प्रयागराज: सड़कों पर चल रही हैं नाव और छतों पर रहने को मजबूर लोग

    • Author, सैयद मोज़िज इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इस साल जनवरी महीने में कुंभ का आयोजन कर चुके प्रयागराज इन दिनों फिर सुर्ख़ियों में है.

इसकी वजह ये है कि शहर के कई इलाके पानी में डूबे हैं.यहां सड़कों पर गाड़ियां नहीं बल्कि नावें चल रही हैं और लोग अपने-अपने घरों को छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं.

प्रयागराज के 51 शहरी इलाक़ों में पानी भरा है. इन शहरी इलाकों में क़रीब पांच लाख लोगों का जीवन बाढ़ से प्रभावित हुआ है.

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दरअसल, ये पानी में डूबे ये घर शहर के निचले इलाक़ों में हैं. हर साल मानसून में यहां कुछ दिक्कतें आती हैं, लेकिन इस बार पानी ज़्यादा होने से लोगों को काफ़ी मुश्किलें हो रही हैं.

हालांकि बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए राहत की ख़बर है कि दोनों ही नदियों, गंगा और यमुना का जलस्तर कम हो रहा है.

प्रयागराज के ज़िलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा ने बीबीसी को बताया कि पानी धीरे-धीरे कम हो रहा है लेकिन अभी हालात सामान्य होने में कुछ दिन और लग सकते हैं.

उन्होंने शहरी इलाकों में पानी जमा होने की वजह बताते हुए कहा, ''बारिश होने और यमुना में पीछे से बांध का पानी छोड़े जाने से जलस्तर बढ़ गया था.''

छतों पर रहने को मजबूर लोग

राजापुर में बीबीसी की टीम एक नाव पर सवार हुई तो उसमें कई लोग ऐसे मिले जो अपने डूबे हुए घरों की ओर जा रहे थे.

ऐसे ही एक व्यक्ति हैं ओमप्रकाश. वह पेशे से वकील हैं और 2013 से राजापुर में रहते हैं. वह अपना घर छोड़कर नहीं गए. घर का सामान लाने के लिए रोज़ाना नाव के सहारे जाते हैं और सामान लेकर आते हैं.

उनका कहना है, ''आबादी लगातार बढ़ रही है. इसलिए नदियों पर दबाव है. इससे पहले इस तरह की बाढ़ 2013 में भी आई थी.''

नाव की मदद से वो सीधे अपने घर की पहली मंजिल पर चढ़ गए.

राधेश्याम भी अपना घर देखने जा रहे हैं. वो खुद सरकारी राहत शिविर में हैं लेकिन परिवार को रिश्तेदारों के यहां भेज दिया है. उनका घर भी डूबा हुआ था.

वहीं इस दौरान हमारी मुलाकात ज्ञान प्रकाश से हुई. उन्होंने खरगोश पाल रखा है. वो अपना घर छोड़कर अभी सुरक्षित स्थान पर रह रहे हैं.

वो कहते हैं, "जहां रह रहा हूं, वहां पर खरगोश को रखने की कोई जगह नहीं है, इसलिए उसे रोज़ाना खाना खिलाने के लिए आता हूं.''

करेली की रहने वाली हिना फातिमा का घर भी एक मंजिल तक पानी में डूब गया है. वो बच्चों को लेकर ऊपर की मंजिल पर रहती हैं.

उनका कहना है, "अब तो राहत सामग्री आ रही है, लेकिन शुरुआती दिनों में कोई नहीं आया था. पानी भर जाने की वजह से इलाके की बिजली काट दी गई है. इसलिए मोबाइल भी काम नहीं कर रहा है."

गंगा के किनारे छोटा बघाड़ा और दारागंज में भी कमोबेश यही स्थिति है.

हालांकि प्रशासन ने स्कूल 7 अगस्त तक बंद कर दिए हैं, ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजने की परेशानी तो नहीं है लेकिन ऑफिस में काम करने वालों को परेशानी हो रही है.

राखी सिंह स्वास्थ्यकर्मी हैं. उनके घर की भी पहली मंजिल में पानी घुस आया है. वो ऊपरी मंजिल में रह रही हैं.

राखी सिंह ने कहा, "बाढ़ की परेशानी हर साल है लेकिन ड्यूटी पर तो जाना ही है."

बाढ़ के बीच गंगा नदी में नहाने गए तीन युवकों की डूबने से मौत हो गई. गंगानगर क्षेत्र के डीसीपी कुलदीप सिंह गुनावत के मुताबिक, "मंगलवार को मनसौता घाट पर गंगा नदी में तीन युवकों की डूबने से मौत हो गई है. दो लोगों को बचा लिया गया है."

शिविर में रह रहे लोगों को घर जाने का इंतज़ार

बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए कई शिविर लगाए गए हैं. सरकार की ओर से संचालित शिविरों में 1,747 परिवार रह रहे हैं.

शिविर में रह रहे लोगों को अपने घर लौटने का इंतज़ार है. न्याय मार्ग स्थित ऋषिकुल वाल्मीकि उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में चल रहे राहत शिविर में रह रही कुछ महिलाओं से हमने बात की.

उन्होंने बताया कि बाढ़ का पानी पहले धीरे-धीरे आया लेकिन अचानक फिर जलस्तर बढ़ गया.

सुमन सोनकर ने कहा, "घर का सामान छोड़कर भागे हैं. हमें अपनी लड़कियों को रिश्तेदारों के यहां छोड़ना पड़ा है."

प्रशासन के साथ-साथ आम नागरिक भी राहत सामग्री वितरित करने का काम कर रहे हैं.

प्रयागराज के ज़िलाधिकारी ने कहा, "दवाएं और खाने-पीने का सामान उपलब्ध कराया जा रहा है."

उन्होंने कहा, "सभी शिविर एडीएम स्तर के अधिकारियों की निगरानी में हैं. हर शिविर में मेडिकल कैंप भी बनाए जा रहे हैं. जो लोग बीमार हैं, उनको उचित इलाज मुहैया कराया जा रहा है."

प्रयागराज में कब-कब आई बाढ़

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि प्रयागराज में बाढ़ आई है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि हर साल पानी भरता है और तीन-चार साल पर संकट बढ़ जाता है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सबसे खराब स्थिति 1978 में तब बनी थी जब गंगा का जलस्तर अब तक का सर्वाधिक 88.39 मीटर दर्ज किया गया था.

यमुना का जलस्तर 87.99 मीटर दर्ज किया गया था, जबकि दोनों नदियों के लिए ख़तरे का निशान 84.73 मीटर है.

6 अगस्त को जारी आंकड़ों के मुताबिक, गंगा नदी का जलस्तर फाफामऊ में 85.74 मीटर था, वहीं यमुना नदी का जलस्तर 85.31 मीटर था.

इससे पहले 2013 में इस तरह की बाढ़ आई थी.

राजापुर में रहने वाले ओमप्रकाश ने बताया कि इस बार जलस्तर 2013 से ज़्यादा है.

इस मामले में प्रयागराज के ज़िलाधिकारी ने कहा, "एक बार पानी कम हो जाए, लोग घरों में वापस लौट जाएं, तो हम जानने की कोशिश करेंगे कि बाढ़ की वजह क्या रही."

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि गंगा के किनारे आबादी लगातार बढ़ रही है, जिसकी वजह से बाढ़ का पानी घरों में घुस रहा है.

प्रशासन ने बताया कि बाढ़ में फंसे लोगों को राहत देने के लिए 323 नावें और तीन मोटर बोट लगाई गई हैं.

इस बीच, ग्रामीण इलाकों में लोगों की चिंता यह भी है कि उनके खेतों में पानी भर चुका है और फसलें बर्बाद हो चुकी हैं.

ज़िला प्रशासन का कहना है कि नुकसान के स्तर का पता लगाने के लिए रिपोर्ट मांगी जा रही है.

उत्तर प्रदेश में बाढ़

उत्तर प्रदेश के 24 जिलों की 59 तहसीलें और 1,245 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं.

राहत आयुक्त भानु चंद्र गोस्वामी ने बताया कि प्रभावित लोगों को राहत सहायता मुहैया कराई जा रही है. वहीं बाढ़ की वजह से 26,089 मवेशियों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है.

बाढ़ की चपेट में आने से अब तक 517 लोगों के मकानों को क्षति पहुंची है, जिनमें से 360 लोगों को सहायता राशि दी जा चुकी है.

प्रदेश में 33,252 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल बाढ़ की चपेट में आया है.

गोस्वामी ने कहा, "इन प्रभावित क्षेत्रों में 1,640 नावों और मोटर बोट की सहायता से राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है."

उन्होंने कहा, "इन इलाकों में अब तक 17,924 खाद्यान्न पैकेट और तकरीबन ढाई लाख लंच पैकेट वितरित किए जा चुके हैं. वर्तमान में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 40 से अधिक लंगर के ज़रिए लोगों को भोजन की सुविधा दी जा रही है."

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कुल 377 बाढ़ शिविर बने हैं. इनमें 41,842 लोग अस्थायी रूप से रह रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.