी संघर्ष नहीं था. साल 1956 में स्वेज़ नहर को लेकर विवाद हुआ और इसराइल और मिस्र फिर एक दूसरे के सामने खड़े हो गए. लेकिन ये मामला मैदान-ए-जंग से बाहर सुलझा लिया गया.
लेकिन साल 1967 में छह दिनों तक चला अरब-इसराइल संघर्ष एक तरह से आखिरी बड़ी लड़ाई थी. उस साल पाँच जून से दस जून के बीच जो कुछ हुआ, उसका दीर्घकालीन प्रभाव कई स्तरों पर देखा गया.
अरब देशों के सैनिक गठबंधन पर इसराइल को जीत मिली. ग़ज़ा पट्टी, मिस्र का सिनाई प्रायद्वीप, जॉर्डन से वेस्ट बैंक (पूर्वी यरूशलम सहित) और सीरिया से गोलन पहाड़ी उसके नियंत्रण में आ गए. पाँच लाख फ़लस्तीनी लोग विस्थापित हो गए.
आख़िरी अरब-इसराइल संघर्ष साल 1973 का योम किप्पुर युद्ध था. मिस्र और सीरिया ने इसराइल के खिलाफ़ ये जंग लड़ी. मिस्र को सिनाई प्रायद्वीप फिर से हासिल हो गया. साल 1982 में इसराइल ने इस क्षेत्र पर अपना दावा छोड़ दिया लेकिन ग़ज़ा पर नहीं. छह साल बाद मिस्र इसराइल के साथ शांति समझौता करने वाला पहला अरब देश बना. जॉर्डन ने आगे चलकर इसका अनुसरण किया.
इसराइल की स्थापना मध्य पूर्व में क्यों हुई?
यहूदियों का मानना है कि आज जहाँ इसराइल बसा हुआ है, ये वही इलाक़ा है, जो ईश्वर ने उनके पहले पूर्वज अब्राहम और उनके वंशजों को देने का वादा किया था.
पुराने समय में इस इलाक़े पर असीरियों (आज के इराक़, ईरान, तुर्की और सीरिया में रहने वाले क़बायली लोग), बेबीलोन, पर्सिया, मकदूनिया और रोमन लोगों का हमला होता रहा था. रोमन साम्राज्य में ही इस इलाक़े को फ़लस्तीन नाम दिया गया था और ईसा के सात दशकों बाद यहूदी लोग इस इलाक़े से बेदखल कर दिए गए.
इस्लाम के अभ्युदय के साथ सातवीं सदी में फ़लस्तीन अरबों के नियंत्रण में आ गया और फिर यूरोपीय हमलावरों ने इस पर जीत हासिल की. साल 1516 में ये तुर्की के नियंत्रण में चला और फिर पहले विश्व युद्ध तक ब्रिटेन के क़ब्ज़े में जाने तक यथास्थिति बनी रही.
फ़लस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र की एक स्पेशल कमेटी ने तीन सितंबर, 1947 को जेनरल असेंबली को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में कमेटी ने मध्य पूर्व में यहूदी राष्ट्र की स्थापना के लिए धार्मिक और ऐतिहासिक दलीलों को स्वीकार कर लिया.
साल 1917 के बालफोर घोषणापत्र में ब्रिटिश सरकार ने यहूदियों को फ़लस्तीन में 'राष्ट्रीय घर' देने की बात मान ली थी. इस घोषणापत्र में यहूदी लोगों के फ़लस्तीन के साथ ऐतिहासिक संबंध को मान्यता दी गई थी और इसी के आधार पर फ़लस्तीन के इलाक़े में यहूदी राज्य की नींव पड़ी.
यूरोप में नाज़ियों के हाथों लाखों यहूदियों के जनसंहार के बाद और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक अलग यहूदी राष्ट्र को मान्यता देने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा था.
अरब लोगों और यहूदियों के बीच बढ़ते तनाव को सुलझाने में नाकाम होने के बाद ब्रिटेन ने ये मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के विचार के लिए रखा.
29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फ़लस्तीन के बँटवारे की योजना को मंज़ूरी दे दी. इसमें एक अरब देश और यहूदी राज्य के गठन की सिफ़ारिश की गई और साथ ही यरूशलम के लिए एक विशेष व्यवस्था का प्रावधान किया गया.
इस योजना को यहूदियों ने स्वीकार कर लिया लेकिन अरब लोगों ने ख़ारिज कर दिया. वे इसे अपनी ज़मीन खोने के तौर पर देख रहे थे. यही वजह थी कि संयुक्त राष्ट्र की योजना को कभी लागू नहीं किया जा सका.
फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का नियंत्रण समाप्त होने के एक दिन पहले 14 मई, 1948 को स्वतंत्र इसराइल के गठन की घोषणा कर दी गई. इसके अगले दिन इसराइल ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए आवेदन किया और एक साल बाद उसे इसकी मंज़ूरी मिल गई. संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में 83 फ़ीसदी देश इसराइल को मान्यता दे चुके हैं. दिसंबर, 2019 तक 193 देशों में 162 ने इसराइल को मान्यता दे दी थी.
दो फलस्तीनी क्षेत्र क्यों हैं?
फ़लस्तीन पर संयुक्त राष्ट्र की स्पेशल कमेटी ने 1947 में जनरल असेंबली को रिपोर्ट सौंपी थी, उसमें ये सिफ़ारिश की गई थी कि अरब राष्ट्र में वेस्टर्न गैली (समारिया और ज्युडिया का पहाड़ी इलाका) शामिल किया जाए.
कमेटी ने यरूशलम और मिस्र की सीमा से लगने वाले इस्दुद के तटीय मैदान को इससे बाहर रखने की सिफ़ारिश की थी.
लेकिन इस क्षेत्र के बँटवारे को साल 1949 में खींची गई आर्मीस्टाइस रेखा से परिभाषित किया गया. ये रेखा इसराइल के गठन और पहले अरब-इसराइल युद्ध के बाद खींची गई थी.
फ़लस्तीन के ये दो क्षेत्र हैं वेस्ट बैंक (जिसमें पूर्वी यरूशलम शामिल है) और ग़ज़ा पट्टी. ये दोनों क्षेत्र एक दूसरे 45 किलोमीटर की दूरी पर हैं. वेस्ट बैंक का क्षेत्रफल 5970 वर्ग किलोमीटर है तो ग़ज़ा पट्टी का क्षेत्रफल 365 वर्ग किलोमीटर.
वेस्ट बैंक यरूशलम और जॉर्डन के पूर्वी इलाक़े के बीच पड़ता है. यरूशलम को फ़लस्तीनी पक्ष और इसराइल दोनों ही अपनी राजधानी बताते हैं.
ग़ज़ा पट्टी 41 किलोमीटर लंबा इलाक़ा है, जिसकी चौड़ाई 6 से 12 किलोमीटर के बीच पड़ती है.
ग़ज़ा की 51 किलोमीटर लंबी सीमा इसराइल से लगती है, सात किलोमीटर मिस्र के साथ और 40 किलोमीटर भूमध्य सागर का तटवर्ती इलाक़ा है.
ग़ज़ा पट्टी को इसराइल ने साल 1967 की लड़ाई में अपने नियंत्रण में ले लिया था. साल 2005 में इसराइल ने इस पर अपना क़ब्ज़ा छोड़ दिया. हालांकि इसराइल गज़ा पट्टी से लोगों, सामानों और सेवाओं की आमदरफ्त को हवा, ज़मीन और समंदर हर तरह से नियंत्रित करता है.
फ़िलहाल गज़ा पट्टी हमास के नियंत्रण वाला इलाक़ा है. हमास इसराइल का सशस्त्र गुट है जो फ़लस्तीन के अन्य धड़ों के साथ इसराइल के समझौते को मान्यता नहीं देता है.
इसके उलट, वेस्ट बैंक पर फ़लस्तीनी नेशनल अथॉरिटी का शासन है. फ़लस्तीनी नेशनल अथॉरिटी को अंतरराष्ट्रीय समुदाय फ़लस्तीनियों की सरकार के रूप में मान्यता देता है.
फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के बीच विवाद के मुख्य बिंदु क्या हैं?
एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन में देरी, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियाँ बसाने का काम और फ़लस्तीनी क्षेत्र के आस-पास सुरक्षा घेरा, ये वो वजहें हैं जिससे शांति प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है.
हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने फ़लस्तीनी क्षेत्र के आस-पास इसराइल के सुरक्षा घेरे की आलोचना भी की है.
साल 2000 में अमेरिका के कैंप डेविड में जब राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की आख़िरी बार गंभीर कोशिश हुई थी, तभी ये साफ़ हो गया था कि फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के बीच शांति की राह में केवल यही बाधाएँ नहीं है.
उस वक्त इसराइल के प्रधानमंत्री एहुद बराक और यासिर अराफात के बीच बिल क्लिंटन समझौता कराने में नाकाम रहे थे. जिन मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच असहमति थी, वे थीं- यरूशलम, सीमा और ज़मीन, यहूदी बस्तियाँ और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मुद्दा.
इसराइल का दावा है कि यरूशलम उसका इलाक़ा है. उसका कहना है कि साल 1967 में पूर्वी यरूशलम पर कब्जे के बाद से ही यरूशलम उसकी राजधानी रही है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता नहीं मिली हुई है. फ़लस्तीनी पक्ष पूर्वी यरूशलम को अपनी राजधानी बनाना चाहता है.
फ़लस्तीनियों की मांग है कि छह दिन तक चले अरब-इसराइल युद्ध यानी चार जून, 1967 से पहले की स्थिति के मुताबिक़ उसकी सीमाओं का निर्धारण किया जाए जिसे इसराइल मानने से इनकार करता है.
यहूदी बस्तियाँ इसराइल ने क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर बसाई हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत ये अवैध हैं. वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में इन बस्तियों में पाँच लाख से ज़्यादा यहूदी रहते हैं.
फ़लस्तीनी शरणार्थियों की संख्या वास्तव में कितनी है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि कौन इसे गिन रहा है. पीएलओ का कहना है कि इनकी संख्या एक करोड़ से अधिक है. इनमें आधे लोग संयुक्त राष्ट्र के पास रजिस्टर्ड हैं. फ़लस्तीनियों का कहना है कि इन शरणार्थियों को अपनी ज़मीन पर लौटने का हक़ है. लेकिन वो जिस ज़मीन की बात कर रहे हैं, वो आज का इसराइल है और अगर ऐसा हुआ तो यहूदी राष्ट्र के तौर पर उसकी पहचान का क्या होगा.
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