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शेयर बाज़ार में निवेशकों के लाखों करोड़ डूबे, विशेषज्ञों ने बताया क्यों घबरा रहे हैं लोग
- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2024 में आख़िरी के दो-तीन महीनों में भारतीय शेयर बाज़ारों में उठापटक शुरू हो गई थी.
26 सितंबर 2024 को सेंसेक्स 85,836 की ऊँचाई पर था और अब हाल ये है कि टूटते-टूटते ये ऊँचाई 75 हज़ार के आंकड़े के आस-पास पहुँच गया है.
नए साल में दलाल स्ट्रीट पर मंदड़ियों का कब्ज़ा सा हो गया लगता है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफ़पीआई का शेयर बेचकर निकलने का सिलसिला जारी है.
जनवरी में अभी तक एफ़पीआई ने 69 हज़ार करोड़ रुपये की बिकवाली की, हालाँकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (म्यूचुअल फंड्स) ने इसी दौरान 67 हज़ार करोड़ रुपये की ख़रीदारी कर बाज़ार को काफी सहारा दिया.
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किन शेयरों में है बिकवाली
हालाँकि बाज़ार में चौतरफा बिकवाली है, लेकिन सबसे ज़्यादा गिरावट छोटे और मझौले शेयरों (मिडकैप और स्मॉलकैप) में है.
सोमवार को कारोबारी सत्र के दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का मिडकैप इंडेक्स 3 फ़ीसदी टूट गया, जबकि स्मॉलकैप इंडेक्स में 4 फ़ीसदी की गिरावट आ गई.
बाज़ार अभी दो अहम घटनाओं पर टिकटिकी लगाए हुए है. पहला, 29 जनवरी को अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिज़र्व की बैठक में ब्याज दरों को लेकर क्या फ़ैसला होता है, और दूसरा भारत का केंद्रीय बजट जो एक फ़रवरी को संसद में पेश होगा.
अमेरिका में फेडरल रिज़र्व ने अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की तो दुनियाभर के बाज़ारों की मुश्किलें बढ़नी तय हैं, वैसे भी विदेशी निवेशकों ने भारत समेत कई उभरते बाज़ारों से कन्नी काट ली है और इस सूरत में वो अधिक और सुरक्षित रिटर्न की चाह में अमेरिका का रुख़ करने में देरी नहीं करेंगे.
हालाँकि डीआर चोकसी फिनसर्व के मैनेजिंग डायरेक्टर देवेन चोकसी का मानना है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद ये संभावना बहुत कम है कि फेड रिज़र्व ब्याज दरों में इजाफ़ा करेगा. देवेन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप का जो रुख़ रहा है उसके हिसाब से वो नहीं चाहेंगे कि फेडरल रिज़र्व ब्याज दरें बढ़ाए."
क्यों टूट रहे बाज़ार
बाज़ार विश्लेषक अंबरीश बालिगा बाज़ार के मौजूदा हालात की कई वजह बताते हैं.
अंबरीश कहते हैं, "पिछले कुछ समय से भारत में आर्थिक स्थितियां बदली हैं. निजी एजेंसियों ने ही नहीं, भारत सरकार और रिज़र्व बैंक ने जीडीपी ग्रोथ अनुमान घटाए हैं. खाद्य महंगाई दर अब भी काफ़ी अधिक है. कंपनियों के जो तिमाही नतीजे आ रहे हैं, वो भी अधिकतर निराश करने वाले हैं."
देवेन चोकसी बाज़ार के इस निगेटिव सेंटिमेंट के लिए बाज़ार नियामक संस्था सेबी के वायदा बाज़ार से जुड़े नए दिशा निर्देश को भी ज़िम्मेदार बताते हैं. देवेन ने कहा, "सेबी ने हाल ही में फ्यूचर एंड ऑप्शन ट्रेडिंग के लिए न्यूनतम कॉन्ट्रैक्ट साइज़ को काफ़ी बढ़ा दिया है और इसे 15 लाख रुपये कर दिया है."
देवेन कहते हैं, "इसके पीछे सेबी की मंशा रिटेल निवेशकों की एफएंडओ में बेतहाशा गतिविधि पर लगाम लगाना है. कॉन्ट्रैक्ट साइज़ बढ़ाकर सेबी बाज़ार में स्थायित्व लाने की कोशिश कर रहा है."
सेबी ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें दावा किया गया था कि वित्तीय वर्ष 2022 से वित्तीय वर्ष 2024 तक तीन साल में एक करोड़ से अधिक ट्रेडर्स ने एफ़एंडओ में नुकसान उठाया. अगर प्रति ट्रेडर्स नुकसान की बात करें तो ये औसतन दो लाख रुपये रहा.
बजट से उम्मीदें और बाज़ार की चाल
तो क्या एक फ़रवरी को पेश होने वाले बजट को लेकर भी क्या बाजा़र अपनी दिशा बदल रहा है? अंबरीश बालिगा इससे सहमत नहीं दिखते.
उनका कहना है, "वैसे भी पिछले 8-10 साल से बजट नॉन इवेंट बन गया है. इसमें हुई घोषणाओं का असर एक-दो दिनों तक ही रहता है. पॉलिसी से जुड़ी कई घोषणाएं सरकार समय-समय पर करती रहती है और उसके लिए बजट का इंतज़ार नहीं करती. इसके अलावा जीएसटी दरों का फ़ैसला भी समय-समय पर होता ही रहता है."
अंबरीश कहते हैं कि कैपिटल गेन्स टैक्स के मामले में सरकार पिछले बजट में ही अहम फ़ैसला कर चुकी है, ऐसे में इसमें और बदलाव होने की गुंजाइश नहीं है.
अंबरीश ने कहा, "रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बजट 8 से 10 फ़ीसदी तक बढ़ सकता है, लेकिन समस्या है इन योजनाओं को लागू करने की. क्रियान्वयन तेज़ हो इसके प्रयास होने चाहिए."
देवेन चोकसी कहते हैं, "बजट में बाज़ार के लिए कुछ निगेटिव होगा, ऐसा लगता नहीं है."
क्या निवेशकों में डर है?
पिछले साल यानी 2024 भारतीय शेयर बाज़ारों के लिए इसलिए भी ख़ास रहा कि रिटेल निवेशकों ने अपनी भागीदारी बढ़ाई. सिस्टेमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान यानी सिप के ज़रिये बाज़ार में जमकर पैसा आया और शेयरों के भाव खूब बढ़े.
अंबरीश बालिगा कहते हैं, "जब फंड मैनेजर्स के पास इतनी बड़ी रकम आई तो वो कैश तो अपने पास रख नहीं सकते थे, लिहाजा उन्होंने शेयर ख़रीदे और कह सकते हैं कि शेयरों की वैल्यू बहुत महंगी हो गई."
तो क्या इस गिरावट से रिटेल निवेशक घबरा जाएंगे या बाज़ार से हट जाएंगे? इस सवाल पर अंबरीश बालिगा कहते हैं, "बाज़ार में विदेशी संस्थागत निवेशक बेचकर निकल रहे हैं. रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन असलियत ये है कि पिछले चार सालों में इनमें से अधिकतर निवेशक पहली बार बाज़ार का ये रूप (लगातार गिरावट) देख रहे हैं."
अंबरीश का कहना है कि छोटे निवेशक घबरा गए हैं या अपना निवेश रोक रहे हैं, ये तो आधिकारिक तौर पर जनवरी महीने के आंकड़ों से पता चल पाएगा, लेकिन जिस तरह से पिछले कुछ समय से नए निवेशक बाज़ार में आए हैं, उनमें घबराहट होना स्वाभाविक है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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