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बिहार: इन लड़कियों को मौत पर नाचने के लिए बुलाया जाता है
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
मैं जब रिया से सुबह दस बजे मिली थी तो उन्हें चलने में दिक़्क़त हो रही थी. वो पिछली रात से सुबह तक कई बार नारियल पानी पी चुकी थीं.
दरअसल, 24 साल की रिया एक श्राद्ध कार्यक्रम में नाचकर सुबह ही अपने पटना के सिपारा मोहल्ले स्थित किराए के घर में वापस लौटी थीं. रात भर नाचने की वजह से वो बेहद थकी हुई हैं.
वो मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली हैं. वो कहती है, “यहां पर मरनी (मृत्यु) पर भी लोग डांस करवाते हैं. अर्थी उठती रहती है और उसके साथ-साथ डांस भी होता रहता है. इतना ही नहीं नाचने के कार्यक्रम के दौरान लोग बदतमीज़ी भी करते हैं. पास बुलाकर छूने की कोशिश करते हैं. बहुत अजीब लगता है लेकिन यही काम है हमारा. लोगों को शौक है मरनी पर भी नचवाने का.”
वहीं, रिया के पास बैठी काजल सिंह जोड़ती हैं, “मुझको पहली बार दनियावां (पटना के पास एक जगह) में मरनी (मौत) पर नाचने के लिए बुलाया गया था. मैं शॉक में थी कि भला मरनी पर कौन सा नाच होता है. लेकिन वहां लोगों ने कहा सब होता है. हमें बताया जाता है कि मरने वाले की तमन्ना थी कि उसके मरने पर नचनिया नाचे.”
काजल और रिया दोनों ही पेशेवर डांसर हैं. ये लोग शादी, तिलक, मुंडन, जन्मदिन, शादी की सालगिरह के मौके से लेकर अब श्राद्ध के आयोजनों पर भी नाचती हैं. बिहार में इसे ‘बाईजी का नाच’ भी कहा जाता है.
मौत का जश्न
मृत्यु जैसे शोक में 'बाईजी का नाच', ये कई लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन बिहार के अंदरूनी हिस्सों में पिछले कुछ सालों में ये एक नए ट्रेंड के तौर पर उभर रहा है.
किसी उम्रदराज़ शख़्स की मौत होने पर शवयात्रा को बैंड बाजे के साथ निकालने की परंपरा पहले भी रही है, लेकिन डांस का ये चलन अपेक्षाकृत नया है.
पटना की कोमल मिश्रा ने 15 साल की उम्र से शादियों में डांस परफ़ॉर्म करना शुरू कर दिया था. आज वो 32 साल की हो चुकी हैं. वो कहती हैं कि बीते सात-आठ साल से उन्हें अंतिम संस्कार के मौके पर भी नाचने के लिए बुलाया जाने लगा है.
कोमल कहती हैं, “मरनी हो या शादी सबमें एक जैसे ही नाचना पड़ता है. अगर बीच में कमीशन लेने वाला नहीं है तो एक रात का छह हज़ार रुपए तक मिलता है. रात में आठ – नौ बजे नाचना शुरू होता है जो सुबह चार-पांच बजे तक चलता है. पहले हिंदी के गाने बजते हैं. बारह बजते-बजते भोजपुरी के गाने बजने लगते हैं.”
कोमल कहती हैं, “लोगों की डिमांड रहती है कि लहंगे से शॉर्ट्स में आओ. लोग पैसा दिखाकर नीचे बुलाते हैं और उनकी गोद में बैठकर पैसा लेना पड़ता है. ये सब कुछ शादी, मरनी सब में होता है. कोई अंतर नहीं है.”
नाच ही नहीं फ़ायरिंग भी
बिहार के भोजपुर, औरंगाबाद, बांका, रोहतास सहित कई जगहों में अंतिम संस्कार पर डांस करवाने का ये चलन लगातार बढ़ रहा है, जिसमें शव यात्रा के दौरान या श्राद्ध कर्म में लोग नाच का कार्यक्रम आयोजित करवाते हैं.
अब तो इन श्राद्ध कार्यक्रमों में शादी या किसी ख़ुशी के मौक़े की तरह ही फ़ायरिंग भी होने लगी है.
हाल ही में नालंदा ज़िले के आशीर्वाद कुमार की मौत ऐसे ही एक श्राद्ध कर्म में आयोजित कार्यक्रम के दौरान हो गई थी. फ़ायरिंग के दौरान उनको ‘ग़लती’ से गोली लग गई थी.
उनके पिता प्रमोद प्रसाद ने कहा, “हम लोग जानकी देवी के श्राद्ध कार्यक्रम का नाच देखने दो नवंबर को गए थे. रात बारह बजे तीन डांसर पिस्तौल लेकर नाच रही थीं. बेटा भी स्टेज पर चढ़कर नाच रहा था. सुबह चार बजे के आसपास उसको सिर पर गोली लग गई. हम उसे अस्पताल ले गए, लेकिन वो बचा नहीं.”
श्राद्ध कार्यक्रमों पर आयोजित इन डांस प्रोग्राम के कई वायरल वीडियो में लोग या डांसर्स भी हाथ में बंदूक लिए डांस करती दिख जाती हैं.
डांसर कोमल कहती हैं, “पहले डर लगता था, लेकिन अब बिल्कुल नहीं लगता. बल्कि अगर मेरे प्रोग्राम में गोली ना चले तो लगता है कि मेरे डांस का कोई मतलब ही नहीं है.”
फ़ायरिंग को सामाजिक ताक़त के प्रदर्शन से जोड़ा जाता है.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, "मेरे ख़्याल से राज्य जिस तरह से किसी सम्मानित हस्ती की मौत पर फ़ायरिंग करके उसके प्रति सम्मान ज़ाहिर करता है, उसी तरह लोग भी अपने परिजनों के लिए और ताक़त के प्रदर्शन के लिए फ़ायरिंग कर रहे हैं. ये एक तरह से राज्य सरकार की नकल है.”
क्या ये परंपरा का हिस्सा है?
अगर लोक परंपराओं में देखें तो मृत्यु के समय और उसके बाद होने वाले विधि-विधानों के दौरान गायन परंपरा रही है. लेकिन क्या मृत्यु के बाद या इससे जुड़े कर्म के दौरान नृत्य की कोई परंपरा भी रही है?
राम नारायण तिवारी उत्तर प्रदेश के पीजी गाजीपुर कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं.
‘भोजपुरी श्रम लोकगीतों में जंतसार’ समेत कई किताबों के लेखक राम नारायण कहते हैं ,“मृत्यु के साथ तीन तरह के गीत परंपरा में हैं. पहला मृत्यु गीत, दूसरा निर्गुण और तीसरा श्री नारायणी. बाक़ी मृत्यु के वक़्त जो महिलाएं कुछ बातें कहते हुए रोती हैं, वो भी रुदन गीत कहलाता है. लेकिन नृत्य का निषेध रहता है.”
तिवारी कहते हैं, “मृत्यु से जुड़े पारंपरिक गायन में ग्लानि, करुणा और शांत रस है. लेकिन अभी जो गाने बजाए जा रहे हैं, महिलाओं को नाचने के लिए बुलाया जा रहा है उसमें छिपी हुई विलासिता और अपनी जातीय ताक़त का प्रदर्शन है. जो भारतीय समाज के एक महत्वपूर्ण आधार ‘सहयोग की परंपरा’ के टूटने और उसके ‘एकाकी’ होते जाने की निशानी है.”
पल्लवी बिस्वास पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी में म्यूज़िक टीचर हैं.
वो कहती हैं, “मृत्यु के बाद जो चले गए और जो इस धरती पर रह गए, दोनों की ही यात्रा को आसान बनाने के लिए ऋचागान होता था. बाद में निर्गुण आया जो आमजन की बोली में था. निर्गुण के बाद मृत्यु पर दुगोला गाया जाने लगा. लेकिन बाद में दुगोला में महिलाओं को नचाया जाने लगा. और अब भोजपुरी गानों पर एक्सक्लूसिव डांसर्स को बुलाकर भड़काऊ नाच होता है."
"हमारी परंपरा में जन्म और मृत्यु दोनों से जुड़े गीत हैं, लेकिन दोनों ही गीतों में फ़र्क़ है. उस फ़र्क़ को रहने देना चाहिए.”
जाति की ताक़त का प्रदर्शन
दुगोला एक तरह का गायन होता है जिसमें आशु कवि के दो या उससे ज़्यादा समूह होते हैं. आशु कवि का मतलब है जो मौक़े पर ही किसी कविता/गीत की रचना कर दे.
पहले दुगोला में सवाल-जवाब की तर्ज पर धार्मिक प्रसंगों का गायन होता था, लेकिन अब इसमें जातिवादी तंज की अधिकता होती है.
वरिष्ठ पत्रकार और बिहार की संस्कृति को समझने वाले निराला बिदेसिया कहते हैं, “बीते 30 साल से दुगोला मृत्यु के अवसर पर गाया जाने लगा. और अगर आप यूट्यूब पर उनकी रिकार्डिंग्स देखें तो पीछे बाकायदा श्राद्ध कर्म का पोस्टर लगा रहता है और आगे दुगोला में अश्लील गायन और लड़कियां नाचती रहती हैं.”
डांसर कोमल कहती हैं, “श्राद्ध हो या शादी गाने, जाति के हिसाब से ही तय होते हैं. जाति वाले अपने-अपने हिसाब से अपनी जाति के कलाकारों के गाने बजवाते हैं.”
‘लोगों के दबाव में बुला लिए डांसर’
कई बार लोग अपने क़रीबी लोगों के दबाव में में भी इन डांसर को बुला रहे हैं. नालंदा के गोविंदपुर के रहने वाले अजय यादव ने भी अपने पिता बोधि यादव की मृत्यु पर डांसर्स को बुलाया था.
अजय कहते हैं, “मेरे यहां टेंट पंडाल लगा हुआ था तो समाज के लोगों ने ज़िद की कि नाचने का प्रोग्राम करवाएं. हमने पावापुरी से छह नाचने वाली लड़कियों को बुलवाया था."
"पहले निर्गुण हुआ, फिर रात में भोजपुरी गाने चले और नाच हुआ. मेरी मां को इस बात का बहुत दुख हुआ था और कुछ दिन तक वो नाराज़ रहीं.”
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, “पहले लोग बहुत कम जीते थे. ऐसे में अगर कोई लंबा जीवन जीता था तो उसके परिजनों के लिए ये सेलिब्रेशन का विषय होता था. इसलिए शव यात्रा के साथ बैंड-बाजा, हाथी, घोड़ा, ऊंट, पैसा लुटाते, फूल बरसाते लोग जाते थे. जो अब भी दिखता है.”
हालांकि, बैंड-बाजे से इतर अब डांसर्स को बुलाया जाने लगा और लोगों के पास इसके तर्क भी हैं. पटना से सटे फतुहा की रहने वाली जनता देवी के देवर जगदीश राम की मृत्यु पर भी नाचने का कार्यक्रम आयोजित किया गया था.
जनता देवी कहती हैं, “देवर मरे तो उनके समधी ने आकर घरवालों से नाचने वाली को बुलाने को कहा. उनका कहना था कि मरने वाले को नाच का प्रोग्राम करवाकर अंतिम विदाई दी जाए. उनके पास पैसा था तो उन्होंने नाच करवा लिया. हम लोग कैसे करा सकते हैं?”
‘समाज के लिए ठीक नहीं’
समाजशास्त्री इस चलन को समाज के लिए ठीक नहीं मानते. प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, “ये पूरी तरह से नया मास कल्चर है, जिसमें लोक संगीत, पॉपुलर के साथ साथ अन्य दूसरे कल्चर मिल रहे हैं.”
तो आख़िर इसके नतीजे क्या होंगे? इस सवाल पर पुष्पेंद्र कहते हैं, “मौत और जीवन का फ़र्क़ अगर हम यूं ही मिटाते जाएंगे तो पश्चाताप, हिंसा के प्रति घृणा, मृत्यु के बाद सौम्य–संयत व्यवहार के मूल्य हम खोते जाएंगे. इससे समाज ज़्यादा हिंसक बनेगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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