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सिक्किम में इतनी बड़ी आपदा क्या बादल फटने से आई या फिर कुछ और है कारण
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत के पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम की तीस्ता नदी में बुधवार तड़के अचानक आई बाढ़ से हुई तबाही ने लोगों के सामने बड़ी आपदा खड़ी कर दी है.
राज्य में तबाही का आलम ये है कि गुरुवार शाम तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि भारतीय सेना के 22 जवान समेत 102 लोग अब भी लापता है. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि कई लोग मलबे में दबे हुए हैं.
इस समय सेना, एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़, सिक्किम पुलिस समेत राज्य सरकार के कई विभागों की टीम लापता लोगों को तलाशने और बचाव कार्य में जुटी है.
इस बाढ़ ने तीस्ता नदी पर बने 1200 मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाले चुंगथांग बांध को तोड़ दिया, जिसकी निवेश लागत क़रीब 25 हजार करोड़ रुपए है.
सिक्किम राज्य आपदा विभाग की एक जानकारी के अनुसार बाढ़ ने राज्य में 11 पक्के पुलों को नष्ट कर दिया है.
केवल मंगन ज़िले में आठ पुल बह गए है. जबकि नामची में दो और गंगटोक में एक पुल नष्ट हो गया है.
चार प्रभावित ज़िलों में पानी की पाइपलाइन, सीवेज लाइनें और कच्चे और कंक्रीट दोनों तरह के क़रीब 300 मकान नष्ट हो गए हैं.
राष्ट्रीय राजमार्ग 10 समेत राज्य सरकार की कई सड़कें टूट चुकी हैं, जिसके कारण कई इलाक़ों का संपर्क कट गया है.
22 हज़ार से ज़्यादा लोग प्रभावित बताए गए हैं और हादसे में प्रभावित सैकड़ों लोगों ने चार ज़िलों में बनाए गए राहत शिविरों में शरण ले रखी है. राज्य सरकार ने इस तबाही को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दिया है.
इस विनाशकारी बाढ़ को कुछ ख़बरों में मंगलवार को भारत और नेपाल में आए भूकंप से जोड़कर देखा जा रहा है, तो कई लोग उत्तरी सिक्किम में लोनाक झील के ऊपर बादल फटने को इसका एक कारण बता रहे हैं.
ऐसे कई सवालों के जवाब और इस आपदा के प्रमुख कारणों का पता लगाने के लिए बीबीसी ने देश के जाने-माने हिमनद विज्ञानी और पर्यावरण कार्यकर्ता, बांध और जल विशेषज्ञों से विस्तार से बात की.
लेकिन पहले यह बताना ज़रूरी है कि दक्षिण लोनाक झील पर अचानक ऐसा क्या हुआ, जिससे तीस्ता नदी में बाढ़ आ गई.
कैसे मची अचानक इतनी तबाही
बांधों, नदियों और लोगों पर काम करते आ रहे दक्षिण एशिया नेटवर्क ने अपने एक लेख में बताया कि 4 अक्तूबर, 2023 के तड़के 12 बजकर 40 मिनट पर दक्षिण लोनाक ग्लेशियल झील से पैदा हुए एक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ़्लड (जीएलओएफ़) ने यह तबाही मचाई है.
यह सब कुछ इतनी तीव्र गति से हुआ कि ये सिक्किम की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना, 1200 मेगावाट तीस्ता 3 एचईपी के 60 मीटर ऊँचे बाँध को बहा ले गया.
इस बाढ़ ने सिक्किम में तीस्ता नदी किनारे और पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में नीचे की ओर अभूतपूर्व आपदा ला दी है.
इलाक़े में लगातार बारिश ज़रूर हो रही थी लेकिन ग्लेशियल झील के फटने से सिक्किम में यह व्यापक विनाश हुआ है.
हालांकि केंद्रीय जल आयोग अर्थात सीडब्ल्यूसी ने 4 अक्तूबर की सुबह अपनी रिपोर्ट में बताया था कि झील फटने वाली जगह पर बादल फटा था. लिहाजा बादल फटने से झील फटने की घटना में भूमिका हो सकती है.
लेकिन नदी बांध के ऊपर लंबे समय से काम करते आ रहे पर्यावरण कार्यकर्ता, बांध और जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर का यह मानना है कि इस बाढ़ में बारिश की कोई खास भूमिका नहीं है.
उन्होंने सिक्किम आपदा पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, "जिस जगह यह हादसा हुआ है वो पाँच हज़ार मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित है और वहाँ बादल फटने की संभावना बहुत कम होती है. केंद्र जल आयोग के कुछ शीर्ष अधिकारी ने भी बाद में बताया कि यह आपदा बादल फटने की वजह से नहीं आई है."
"यह बाढ़ दक्षिण लोनाक झील के टूटने से आई है. क्योंकि यह झील काफ़ी नाज़ुक और असुरक्षित थी. इसे सूचीबद्ध किया गया था और इसके बारे में पता था कि यहाँ से ऐसी बाढ़ आ सकती है. ये ग्लेशियल लेक क़रीब तीन दशक से बढ़ रहा था. "
"इसका क्षेत्र पहले केवल 17 हेक्टेयर था जो अब उससे बढ़कर क़रीब 168 हेक्टेयर हो चुका था. लिहाजा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग इसकी प्रमुख वजह है. अर्थात ग्लेशियर पिघल रहा था और झील का विस्तार हो रहा था."
जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर बताते है कि सिक्किम के सुदूर उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित दक्षिण लोनाक झील एक हिमनद-मोराइन-बांध झील है.
ये झील ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओएफ) के लिए अतिसंवेदनशील 14 संभावित ख़तरनाक झीलों में से एक है जिसकी पहचान की गई थी.
ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ क्या होता है?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट बाढ़ एक प्रकार की विनाशकारी बाढ़ है, जो तब आती है जब ग्लेशियल झील वाला बांध किसी कारण से टूट जाता है जिससे बड़ी मात्रा में पानी निकलता है.
इस तरह के जीएलओएफ़ बहुत ख़तरनाक होते हैं, जो बड़ी तबाही लेकर आते है.
उत्तराखंड, गुजरात में आई बाढ़ इसका उदाहरण है. दरअसल ग्लेशियर बर्फ का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है जो उस इलाक़े के तापमान के बढ़ने पर पिघलने लगता है.
लिहाजा इस प्रकार की बाढ़ आम तौर पर ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने या पिघले पानी के प्रवाह के कारण झील में पानी जमा होने के कारण होती है.
जीएलओएफ़ की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं और इसने हिमालय की तलहटी में रहने वाले लोगों के लिए बहुत तबाही मचाई है.
जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ आपदा के बाद भारत सरकार ने कई झीलों की स्थिति और उनसे पनप रहे ख़तरों के अध्ययन के लिए जो विशेषज्ञों की कमेटी बनाई थी उसमें जाने माने ग्लेशियोलॉजिस्ट और बेंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान, दिवेचा जलवायु परिवर्तन केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुलकर्णी भी शामिल थे.
सिक्किम के दक्षिण लोनाक झील पर लंबे समय तक अध्ययन करने वाले डॉ. कुलकर्णी ने बताया कि इस झील से पनप रहे ख़तरे के बारे में 2015 में ही सरकारों को विस्तार से बता दिया गया था.
लोनाक झील से हुई इस तबाही पर डॉ. कुलकर्णी ने बीबीसी से कहा, "भारत में लोनाक झील एक ऐसी झील है जिस पर सबसे ज़्यादा अध्ययन हुआ है. जलवायु परिवर्तन के कारण चार हज़ार मीटर से अधिक ऊँचाई वाली जगह पर तापमान ग्लोबल आवश्यकता से अधिक बढ़ रहा है. जिसके कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं. जब ग्लेशियर अपना क्षेत्र ख़ाली करते हैं, तो वहाँ व्यापक स्तर पर पानी जमा होने लगता है जिसे ग्लेशियर झील बनती है. समय के साथ इस झील का आकार बड़ा हो जाता है जिससे बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है. ऐसा ही सिक्किम के लोनाक झील में हुआ है."
डॉ. कुलकर्णी बताते है कि 1990 में लोनाक झील पानी से भरना शुरू हुआ था और इतने सालों में यह बहुत बड़ा हो गया.
जिस समय लोनाक झील टूटी थी, उसमें 60 मिलियन क्यूबिक मीटर (1 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी में 100 करोड़ लीटर पानी होता है ) पानी था.
इस तरह की झील के पानी के अंदर मोराइन होता है, जिसमें बर्फ से लेकर मिट्टी ,पत्थर होते है. जब बर्फ पिघलती है तो बाँध नीचे धँस जाता है और उसी के कारण अचानक बाढ़ आ जाती है.
लोनाक झील के ख़तरे के बारे में 2013 में अध्ययन पेपर प्रकाशित हुआ था
लोनाक झील के अंदर की स्थिति का पता 10 साल पहले ही चल चुका था.
इस बारे में डॉ. कुलकर्णी कहते है, "2013 में एक पेपर आया था. उसके बाद हमने भी लोनाक झील पर गहराई से अध्ययन कर इस बात का पता लगाया था कि झील के अंदर कहाँ-कहाँ मोराइन है और उसमें कितना पानी जमा हो रहा है.
"ये तमाम जानकारियाँ 2015 में हमने केंद्र और राज्य सरकार को दे दी थी. साथ ही इस झील के ख़तरे से निपटने के लिए उपायों के बारे में भी बताया था. लेकिन सिक्किम की आपदा को देखने के बाद यह लग रहा है कि उन उपायों पर शायद कोई ख़ास काम नहीं हुआ है."
सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और सिक्किम के विज्ञान और प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग का ऐसा कहना है कि उनके लोगों ने इस पर तुरंत ध्यान दिया और झील के पानी को निकालने की कोशिश की थी.
अधिकारियों ने पानी बाहर निकालने के लिए झील में तीन आठ इंच चौड़े और 130 से 140 मीटर लंबे हाई डेंसिटी पॉलीथीन पाइप लगाए थे.
जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर का कहना है कि ऊपर झील की स्थिति को निगरानी करने के लिए, जो व्यवस्था होनी चाहिए उसमें पूरी कमी नज़र आती है.
लाचेन घाटी में बांध से क़रीब 20 किलोमीटर दूरी पर सीडब्ल्यूसी का पूर्वानुमान स्टेशन था, फिर भी चेतावनी जारी करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया.
वहीं 2015 में शुरू हुए चुंगथाग बांध की पानी छोड़ने की क्षमता सात हज़ार क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड है, जो काफ़ी नहीं है.
अगर ऊपरी धारा में पानी का स्तर बढ़ने पर नीचे लोगों को समय पर अलर्ट करने की व्यवस्था ठीक होती, तो शायद इतने व्यापक स्तर पर तबाही नहीं होती.
जिस तरह इसरो सेटेलाइट निगरानी रखता है, वैसे अगर इन झीलों पर निगरानी रखने की पुख़्ता व्यवस्था की जाए तो ऐसी आपदा से बचा जा सकता है.
डॉ. कुलकर्णी का कहना है कि हिमालय क्षेत्र के अंदर आने वाले राज्यों में बांध जैसी बड़ी परियोजना शुरू करने से पहले जलवायु आकलन रिपोर्ट को अनिवार्य करना चाहिए . क्योंकि बड़े नदी बांध 50 से सौ साल के लिए बनाए जाते है और इतने लंबे समय में जलवायु परिवर्तन की बातों पर गौर करना बेहद आवश्यक है. जबकि जोखिम वाले झीलों के नीचे बड़े नदी बांध का होना बहुत चिंता का विषय है.
सिक्किम में हैं कई जलविद्युत परियोजनाएँ
हिमालय से निकलने वाली तीस्ता नदी सिक्किम से होते हुए पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश में जाकर गिरती है.
उत्तरी सिक्किम में दो ग्लेशियर-पोषित नदियाँ, लाचुंग और लाचेन, चुंगथांग के दक्षिणी सिरे पर मिलकर तीस्ता नदी बनाती है.
इसी तीस्ता नदी के संगम पर चुंगथांग में साल 2005 में 1200 मेगावाट तीस्ता III हाइड्रो पावर परियोजना का निर्माण शुरू हुआ था और 2017 में यहाँ बिजली उत्पादन का काम शुरू हो गया.
यह नदी बांध मंगन ज़िले में चुंगथांग और मंगन के बीच स्थित है. यह सिक्किम में सबसे बड़ी नदी जल विद्युत परियोजना है.
हालाँकि कई स्थानीय लोग अब इस परियोजना के लिए अपने प्रारंभिक समर्थन पर अब पछतावा कर रहे हैं.
सिक्किम में पवन चामलिंग की सरकार के दौरान राज्य भर में दो दर्जन से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं को मंज़ूरी मिली थी.
राष्ट्रीय जलविद्युत विकास निगम की 47 जलविद्युत परियोजनाएँ सिक्किम और पश्चिम बंगाल में तीस्ता नदी पर निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं.
उनमें से नौ चालू हो चुके हैं, 15 बांधों पर काम चल रहा है और 28 अन्य पाइपलाइन में हैं.
तीस्ता नदी बेसिन में 313 हिमनदी झीलें हैं, जिससे नीचे की ओर हमेशा ख़तरा बना रहता है.
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