सेंथिल बालाजी: गिरफ़्तारी पर रोए मंत्री, अस्पताल में डॉक्टरों ने दी बाईपास की सलाह

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18 घंटे की पूछताछ और कई जगहों पर छापेमारी के बाद ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने तमिलनाडु की डीएमके सरकार के मंत्री वी सेंथिल बालाजी को बुधवार तड़के गिरफ़्तार कर लिया.
बाद में चेन्नई की एक अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में उन्हें 28 जून तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.
बालाजी पर नौकरी घोटाले के एक केस में कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग करने का आरोप है.
बालाजी तमिलनाडु सरकार में बिजली, आबकारी और मद्य निषेध मंत्री हैं.
गिरफ़्तारी के बाद उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की तो उन्हें सुबह ढाई बजे चेन्नई के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया.
मीडिया में गिरफ़्तारी के बाद उनके रोने की तस्वीरें काफ़ी वायरल हो रही हैं. ईडी ने फ़िलहाल उनकी गिरफ़्तारी के विषय में कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी है.
डीएमके ने ईडी की कार्रवाई की आलोचना की है. इसके साथ ही कांग्रेस ने भी इसका विरोध करते हुए कड़ा बयान जारी किया है.
कल जब सेंथिल के कार्यालय की तलाशी ली जा रही थी कि तभी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बयान जारी कर कहा, "इस तरह की हरकतें विपक्ष को चुप कराने में कामयाब नहीं होगी बल्कि ये मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ अपने लोकतांत्रिक संघर्ष को जारी रखने के विपक्ष के दृढ़ संकल्प को और मजबूत करती है."
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सेंथिल बालाजी एक नौकरी घोटाले के कारण मुसीबत में हैं.
बताया जाता है कि ये रैकेट वर्ष साल 2011 से 2015 के बीच चला था जिस वक़्त बालाजी एआईडीएमके सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री थे.
उन पर यातायात विभाग में ड्राइवरों और कंडक्टरों की भर्ती में अनियमितताएं बरतने का आरोप है.
तमिलनाडु के करूर में जन्में सेंथिल बालाजी ने बहुत कम वक़्त में राज्य की सियासत में अपनी जगह बनाई है.
वे इतने ताक़तवर हैं कि कई राष्ट्रीय नेता भी उनके हक़ में आवाज़ उठाते दिख रहे हैं.
राजनीति में उनकी इतनी तेज़ तरक्की का राज़ क्या है?
सेंथिल करूर में रामेश्वरपट्टी से आते हैं. उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी. उसके बाद वे राजनीति में आ गए थे.
चुनावी राजनीति में उन्होंने सबसे पहला कदम वर्ष 1996 में रखा. उसी साल वे डीएमके के टिकट पर अपने शहर में पार्षद बने थे.
लेकिन साल 2000 में उन्होंने पार्टी बदली और एआईडीएमके में शामिल हो गए. उसके बाद उनके सियासी करियर ने रफ़्तार पकड़ी.
पार्टी बदलने के बाद उन्होंने अपना नाम अंकज्योतिष के हिसाब से सेंथिल कुमार से सेंथिल बालाजी कर लिया.
एआईडीएमके जॉइन करने के छह महीने के भीतर ही सेंथि अपने ज़िले में पार्टी की छात्र विंग के संयुक्त सचिव बन गए.
साल 2004 में वे छात्र विंग के सचिव बने और 2006 में पार्टी के टिकट में विधानसभा जीतकर करूर के विधायक बन गए.
विधायक बनने के बाद उनका प्रोफ़ाइल बढ़ गया. पार्टी के भीतर वे प्रभावशाली व्यक्ति बन गए. सिर्फ़ जयललिता ही नहीं बल्कि ससिकला गुट के साथ भी उनके संबंध काफ़ी अच्छे थे.
साल 2011 में करुर से दोबारा जीतने के बाद उन्हें जयललिता ने ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर बना दिया.
साल 2015 तक जयललिता कई बार अपने मंत्रिमंडल में बदलाव किए. लेकिन सेंथिल बालाजी का मंत्रालय एक बार भी नहीं बदला गया.
कई दिग्गजों को मंत्रिमंडल से हटा गया लेकिन शशिकला परिवार के साथ अच्छे रिश्ते होने के कारण सेंथिल का रुतबा बरकरार रहा.
साल 2014 में जयललिता को आय से अधिक आमदनी के एक केस में जेल जाना पड़ा. उस समय ये अफ़वाह भी उड़ी थी कि सेंथिल राज्य के अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं.
ये अटकलें सेंथिल की जयललिता और शशिकला परिवार से नज़दीकियों और वफ़ादारी का सबूत थी.
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लेकिन जयललिता जेल से बाहर आईं तो पार्टी के भीतर काफ़ी हलचल हुई.
सबसे पहले सेंथिल को मंत्री पद से हटाया गया. यही नहीं बल्कि उन्हें करूर के ज़िला सचिव पद से भी हटा दिया गया.
पार्टी में दरकिनार किए जाने के बावजूद सेंथिल शांत रहे और अपनी खोई ज़मीन वापस हासिल करने में जुटे रहे.
साल 2016 के चुनाव में जयललिता ने एक बार फिर उन्हें विधायक का टिकट दिया और वे तीसरी बारी तमिलनाडु असेंबली में दाखिल हुए.
इसी साल जयललिता की तबीयत काफ़ी बिगड़ी और वे अस्पताल में दाख़िल हुईं.
जयललिता के स्वास्थ्य की कामना करते हुए सेंथिल ने कई मंदिरों नें पूजा-अर्चना और अन्य कई अनुष्ठान किए.
उन्होंने तिरुपति बालाजी में अंगप्रदक्षिणम जैसे कठिन अनुष्ठान भी किए.
इसके बाद अपने ज़िले करूर ही नहीं बल्कि सारे राज्य में वे मशहूर हो गए. करूर में उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को किनारे करना शुरू कर दिया.
उनके बढ़ते कद के कारण एआईडीएमके के पूर्व मंत्री चिन्नासामी ने पार्टी छोड़ दी है और डीएमके में शामिल हो गए.
पार्टी के भीतर ऐसी भी अफ़वाहें थीं कि सेंथिल, पार्टी के बड़े नेता थंबी दुराई को लोकसभा चुनाव में कई इलाकों में हराने की कोशिश की थी.
जयललिता के निधन के बाद एआईडीएमके पार्टी दो-फाड़ हो गई. एक शशिकला का था और दूसरा ओपीएस का.
अप्रैल 2017 में पार्टी टूटने के बाद ख़बर फैली कि सेंथिल बालाजी पार्टी छोड़ रहे हैं और वे डीएमके में शामिल हो रहे हैं.
बात ये भी चली थी कि वे अपने साथ पांच एमएलए भी लेकर आएंगे.
लेकिन ये सब कोरी अफ़वाहें साबित हुईं.
जब शशिकला के पुत्र टीटीवी दिनाकरण को पार्टी से निष्कासित किया गया तो वे उनके साथ खड़े रहे.
इसके बाद दिनाकरण ने आरके नगर के लिए हुए उपचुनाव में जीत हासिल की. उस जीत में सेंथिल ने अहम भूमिका निभाई.
लेकिन इसके बाद अचानक 2018 सेंथिल ने डीएमके का दामन थाम लिया.
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2019 के लोकसभा चुनाव सेंथिल कुमार अरवाकुरिची से लड़े और कई विधानसभा सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया.
नई पार्टी में आए सेंथिल का प्रतिष्ठा बढ़ने लगी. तमिलनाडु के कोंगू क्षेत्र में डीएमके कमज़ोर थी लेकिन सेंथिल के कारण पार्टी वहां लोकसभा चुनावों में मज़बूत दिखी.
2021 के विधानसभा चुनाव में वे एक बार फिर विधायक बने और डीएमके की सरकार में उन्हें कैबिनेट में जगह मिल गई.
लेकिन एमके स्टालिन की कैबिनेट में कई वरिष्ठ नेता इस बात से नाराज़ थे कि सेंथिल को बिजली और आबकारी जैसा अहम मंत्रालय दिया गया था.
बीजेपी का दावा है कि सेंथिल कुमार एक लाख करोड़ के घोटाले में शामिल हैं. पिछले महीने आयकर विभाग ने सेंथिल के भाई अशोक के घर और दफ़्तर पर छापेमारी की थी.
उस रेड के दौरान एक महिला डीएमके कार्यकर्ता का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे आयकर विभाग के अधिकारियों के अशोक के दफ़्तर में प्रवेश से रोक रही थी.
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