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महिला खिलाड़ियों के लिए कितना ज़रूरी है मैटरनिटी लीव
- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एशिया कप टूर्नामेंट के बीच में भारत के तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह पितृत्व अवकाश (पेटरनिटी लीव) पर चले गए. इसकी काफी चर्चा हुई.
साल 2020 में विराट कोहली को उनकी बेटी के जन्म के समय भी इसी तरह की छुट्टी दी गई थी. बीसीसीआई की ओर से उठाए गए इस कदम की कई लोगों ने तारीफ की. लेकिन अगर कोई भारतीय महिला खिलाड़ी खुद को इसी तरह की स्थिति में पाती है तो क्या होगा? हमने यह जानने की कोशिश की.
शूटिंग की राष्ट्रीय कोच और पूर्व ओलंपियन सुमा शिरूर कहती हैं, ''जब मैं छह महीने की गर्भवती थी तब भी मैंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेला. बच्चा पैदा करने के तत्काल बाद मैंने प्रैक्टिस शुरू कर दी थी, क्योंकि उसी साल राष्ट्रमंडल खेल होने थे.''
सुमा भारत में महिला पथप्रदर्शकों में से एक हैं, जिन्होंने खेल और मातृत्व से जुड़ी रूढ़ियों को तोड़ा. सुमा की शादी 2001 में हुई थी. उस समय वह अपने करियर के शिखर पर थीं. उसी साल सितंबर में उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया.
इसके बाद कई लोगों ने कहा कि उनका करियर खत्म हो गया, लेकिन दो महीने बाद ही सुमा प्रैक्टिस करने लौट आई थीं. उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर खेला और पदक जीते. वो 2004 के ओलंपिक के फाइनल में पहुंचीं थीं.
अब दो दशक से अधिक समय बाद, उन्हें लगता है कि भारत में अभी भी उन खिलाड़ियों के लिए कोई सहायता प्रणाली नहीं है जो बच्चे पैदा करना चाहती हैं.
वो कहती हैं, ''22 साल पहले, मैंने इसे अकेले ही किया था. पहली यात्रा पर मेरी सास मेरे साथ थीं. दूसरी बार मेरी मां ने मेरे साथ यात्रा की. लेकिन आज जब सब कुछ इतना अधिक पेशेवर और प्रतिस्पर्धी है, हमें एक ऐसी प्रणाली की जरूरत है जो मातृत्व और अन्य प्रकार की सहायता के मुद्दे पर ध्यान दे.''
खेल या मातृत्व
स्टेसी पोप ब्रिटेन के डरहम विश्वविद्यालय में लिंग, खेल और असमानता विषय पर शोध करती हैं. वो कहती हैं, "खिलाड़ियों से आम तौर पर मातृत्व और पेशेवर खेल करियर के बीच एक को चुनने की उम्मीद की जाती है.
वो कहती हैं, " ऐसा इसलिए है क्योंकि करियर विकल्प के रूप में खेल पुरुष मॉडल पर आधारित है. लिंग भूमिकाएं अभी भी पुरुषों को कमाने वाले की भूमिका से जोड़ती हैं. महिलाओं को पालन-पोषण और मातृत्व से जोड़ा जाता है."
गर्भावस्था के दौरान या बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद एथलीटों को खेलते हुए देखना एक आम बात बनती जा रही है.
एलिसिया मोंटानो का उदाहरण ले सकते हैं, जिन्होंने गर्भवती होने के बाद भी उन्होंने अमेरिकी ट्रैक और फील्ड चैंपियनशिप में 800 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया था.
वहीं 1998 में भारतीय धाविका पीटी उषा, 33 साल की थीं और माँ बन चुकी थीं. इसके बाद भी उन्होंने एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में हिस्सा लेकर चार पदक जीते और दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दिया.
भारत में मैरी कॉम और सानिया मिर्जा से लेकर दीपिका पल्लीकल तक भले ही खेलों में 'सुपरमॉम्स' की उदाहरण हों, लेकिन देश में अधिकांश महिला खिलाड़ियों को मातृत्व और खेल में करियर में से किसी एक का चयन करना पड़ता है.
साल के 2016 रियो ओलंपिक के स्टीपलचेज फाइनल में पहुंचने वाली ललिता बाबर ने हमें बताया कि उनके लिए यह फैसला कितना कठिन है.
वो कहती हैं, ''जब आप खेल में करियर बनाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपको बच्चे पैदा करने के विचार को दूर रखना होगा, क्योंकि आपको प्रदर्शन करना है और कुछ लक्ष्यों तक पहुंचना है. एक महिला के रूप में आप यह महसूस कर सकती हैं कि मां बनना महत्वपूर्ण है. लेकिन एक खिलाड़ी के तौर पर आपको यह तय करना होगा कि मां कब बनना है.''
ललिता एक बेटे की मां हैं. वो नवी मुंबई नगर निगम में खेल उपायुक्त के पद पर कार्यरत हैं. जब उन्होंने खेल में अपना करियर शुरू किया तो वह भारतीय रेलवे में काम करती थीं.
वो कहती हैं, "जिन महिला एथलीटों के पास सरकारी नौकरी है, उन्हें कम से कम मातृत्व अवकाश, बच्चों की देखभाल के लिए छुट्टी, चिकित्सा बीमा आदि लाभ मिलते हैं. लेकिन सभी खिलाड़ियों और सभी महिलाओं को किसी न किसी तरह का समर्थन मिलना चाहिए."
अंतरराष्ट्रीय खेल जगत मातृत्व को कैसे लेता है?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाल के दिनों में खेल संघों का मातृत्व से जुड़े मुद्दों पर नजरिए में काफी बदलाव आया है.
यही कारण है कि हम इस साल की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया में महिला फुटबॉल विश्व कप में कई 'मांओं' को खेलते हुए देखा.
ऑस्ट्रेलिया की कैटरीना गोरी की तरह, जो फ्रांस के खिलाफ मैच जीतने के बाद अपनी बेटी हार्पर को लेकर फुटबॉल के मैदान पर पहुंचीं.
अपने बेटे को ऑस्ट्रेलिया ले जाने वाली स्पेनिश फुटबॉलर आइरीन पेरेडेस ने फीफा को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "जब आपका बच्चा इतना छोटा होता है, तो आपको उसकी जरूरत होती है, लेकिन उसे भी आपकी जरूरत होती है."
महिला फ़ुटबॉल खिलाड़ी फीफा की वजह से मां होने और खिलाड़ी होने के बीच संतुलन बना सकती हैं.
अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल की संस्था फीफा ने जनवरी 2021 में अपने महासंघों के लिए मातृत्व से जुड़े नियम पेश किए.
इनमें कहा गया है कि खिलाड़ियों को गर्भावस्था के दौरान पूरा वेतन और कम से कम 14 सप्ताह की छुट्टी मिलनी चाहिए. मातृत्व अवकाश के दौरान खिलाड़ियों को उनके वेतन का कम से कम दो-तिहाई भुगतान किया जाना चाहिए.
वुमेन टेनिस एसोसिएशन में भी मातृत्व से जुड़े नीति है. इसमें गर्भावस्था से लौटने वाले खिलाड़ियों को विशेष रैंकिंग दी जाती है.
ये नियम इसलिए बनाए गए क्योंकि सेरेना विलियम्स जैसी खिलाड़ी को भी गर्भवती होने के दौरान अपनी रैंकिंग गंवाने के बाद टूर्नामेंट में गैरवरीयता खिलाड़ी के साथ खेलना पड़ा था.
जो बात टेनिस पर लागू होती है, वही दूसरे खेलों पर उसी तरह नहीं लागू होगी
क्रिकेट में मातृत्व की नीति
क्या आपको 2022 में न्यूजीलैंड में आयोजित आईसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप की यह तस्वीर याद है? भारतीय टीम ने पाकिस्तान की बिस्माह मारूफ और उनकी बेटी फातिमा के साथ सेल्फी ली थी.
मारूफ को अपनी टीम की कप्तानी करने और अपनी बेटी को स्तनपान कराने के बीच संघर्ष करना पड़ा था. उनकी मां उनके साथ यात्रा करती थीं, लेकिन वह ऐसा केवल इसलिए कर सकीं क्योंकि पाकिस्तान में मातृत्व नीति है, जो वित्तीय सहायता भी देती है.
न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट बोर्ड भी मातृत्व अवकाश देता है, वह भी वेतन के साथ.
अभी हाल ही में बीसीसीआई ने पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए एक समान मैच फीस की घोषणा करके वेतन समानता की दिशा में एक उदाहरण पेश किया है. लेकिन कॉन्ट्रैक्ट वाली महिला खिलाड़ियों के लिए उसके पास अभी तक कोई स्पष्ट नीति नहीं है.
इसके पीछे एक कारण यह हो सकता है कि 2006 में बीसीसीआई ने भारतीय महिला क्रिकेट का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया था, उसके बाद से कभी ऐसी जरूरत पैदा ही नहीं हुई थी. लेकिन अब कई लोगों को लगता है कि अब समय आ गया है कि बीसीसीआई मातृत्व नीति को भी लागू करें.
पूर्व क्रिकेटर और कॉलमिस्ट स्नेहल प्रधान ने अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स' में लिखा है, ''कल्पना करें कि अगर एक हाई-प्रोफाइल खिलाड़ी मातृत्व का लाभ उठाना चुने तो भारत के सामाजिक ताने-बाने पर क्या प्रभाव पड़ेगा.''
वो लिखती हैं, ''आप कल्पना करिए कि इससे उन कामकाजी महिलाओं और उनके नियोक्ताओं को क्या संदेश जाएगा जो बच्चे पैदा करने के बारे में सोच रही हैं. हमारे पड़ोसियों ने इस दिशा में मानक स्थापित किए हैं. अब भारत को आगे बढ़ना होगा.''
सभी खेल संगठन कम से कम आज की तारीख में गर्भावस्था के दौरान वित्तीय सहायता देने में सक्षम नहीं हैं.
मैटरनिटी पॉलिसी में क्या होना चाहिए
एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आदिल सुमरिवाला ने 29 अगस्त 2022 को मुंबई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस बारे में बात की थी.
उन्होंने कहा था, ''क्या हमें और सहायता देनी चाहिए? बिल्कुल. अगर हमारे पास पैसा है तो निश्चित रूप से हमें और अधिक समर्थन देना चाहिए. यह आपको मिलने वाले पैसे और आपके द्वारा बांटे जा रहे पैसे के बीच एक संतुलन का मामला है,''
वित्तीय सहायता या विशेष रैंकिंग से अधिक महिला खिलाड़ियों को एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरत है जो उनके मुद्दों को लेकर अधिक संवेदनशील हो, जैसा कि सुमा शिरूर ने ऊपर रेखांकित किया है.
वो आगे कहती हैं, ''मैं जो चाहती हैं, वह है शिविरों में भाग लेना अनिवार्य होने के मामले में एक निश्चित छूट या लाभ देना, खिलाड़ी को बच्चे के साथ यात्रा करने की इजाजत देना, उन्हें अलग कमरा देना और कुछ शिविरों के उन नियमों से छूट देना जिनका सबको पालन करना पड़ता है.''
सुमा को लगता है कि प्रतिस्पर्धी खेलों में यह फिटनेस और खिलाड़ी के फॉर्म के बारे में है जो तय करता है कि आप खड़े कहां हैं. इसमें महिला को अपने तरीके से संघर्ष करना होगा. एक मैटरनिटी पॉलिसि उन्हें इस लड़ाई में मदद कर सकती है. इसका पूरे समाज पर भी असर पड़ सकता है.
ब्रिटेन में नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी में महिला खेल के समाजशास्त्र के लेक्चरर अली बोवेस कहते हैं, "खेल समाज का एक सूक्ष्म रूप है. यदि आप खेलों में लैंगिक असमानता से निपट सकते हैं, तो आप दुनिया में लैंगिक असमानता की समस्याओं से निपटने के लिए किसी भी तरह आगे बढ़ेंगे."
(बीबीसी न्यूज़ के लिए रेबेका थॉर्न की एक कहानी के इनपुट के साथ)
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