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दूसरों के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर बिहार में ख़ुद क्या कर पाए?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बिहार विधानसभा की चार सीटों के लिए हुए उपचुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एडीए ने सभी सीटों पर कब्ज़ा कर लिया है.
इन उपचुनावों में तरारी और रामगढ़ की सीट बीजेपी के खाते में गई है. इमामजंग सीट पर जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानी हम (सेक्युलर) ने कब्ज़ा किया है. जबकि बेलागंज सीट जेडीयू के खाते में गई है.
चार सीटों पर हुए इन उपचुनावों के नतीज़ों का बिहार विधानसभा के समीकरण पर कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन पहली बार चुनाव लड़ रही प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (जेएसपी) पर कई लोगों की नज़र थी.
बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, इस लिहाज़ से प्रशांत किशोर की पार्टी का पहला चुनावी प्रदर्शन अगले विधानसभा चुनावों पर क्या असर डाल सकता है, फ़िलहाल इसकी एक झलक ज़रूर मिली है.
प्रशांत किशोर की पार्टी ने बिगाड़ा खेल
बिहार विधानसभा उपचुनावों में एनडीए को पहली जीत इमामगंज से मिली. इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) की दीपा कुमारी ने आरजेडी के रौशन कुमार को क़रीब छह हज़ार वोटों के अंतर से हरा दिया.
जन सुराज पार्टी के जितेंद्र पासवान यहाँ तीसरे नंबर पर रहे. उन्हें इस सीट पर 37 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले. यानी इस सीट पर नतीजा तय करने में पीके की पार्टी की बड़ी भूमिका रही है.
यही हाल बेलागंज सीट का रहा जहां से जेडीयू की मनोरमा देवी क़रीब 21 हज़ार वोटों से जीती हैं. यहां से आरजेडी के विश्वनाथ कुमार सिंह दूसरे नंबर पर रहे है. ख़ास बात यह है कि बेलागंज सीट बीते कई साल से आरजेडी की सीट रही है.
बेलागंज सीट पर जेएसपी को 17 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं, जबकि यहां से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भी क़रीब साढ़े तीन हज़ार वोट मिले हैं. यानी इन दोनों दलों ने मिलकर यहां आरजेडी का रास्ता रोक दिया है.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, "असदुद्दीन ओवेसी की पार्टी एआईएमआईएम को तो माना ही जाता है कि वो मुसलमानों का वोट काटती है. लेकिन बेलागंज सीट पर जन सुराज पार्टी के मोहम्मद अमजद ने उससे ज़्यादा वोट काटे हैं."
"प्रशांत किशोर की पार्टी को चार में से दो सीटों पर अच्छे वोट मिले हैं. हालाँकि उपचुनाव का कोई ख़ास महत्व नहीं होता है. लेकिन इस वक़्त हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि पीके को पता चल गया है कि दूसरों का सियासी खेल कैसे बिगाड़ सकते हैं."
जन सुराज पार्टी का कैसा रहा प्रदर्शन
लेकिन बिहार में यह उपचुनाव एक लिहाज़ से काफ़ी अहम था, क्योंकि इसमें प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी पहली बार चुनाव लड़ रही थी.
अब तक अन्य कई दलों को चुनावी रणनीति सिखाने का दावा करने वाले और उनकी जीत के साथ अपने दावे जोड़ने वाले प्रशांत किशोर की पार्टी के इन चुनावों में प्रदर्शन पर कई लोगों की नज़र थी.
बिहार की ही रामगढ़ विधानसभा सीट की बात करें तो यहाँ जेएसपी के उम्मीदवार सुशील कुमार सिंह चौथे नंबर पर रहे हैं. उन्हें यहाँ क़रीब साढ़े चार हज़ार वोट मिले हैं. जबकि बीजेपी के अशोक कुमार सिंह को महज़ 1362 वोट से जीत मिली है. यानी यहां भी पीके की पार्टी ने जीत और हार में बड़ी भूमिका निभाई है.
तरारी विधानसभा सीट की बात करें तो यहां से बीजेपी के विशाल प्रशांत को सीपीआई (एमएल) के राजू यादव पर दस हज़ार से ज़्यादा वोट से जीत मिली है. यहां से पीके की पार्टी की उम्मीदवार किरण सिंह को 5622 वोट मिले हैं.
यानी पीके की पार्टी को किसी सीट पर जीत नहीं मिली है और न ही कहीं वो मुख्य मुक़ाबले में दिखी है.
हालाँकि उनके जन सुराज अभियान का नारा रहा है, "जनता के सुंदर राज के लिए, बिहार के बदलाव के लिए."
प्रशांत किशोर ने क्या कहा?
बिहार में विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आने के बाद प्रशांत किशोर ने पत्रकारों से कहा कि जहां पिछले 50 साल से जाति की राजनीति का दबदबा हो वहां पहले ही प्रयास में 10 फ़ीसदी वोट लाना हमारा जलवा है या क्या है, ये आप तय कर लीजिए.
प्रशांत किशोर ने कहा है, “हमारी पार्टी एक महीने पुरानी है. जन सुराज अभियान भले ही दो साल पुराना है और 50 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों ने उसका समर्थन किया है, लेकिन समर्थन करना और वोट मिलना दोनों दो बात हैं.”
“अगर हमारी पार्टी को दस प्रतिशत वोट आया है तो यह मेरी ज़िम्मेवारी है. भले ही यह मेरी अकेली की ज़िम्मेवारी नहीं है. लेकिन मैं पीछे नहीं हटने वाला हूं. इस दस प्रतिशत को 40 प्रतिशत करना है. यह एक साल में हो या पांच साल में हो."
महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी को लोकसभा में बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन विधानसभा में उनकी पार्टी और कांग्रेस काफ़ी पिछड़ गई. यानी कह सकते हैं कि चुनाव में 6 महीने का समय भी काफ़ी होता है.
प्रशांत किशोर ने वोट में बंटवारे की वजह से विपक्षी उम्मीदवारों की हार पर कहा है कि आरजेडी वाले हारने के बाद दूसरों पर दोषारोपण ही करेंगे.
जन सुराज की वेबसाइट के मुताबिक़ उसने एक करोड़ से ज़्यादा सदस्य बना लिए हैं. प्रशांत किशोर ने पिछले महीने 2 अक्तूबर को अपनी पार्टी लॉन्च की थी. पार्टी लॉन्चिंग के लिए उन्होंने बिहार की पदयात्रा भी की थी.
जन सुराज के मुताबिक़ अब तक इस पदयात्रा के 665 दिन हो चुके हैं और इस दौरान क़रीब 3 हज़ार गावों तक यह पदयात्रा पहुँची है.
बिहार में जन सुराज के पहले चुनावी प्रदर्शन पर वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "चुनावी राजनीति अलग होती है, इसमें माहिर लोग मैदान में होते हैं. प्रशांत किशोर 'वोट कटवा' भले हो जाएं, लेकिन पहले ही चुनाव में जीत हासिल कर पाना आसान नहीं होता है."
सुरूर अहमद याद करते हैं, "नीतीश कुमार के पास अपना जातीय वोट बैंक होने के बाद भी साल 1995 के विधानसभा चुनाव में अपने दम पर उन्हें 310 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बाद केवल 7 सीटों पर जीत मिली थी. ये सीटें भी उनके गृह इलाक़े नालंदा के आस-पास की थीं."
इंडिया ब्लॉक के लिए चिंता
सुरूर अहमद का मानना है कि बिहार में प्रशांत किशोर के पास ऐसा कोई वोट बैंक नहीं है, जो लालू, नीतीश या यूपी में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के पास है.
सुरूर अहमद सवाल करते हैं, "क्या वो साल 2014 में मोदी के साथ नहीं होते तो बीजेपी की जीत नहीं होती? प्रशांत किशोर को मीडिया की वजह से यह हाइप मिला है. जिन दलों की जीत के दावे उनके साथ जोड़े जाते हैं, उनके बिना भी ऐसे दलों ने जीत दर्ज की है. पीके साल 2017 में यूपी में एसपी को क्यों नहीं जिता सके?"
बिहार में फ़िलहाल जिन चार सीटों पर चुनाव हुए हैं वो सीटें गंगा के दक्षिण की तरफ की सीटें हैं. इस इलाक़े को विपक्षी गठंबधन के लिए मज़बूत माना जाता है.
पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो इस इलाक़े में आरजेडी और उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन अच्छा रहा था. यही नहीं इस साल हुए लोकसभा चुनावों में भी विपक्ष का प्रदर्शन इस इलाक़े में बेहतर रहा था.
नचिकेता नारायण कहते हैं, "मगध-शाहाबाद का इलाक़ा एनडीए के लिए कमज़ोर माना जाता है. इस इलाक़े में उसकी जीत ज़ाहिर तौर पर इंडिया ब्लॉक के लिए चिंता की बात है."
"प्रशांत किशोर की पार्टी अगर विपक्ष के वोट काटकर चुनावी नतीजों को बदल देती है और ये नतीजे इंडिया ब्लॉक के ख़िलाफ़ जाते हैं तो विपक्ष की इससे चिंता होनी चाहिए."
बिहार में अगले विधानसभा चुनाव में क़रीब एक साल का वक़्त बचा है. माना जाता है कि राज्य के सीमांचल इलाक़े में मुस्लिम एआईएमआईएम के उम्मीदवार खड़े करने से विपक्ष को वोटों का बड़ा नुक़सान होता है,.
ऐसे में अगर प्रशांत किशोर की पार्टी का आगे का प्रदर्शन भी इसी समीकरण पर आगे बढ़ा तो इसका ज़्यादा नुक़सान लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी आरजेडी और उसके ही सहयोगी दलों को ज़्यादा हो सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित