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ऑपरेशन ब्लू स्टार: पूर्व सफाई कर्मचारी ने बताई शवों के अंतिम संस्कार की कहानी
- Author, हरमनदीप सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
(चेतावनी: इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से पाठकों को विचलित कर सकते हैं.)
"दरबार साहिब तो दूर की बात है, उन दिनों के बाद मैं दरबार साहिब के आसपास के इलाके़ में भी नहीं गया. वह भयावह दृश्य और सड़ती लाशों की बदबू आज भी मुझे परेशान करती है."
ये कहना है 73 वर्षीय केवल कुमार का, जो अमृतसर नगर निगम में सफ़ाई कर्मचारी रह चुके हैं.
'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के बाद हरमंदिर साहिब परिसर के अंदर और आसपास पड़े शवों के अंतिम संस्कार की ज़िम्मेदारी केवल कुमार को सौंपी गई थी.
यदि कोई व्यक्ति अमृतसर में रहते हुए 41 साल बाद भी हरमंदिर साहिब में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की परिस्थितियों ने उस व्यक्ति के दिलोदिमाग़ पर किस प्रकार का असर डाला होगा.
अमृतसर स्थित श्री हरमंदिर साहिब को सिखों का सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थान माना जाता है. इसे स्वर्ण मंदिर और दरबार साहिब के नाम से भी जाना जाता है.
खालिस्तान की घोषणा की आशंका
जून 1984 के पहले सप्ताह में दरबार साहिब परिसर में हुई भारतीय सेना की कार्रवाई को 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के नाम से जाना जाता है.
भारत सरकार के दावे के अनुसार यह सैन्य अभियान जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके हथियारबंद साथियों को दरबार साहिब परिसर से बाहर निकालने के लिए चलाया गया था.
जरनैल सिंह भिंडरावाले उस समय सिख धर्म के प्रचारक संगठन दमदमी टकसाल के प्रमुख थे.
भारत सरकार का दावा है कि हथियारों के साथ भिंडरावाले ने दरबार साहिब परिसर पर कब्ज़ा कर लिया था और वह एक अलग देश, खालिस्तान की घोषणा करने वाला था.
हालांकि इसे लेकर सिख राजनीतिक विशेषज्ञों की राय अलग है. उनका मानना है कि यह ऑपरेशन उस वक्त के इंदिरा गाँधी सरकार के ध्रुवीकरण की राजनीति का नतीजा था.
ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर जारी किए गए सरकारी श्वेत पत्र के मुताबिक़ इसमें 493 नागरिक और 83 सैनिक मारे गए थे. वहीं सेंट्रल सिख़ म्यूजियम में इस ऑपरेशन में मारे गए लोगों की सूची में कुल 743 नाम शामिल हैं.
तत्कालीन पंजाब पुलिस अधिकारी अपार सिंह बाजवा ने 2004 में बीबीसी को बताया था कि उन्होंने स्वयं 800 शव गिने थे.
वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता इंद्रजीत सिंह जेजे और कई अन्य जानेमाने पत्रकारों और जानकारों ने मरने वालों की संख्या चार से पांच हज़ार तक बताई है.
'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के दौरान की स्थिति
केवल कुमार बताते हैं कि जब 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' हुआ था, उस वक्त उनकी उम्र 32 साल थी. अमृतसर नगर निगम में सब-इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त केवल कुमार से हमने उनके पुराने कार्यालय में मुलाक़ात की.
जब वो हमसे अपनी आपबीती साझा कर रहे थे तो उनके चेहरे पर दर्द की लकीरें उभर आ रही थीं. वह अभी भी उस स्थिति के बारे में बात करने से ठिठक रहे थे.
केवल कुमार कहते हैं, "कहीं चार लाशें थीं, कहीं छह तो कहीं आठ. मौसम बहुत गर्म था, लाशें सड़ रही थीं, हालत बहुत ख़राब थी. कई लाशें फूल गई थीं."
वह बताते हैं, "जब हम शव को हाथों या पैरों से पकड़ कर उठाते थे, तो त्वचा हमारे हाथों में रह जाती थी और चारों तरफ शव की दुर्गंध फैल जाती थी."
सफाई कर्मचारियों की ज़रूरत कब, कैसे पड़ी?
केवल कुमार कहते हैं कि ऑपरेशन ख़त्म होने के बाद पुलिस ने सड़ रही लाशें उठाना बंद कर दिया था. ऐसी मुश्किल स्थिति में सेना और प्रशासन ने लाशों को हटाने के लिए नगर निगम के सफाई कर्मचारियों को लगाया.
केवल कुमार बताते हैं कि 6 जून 1984 की सुबह सेना और नगर निगम के अधिकारी उन्हें इस काम के लिए लेने आए थे. उस वक्त वो अपने घर पर थे.
वह बताते हैं, "मैं अपने घर के बाहर आंगन में सो रहा था कि क़रीब पांच से साढ़े पांच बजे के बीच सेना के कुछ लोगों ने आकर मुझे जगाया. उनके साथ डॉ. राजपाल भाटिया भी थे. अमृतसर में कर्फ्यू लगा हुआ था तो किसी को भी आने-जाने की इजाज़त नहीं थी. मेरा पास यहीं बनाया गया."
"फिर हमने शवों को ले जाने के लिए कचरा उठाने वाली तीन-चार ट्रॉलियां मंगवाईं और दोपहर तक हमने शवों को उठाने का काम शुरू कर दिया."
'3 जून से ही होने लगी थीं मौतें'
उस वक्त अमृतसर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर रमेश इंदर सिंह भी इस बात की पुष्टि करते हैं.
वह बताते हैं कि डॉ. राजपाल भाटिया नगर निगम विभाग में स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर तैनात थे. उनकी देखरेख में ही निगम के कर्मचारियों को दरबार साहिब के परिसर में पड़े शव उठाने के लिए बुलाया गया था.
रमेश इंदर सिंह ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर 'ब्लू स्टार से पहले और बाद में पंजाब में उथल-पुथल: भीतर के एक सूत्र की कहानी' नाम से एक क़िताब लिखी है.
इस क़िताब में केवल कुमार द्वारा दी गई जानकारी के साथ-साथ कई अन्य विवरण शामिल हैं.
बीबीसी पंजाबी से बातचीत के दौरान रमेश इंदर सिंह ने बताया कि 3 जून को कर्फ्यू लगाए जाने के बाद हरमंदिर साहिब परिसर में मौतें होने लगी थीं.
उन्होंने कहा, "जब 6 जून को ऑपरेशन ब्लू स्टार पूरा हुआ, तब तक कुछ शव सड़ने लगे थे. तब पंजाब सरकार ने शवों को हटाने की ज़िम्मेदारी नगर निगम के कर्मचारियों को सौंपी और फिर तत्कालीन नगर निगम आयुक्त गुलवंत सिंह की देखरेख में शवों को हटाने की व्यवस्था की गई."
'रात को नींद नहीं आती थी'
केवल कुमार ने बीबीसी पंजाबी को बताया कि दरबार साहिब परिसर में मौत का दृश्य देखकर शव उठाने वालों की नींद उड़ गई थी. कई बार उन्हें ऐसा भ्रम होता जैसे कोई उनके पास ही बैठा है. कभी-कभी उन्हें आवाज़ें भी सुनाई देती थीं और कुछ भी खाने-पीने का मन नहीं करता था.
केवल कुमार कहते हैं, "मैं रात को सो नहीं पाता था. चार-पांच दिन तक ऐसा लगता था कि कोई (मृतक) मेरे पास खड़ा है, कोई मेरे पास बैठा है. मुझे लगता कोई मुझसे सवाल पूछ रहा है."
केवल कुमार का कहना है कि उन्होंने यह काम करने से मना कर दिया था लेकिन उन्हें ये काम करना पड़ा.
केवल कुमार कहते हैं, "सामान्य परिस्थितियों में कोई ऐसा काम नहीं कर सकता. कोई वहां जाने को तैयार नहीं था. लेकिन हम सफाई कर्मचारी थे, हम आदेशों की अवहेलना कैसे कर सकते थे? हम शराब पीकर नशे में ये काम करने लगे थे."
एक अन्य सफाई कर्मचारी ने कैमरे पर न आने की शर्त पर हमें बताया कि वह स्वर्ण मंदिर के पास अखाड़ों में कुश्ती सीखा करते थे. उन्हें यह काम करने के लिए मजबूर किया गया लेकिन वह मौक़ा मिलते ही भागकर छिप गए.
वो कहते हैं कि उस समय वह बेरोज़गार थे और शव उठाने के बदले नगर निगम में उन्हें नौकरी की पेशकश भी की गई थी लेकिन उन्होंने वहां से भाग जाना ही बेहतर समझा. उनके इस दावे की पुष्टि नहीं हो पाई है.
हमने कई अन्य सफाई कर्मचारियों से भी मुलाक़ात की लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर कैमरे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. हालांकि कई लोगों ने ऑफ़ द रिकॉर्ड बताया, "हम पर शवों को लूटने और शराब पीकर दरबार साहिब में जाने का आरोप लगाया गया."
आज भी इस पर बात करने से कई लोग कतराते नज़र आते हैं.
केवल कुमार बताते हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार ख़त्म होने के बाद दरबार साहिब में सिर्फ़ लाशें ही लाशें थीं. वो कहते हैं कि अंदर परिक्रमा में भी लाशें थीं. हरमंदिर साहिब परिसर के अंदर और बाहर के बाज़ारों में भी लाशें पड़ी थीं.
वो कहते हैं, "दरबार साहिब के लंगर हॉल में भी लाशें पड़ी थीं. वहां रखा गेहूं खून से लथपथ था. सरोवर में भी लाशें मिलीं लेकिन सैनिकों ने खुद ही किसी तरह उन्हें बाहर निकाला क्योंकि हमने कहा कि हमारे किसी भी आदमी को तैरना नहीं आता, हम इसके अंदर से लाशें नहीं निकालेंगे."
केवल कुमार के अनुसार, "उन्होंने माई सेवा बाज़ार, कथियन अले बाज़ार, आटा मंडी और घंटा घर चौक से भी शव उठाए थे. उनमें से कई सामान्य श्रद्धालु लग रहे थे."
केवल कुमार ने बताया कि उनके पास शवों को कचरा उठाने वाली गाड़ी में डालकर ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, न ही उन्हें शवों को सुरक्षित रखने के लिए कोई कपड़े दिए गए थे.
उन्होंने कहा कि "हमें हर दिन केवल दो मीटर कपड़ा मिलता था, जिसे हम अपने मुंह पर बांधकर बदबू में काम कर सकें."
शवों को कैसे ले जाया गया?
केवल कुमार ने बताया कि उन्होंने सेना की निगरानी में शवों को उठाने का काम शुरू किया. इस पूरे दौरान सेना के दो-चार जवान उनके साथ रहते थे.
इस दौरान पूरे शहर को सेक्टर्स में बांट दिया गया और सफाई कर्मचारियों को अलग-अलग जगहों की ज़िम्मेदारी दी गई. सैनिक उन्हें शवों के पास ले जाते और शवों को उठाकर ट्रॉलियों में भर देते.
केवल कुमार बताते हैं कि शवों को इकट्ठा करने में तीन से चार दिन लग गए. एक-एक ट्रॉली में क़रीब दस शव लादे जाते थे. फिर इन शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेज भेजा जाता था.
वो कहते हैं, "शवों से इतनी बुरी बदबू आ रही थी कि फर्श को पानी से धोने के बाद भी बदबू नहीं गई. हमारे अपने शरीर से भी बदबू आने लगी."
केवल कुमार के अनुसार, इन शवों में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे.
रमेश इंदर सिंह के अनुसार, इस ऑपरेशन के दौरान मरने वाले बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सही संख्या का पता नहीं लगाया जा सका क्योंकि कई शवों को सीधे श्मशान घाट ले जाया गया था.
उन्होंने अपनी क़िताब में लिखा है कि 7 से 18 जून तक केवल 536 शवों का पोस्टमार्टम किया गया. इसमें से 495 पुरुषों, 33 महिलाओं और 8 बच्चों के शव थे.
मृतकों के बीच जीवित मिले लोग
ऑपरेशन के ख़त्म होने के बाद और शवों को उठाने से पहले, परिसर में मिले सभी घायल लोगों को अस्पताल ले जाया गया था. हालांकि, मृतकों में भी कई लोग जीवित अवस्था में थे, कुछ बुरी तरह से जख्मी भी थे.
केवल कुमार का कहना है कि जब वह शवों को उठा रहे थे तो थारा साहिब के पास उन्हें एक या दो लोग घायल अवस्था में मिले, जो पहली नज़र में देखने पर शव जैसे प्रतीत हुए थे.
केवल कुमार कहते हैं, "माई सेवा से ठाड़ साहिब तक के रास्ते में पांच-छह लोग पड़े थे, लेकिन उनमें से एक-दो लोग अभी भी जीवित थे. सेना उन्हें अपने साथ ले गई थी."
रमेश इंदर सिंह भी पुष्टि करते हैं कि अमृतसर मेडिकल कॉलेज और मुर्दाघर ले जाए गए शवों में एक जीवित व्यक्ति भी था, जो मृत प्रतीत हो रहा था.
रमेश इंदर सिंह कहते हैं "जब डॉक्टरों ने पोस्टमार्टम शुरू किया तो वह चीख पड़ा. डॉक्टरों को पता चला कि वह जीवित है. फिर उसका इलाज किया गया और उसे घर भेज दिया गया."
रमेश इंदर सिंह का कहना है कि पोस्टमार्टम के लिए मुर्दाघर में आठ ऐसे शव पहुंचाए गए थे जिनके हाथ बंधे हुए थे.
वह बताते हैं, "मैंने अमृतसर के मेडिकल ऑफ़िसर डॉ. दलबीर को पत्र लिखकर पूछा तो उन्होंने बताया कि आठ शवों के हाथ पीछे की ओर बंधे हुए थे."
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान कितनी मौतें हुईं?
ऑपरेशन ब्लू स्टार के 41 साल बाद भी इस घटना में मरने वालों की संख्या को लेकर कई मतभेद हैं. इसमें हुई मौतों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं.
'ऑपरेशन ब्लू स्टार' पर भारत सरकार द्वारा जारी श्वेतपत्र में आधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 493 बताई गई है. इसमें आतंकवादी और निर्दोष नागरिक दोनों शामिल हैं.
पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल बीडी पांडे ने अपनी क़िताब 'इन द सर्विस ऑफ़ फ्री इंडिया' में यह आंकड़ा 1200 बताया है. रमेश इंदर सिंह ने अपनी पुस्तक में मृतकों की संख्या 783 बताई है. उनके अनुसार इस घटनाक्रम में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत हुई थीं.
रमेश इंदर सिंह के अनुसार चट्टीविंड शहीदां श्मशानघाट में 763 शवों का अंतिम संस्कार किया गया तथा शिव पुरी श्मशानघाट में 20 शवों का अंतिम संस्कार किया गया.
उनके अनुसार, 717 मौतें स्वर्ण मंदिर परिसर में हुईं और बाकी परिसर के बाहर हुईं. उन्होंने घायलों की संख्या भी 178 बताई, इसमें 102 सामान्य श्रद्धालु थे.
एसजीपीसी ने इस घटना में मारे गए लोगों के उत्तराधिकारियों को वित्तीय मदद दी थी और मदद पाने वाले 741 लाभार्थियों की सूची भी जारी की थी.
केवल कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए दावा किया कि नगर निगम के सफाई कर्मचारियों ने क़रीब एक हज़ार शवों को बाहर निकाला था.
केवल कुमार कहते हैं, "लाशों की संख्या एक हज़ार से 10-20 ज़्यादा या 10-20 कम होगी. जब शव बिखरे हुए थे, तो उनकी संख्या दो हज़ार के आसपास लग रही थी, लेकिन जब गिनती हुई, तो यह संख्या एक हज़ार के आसपास थी."
अंतिम संस्कार के तरीके़ की आलोचना
रमेश इंदर सिंह ने अपनी क़िताब में लिखा है कि मृतकों को ले जाने के लिए सफाई कर्मचारियों और नगरपालिका के ट्रकों का इस्तेमाल करने के लिए प्रशासन की निंदा की गई.
कुछ इतिहासकारों ने इसे हृदय विदारक घटना बताया है कि किस प्रकार मृतकों को कचरा ढोने वाले ट्रकों में ले जाया गया था और सामूहिक रूप से उनका अंतिम संस्कार किया गया था.
बीबीसी पंजाबी से बात करते हुए शिरोमणि कमेटी के सचिव प्रताप सिंह ने कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद शवों का अनादर किया गया था.
वह कहते हैं,"ऑपरेशन ब्लू स्टार में जान गंवाने वालों के शवों का अनादर किया गया. वे भी परिवार के सदस्य थे. उनका अंतिम संस्कार सम्मान के साथ नहीं किया गया. उनका अंतिम संस्कार उनके परिवार के सदस्यों के सामने किया जाना चाहिए था."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित